Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

While CoBhApSwaRa-workers and SoMoAr-andhbhakt insist on confining to slogan shouting, the activists at RRG are writing serious articles. This article talks about phoniness of RSS-apex. RSS-apex always asks RSS-activists to OPPOSE and IGNORE all law-drafts needed to improve courts, Military etc and insists that workers should confine to slogan shouting, collecting votes for BJP-leaders etc. This article elaborates on motives of RSS-apex

Pawan Jury BhilwaraRj:

'RSS और उसके आनुषांगिक संघठनो के विरोधाभासो को समर्पित'

हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बयान दिया कि 'देश में रहने वाले सभी नागरिक, चाहे वे किसी भी धर्म के हो, हिन्दू है'

आरएसएस देश का सबसे पुराना, सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर सामजिक संघठन है ।
आरएसएस दो दर्ज़न से अधिक बड़े तथा 50 से अधिक छोटे संघठन चलाता है ।
जिसमे विहिप, बजरंग दल, स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ प्रमुख है ।

देश के करोड़ो कार्यकर्ताओं ने अपने आप को इस संघठन के लिए समर्पित कर रखा है क्योकि ये भ्रम खड़ा कर दिया गया है कि आरएसएस एक राष्ट्रवादी संघठन है और देश की एकता, अखंडता, संस्कृति सुरक्षा के लिए कार्य करता है ।

लेकिन आरएसएस ने देश की सुरक्षा और संस्कृति को सुनिश्चित करने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट्स अपने कार्यकर्ताओं या नागरिको को नही दिए ।
यदि हमें देश में कोई भी सुधार या परिवर्तन लाना है तो एक मात्र विकल्प क़ानून पास करना है । देश को क़ानून चलाते है बयान और नारे नही ।
यह एक खुला रहस्य है कि आरएसएस का राजनेतिक चेहरा बीजेपी है और दोनों सुविधानुसार अपने संबंधो की 'व्याख्या' करते रहते है ।

यह माना जाता है कि आरएसएस स्वदेशी समर्थक है किन्तु आरएसएस ने विदेशी कम्पनियों को भारत में घुसने से रोकने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट्स नही दिए, बल्कि स्वदेशी उद्योगों के सरक्षण के लिए प्रस्तावित जूरी सिस्टम जैसे कानूनों का विरोध किया ।
परिणाम - भारत की स्वदेशी इकाईया धडाधड बंद हो रही है या फिर विदेशी कम्पनियां उन्हें टेकओवर कर रही है । आरएसएस कार्यकर्ता सोशल मिडिया पर स्वदेशी तेल और साबुन अपनाने के अभियान चला रहे है जबकि नमो रक्षा, बीमा, रेल और कृषि जैसे आधारभूत ढाँचे में FDI की अनुमति दे रहे ।

आरएसएस कथित तौर पे एक हिन्दूवादी संघठन है किन्तु हिन्दू मंदिरों में व्याप्त उत्तराधिकार को समाप्त करने तथा हिन्दू मंदिरों के प्रशाशन को सिक्ख धर्म जितना मज़बूत बनाने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट्स नही दिए ।
परिणाम - मंदिर व्यावसाय की तरह संचालित हो रहे है, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के कारण दान में कमी आई है, पांडित्य की जगह पाखंड का बोलबाला बढ़ता जा रहा है ।
जहां एक और इस्कोन और साईं बब्बा के मंदिरों में दान की राशि बढती जा रही है ( इस वर्ष साईं बब्बा को 550 करोड़ का दान आया) दूसरी और नमो ने इसी महीने तिरुपति से 1800 किलो सोना लूट लिया ।

ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए आरएसएस कार्यकर्ता 'हिन्दू जागो' , 'एक हो जाओ', 'हिन्दू जागेगा देश जागेगा' टाइप के नारे लगाते है और इमानदारी से ये 'विश्वास' भी करते है कि ये नारे हिन्दू धर्म और मंदिरों की रक्षा करेंगे ।

आरएसएस एक 'राष्ट्रवादी' संघठन भी है और माना जाता है कि देश की सुरक्षा को लेकर जागरूक है । पर स्थिति ठीक इसके उलट है ।
- देश में बांग्लादेशी घुसपेठिये घुसे जा रहे है।
- जनसँख्या का धार्मिक संतुलन बिगड़ रहा है ।
- भारत की सेना कमज़ोर हो रही है ।

