Pawan Jury BhilwaraRj
'न्यायपालिका का तोताकरण'
क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जजों की नियुक्ति हेतु राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ( NJAC ) के गठन के लिए संविधान में संशोधन किया है । इस संशोधन के अनुसार जजों की नियुक्ति, प्रमोशन एवं स्थानान्तरण का अधिकार नवगठित आयोग के पास होगा और कोल्जियम व्यवस्था समाप्त हो जायेगी ।
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UPA सरकार में CBI को न्यायपालिका ने तोता कह कर पुकारा था ।
पर समय बलवान है , अब न्यायपालिका खुद सरकार का तोता बन चुका है । और जनता को नेता वेसे भी भेड़ बकरियों से ज्यादा नही समझते है ।
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NJAC के प्रावधान के अनुसार :
- आयोग में 6 सदस्य होंगे
- 2 सुप्रीम कोर्ट के जज, 1 सुप्रीम कोर्ट का चीफ जज, 1 क़ानून मंत्री और 2 स्वतंत्र सदस्य जिनकी नियुक्ति 'गणमान्यता और प्रतिष्ठा' के आधार पर सरकार द्वारा विपक्ष में सबसे बड़े दल के नेता से विमर्श कर के की जायेगी ।
- ये आयोग सुप्रीम कोर्ट , हाई कोर्ट और निचली अदालतों के न्यायधिशो की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानान्तरण करेगा ।
इस प्रकार न्यायपालिका को नियंत्रित करने की सारी शक्ति इस आयोग में समेट दी गयी है ।
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* चूंकि सरकारे मिली भगत से चलाई जाती है ये कोई नई बात नही है , और कोंग्रेस अभी तक विपक्ष का दर्जा पाने के लिए छटपटा रही है, इसलिए आयोग में गणमान्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए विमर्श करने का जो अधिकार स्वाभाविक तौर पर विपक्ष के नेता को दिया जाना था, उदारता दिखाते हुए सबसे बड़े दल के नेता को दिया गया । नमो जनता के सामने कोंग्रेस को विपक्ष का दर्जा नही देने का ड्रामा कर रहे है वहीँ अंदरखाने कोंग्रेस को विपक्ष के अधिकार भी दे रहे है । राजनीति विज्ञान में इसे शान्ति पूर्ण सहअस्तित्व कहते है ।
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तो कैसे यह आयोग सरकार का तोता है ?
कार्य प्रणाली :
- सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट न्यायधीशो की नियुक्ति के लिए आयोग प्रस्ताव पास कर के राष्ट्रपति (पीएम) के पास भेजेगा, राष्ट्रपति इस प्रस्ताव पर मुहर लगा कर ऐसी नियुक्ति को अनुमति देंगे ।
- प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने की अर्हता : ऐसे किसी भी प्रस्ताव की अनुशंषा राष्ट्रपति को आयोग द्वारा नही की जा सकेगी, जिस अनुशंषा का विरोध कोई दो सदस्य कर दे ।
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1) पेंच - आयोग में एक सदस्य क़ानून मंत्री है, जो कि सरकार का अंग है, यदि सरकार अपनी 'ईमानदारी' के लिए विख्यात बड़े दल के नेता को गाँठ लेती है ( जो की गंठने के लिए तैयार बैठा है) तो निष्पक्ष जज की नियुक्ति के दरवाजे बंद हो जायेंगे ।
2) पेंच - यदि क़ानून मंत्री एक 'गणमान्य एवं प्रतिष्ठित' व्यक्ति से सांठ गाँठ कर लेता है (जो कि सांठ गाँठ होने पर ही गणमान्य* माना जाएगा ऐसी संभावना है) तो भी देश को स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायधीश नही मिल सकेंगे ।
*गणमान्य एवं प्रतिष्ठित कौन होगा, आधार क्या होंगे, बिल में जिक्र नही है, मतलब यह माना जा सकता है कि इस स्तम्भ का पाठक भी यदि आयोग में जगह 'पा' जाता है तो बिल के अनुसार वह स्वत: ही गणमान्य मान लिया जाएगा ।
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- एक अन्य प्रावधान के अनुसार यदि किसी नियुक्ति की अनुशंषा राष्ट्रपति (पीएम) को आयोग द्वारा भेजी जाती है और राष्ट्रपति ऐसी किसी अनुशंषा को लौटा देते है , तो वह प्रस्ताव राष्ट्रपति को दुबारा नही भेजा जा सकेगा, यदि 6 सदस्यीय आयोग में से कोई एक सदस्य भी ऐसे प्रस्ताव पर अपनी असहमति प्रकट करे ।
¶ आशय - मान लीजिये आयोग के 5 सदस्य किसी न्यायधीश 'म' को उच्चतम न्यायपालिका का मुख्य न्ययाधीश बनाने का प्रस्ताव करते है, किन्तु आयोग में उपस्थित क़ानून मंत्री (सरकार) 'म' की नियुक्ति का विरोध करता है, तब भी 'म' की नियुक्ति का प्रस्ताव राष्ट्रपति (नमो) को भेजा जा सकेगा, क्योंकि राष्ट्रपति को नियुक्ति की अनुशंषा भेजने के लिए कम से कम 2 सदस्यों की असहमति आवश्यक है ।
किन्तु यदि राष्ट्रपति (नमो) 'म' की नियुक्ति का प्रस्ताव आयोग को लौटा देते है ,तो यह प्रस्ताव राष्ट्रपति (नमो) को फिर तब तक नही भेजा जा सकेगा, जब तक कि आयोग के सभी सदस्य इस नियुक्ति का समर्थन न करे ।
चूंकि आयोग में उपस्थित क़ानून मंत्री 'म' की नियुक्ति का विरोध कर देगा अत: सिर्फ वही व्यक्ति जज नियुक्त हो सकेगा जिसे नमो की कृपा हासिल हो ।
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साफ़ दिख रहा है कि इस संविधान संशोधन से सरकार ने न्यायपालिका को पूरी तरह काबू में कर लिया है ।
वस्तुत: अब न्यायपालिका भी सरकार के मंत्रीमंडल की तरह कार्य करेगी , और न्यायधीश सरकार के 'प्रसाद पर्यंत' ही अपने पद पर बने रह सकेंगे ।
हालांकि संविधान में न्यायपालिका के पृथकरण को बनाए रखने के लिए 'किसी' धारा में लिखा गया है। पर संविधान बहुत पहले लिखा गया था, पुराना हो चुका है ।
अब 'विकास' का ज़माना है । सबका विकास हो, ज़रूरी है । न्यायपालिका को कैसे पिछड़ी अवस्था में रखा जा सकता है ।
भारत को विकास करना है तो एक होना पड़ेगा । एकता में शक्ति है । या फिर शायद एकता में ही शक्ति है । कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका तीनो मिल कर अब विधायिका को शक्ति देंगे । संसद सर्वोच्च । सबसे सर्वोच्च !!
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जोखिम :
किसी भी देश की शाषन व्यवस्था को न्यायपालिका की स्वतंत्रता से आँका जाता है । सराकार के मनमाने फैसलों पर चाबुक चलाने की शक्ति सिर्फ न्यायपालिका के पास ही होती है । यदि न्यायपालिका सरकार के अधीन हो तो नतीजे भयावह हो सकते है । खासकर ऐसे लोकतंत्र में जहां राईट टू रिकाल पीएम न होने से पूर्ण बहुमत की सरकार को 5 वर्ष तक अपनी मनमर्जी से शासन करने की आज़ादी मिली हुयी है और सरकार को जनता के पास 5 वर्ष में सिर्फ एक बार ही जाना होता है ।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी एक व्यक्ति को इतनी ज्यादा ताक़त देना नादानी है, बहुत बड़ी नादानी ।
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समाधान :
1) मूल समाधान
- जज प्रणाली को समाप्त कर के नागरिको की जूरी द्वारा सुनवाई की व्यवस्था लागू की जाए , ताकि वर्षो से लंबित करोडो मुक़दमो का निष्पक्ष निपटान शीघ्रातिशीघ्र हो सके ।
- सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट , शेषन कोर्ट तथा निचली अदालतों के न्यायाधीशो को प्रजा अधीन किया जाए, ताकि देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना हो सके ।
2) तात्कालिक समाधान
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ( NJAC ) के सदस्यों को चुनने का अधिकार जनता को मिले, तथा इन सदस्यों को प्रजा अधीन किया जाए, ताकि आयोग करोडो नागरिको के प्रति जवाबदेह रहे न कि सरकार के प्रति ।
प्रजा अधीन राजा @ pk