इन गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए आरएसएस ने जनसँख्या नियंत्रण क़ानून, नेशनल आईडी सिस्टम और घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए कभी कानूनी ड्राफ्ट्स नही दिए ।
जबकि नमो को लगता है कि बंगाल में जाकर रेली करने से बांग्लादेशी घुसपेठिये फिर से बंगाल चले जायेंगे । आकर्षक प्रयास, पर नाकाफी ।

भारत की सबसे गंभीर समस्या हथियार विहीन सेना है, किन्तु आरएसएस ने भारत की सेना को मज़बूत बनाने और स्वदेशी हथियारों के उत्पादन के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट्स नही दिए ।बल्कि जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स , तकनीक के लिए गणित विज्ञान में सात्य प्रणाली और हथियार बंद नागरिक समाज की रचना का हमेशा विरोध किया । हमे याद नही पड़ता कि आरएसएस ने कभी सेना के 'स' का भी उच्चारण किया हो । आरएसएस बिना मज़बूत सेना के किस राष्ट्र की कल्पना करता है, समझ से बाहर है ।

राष्ट्र को 'मज़बूत' बनाने के आरएसएस के अपने तरीके है , जिसमे हिन्दुओ को पौने 3 इंच का त्रिशूल वितरित करना और भारत विश्व गुरु है, भारतीय संस्कृति महान है आदि नारे लगाना शामिल है ।
मतलब आरएसएस यह विश्वास करता है कि यदि युद्ध के दौरान भारत की सीमाए टूट जाती है और आततायी शहरो में घुस आते है तो नागरिक AK -47 का मुकाबला त्रिशूल से करेंगे । क्या बक्वास है।
आखिर क्यों आरएसएस नागरिको के हथियार रखने के क़ानून का विरोध कर रहा है ?

माना जाता है कि आरएसएस हिन्दू धर्म की रक्षा करता है । किन्तु आरएसएस ने आदिवासी इलाको में धर्मांतरण रोकने के लिए कभी भी वांछित कानूनी ड्राफ्ट्स नही दिए, बल्कि उन कानूनों का सदैव विरोध किया जिन से सीमावर्ती आदिवासी इलाको में धार्मांतरण म कमी आये ।

आदिवासी इलाको में गरीबी और बेरोज़गारी बड़े पैमाने पर व्याप्त है, बाढ़, अकाल, सूखा और महामारी के लिए केंद्र द्वारा भेजी गयी मदद सरकारी अधिकारी और नेता डकार जाते है और विरोध होने पर दमन के लिए सेना को भेज देते है ।
ऐसे में मिशनरीज़ द्वारा उन्हें दवाईया, राशन, स्कूल और अस्पताल के माध्यम से मदद मिलती है और धर्मांतरण की सम्भावनाए बढ़ जाती है । सीमावर्ती इलाको में ज्यादा दमन से उन्हें विदेशी सत्ताए हथियार मुहैया करा देती है और नक्सलवाद पनपता है ।

यदि इन इलाको के नागरिको के पास जूरी सिस्टम और राईट टू रिकाल MP, MLA, SP हो तो इस दमन को रोका जा सकता है । वही DDMRCM क़ानून के लागू होने से खनिजो में इनके हक का पैसा इन्हें मिलने लगेगा और गरीबी और भुखमरी में कमी आएगी ।

किन्तु आरएसएस ने हमेशा इन कानूनों का विरोध किया है, जिस से नक्स़लवाद और धर्मांतरण को बढ़ावा मिला ।

लेकिन इन गंभीर विषयों को हल करने का आरएसएस के पास अजीब तरीका है, इस तरीके में इन कानूनों का प्रचार करने की जगह एक व्यक्ति 'दारा सिंह' जाता है और ग्राहम स्टेंस और टिमोथी स्टेंस को जिन्दा जला देता है।
जिस समस्या को संसद में क़ानून बनाकर आसानी से हमेशा के लिए हल किया जा सकता है उसकी जगह ये तरीके नाकाफी है , और समस्या को बढाने का ही कार्य करते है ।

आरएसएस और इसके द्वारा पोषित कई संघठन गौ हत्या रुकवाने में दशको से 'लगे' हुए है ।
परन्तु तथ्य यह है कि 2002 में गुजरात में बीफ का उत्पादन 9 लाख मीट्रिक टन था, जो कि 2012 में बढ़कर 22 लाख मीट्रिक टन हो गया ।

MP विधानसभा में कोंग्रेस विधायक आसिफ अकिल द्वारा 12 जुलाई 2014 को गौ हत्या निषेध बिल पेश किया गया, जिसे शिवराज सरकार ने गिरा दिया ।
सभी राज्य इकाइयों के आरएसएस, बीजेपी के नेता गौ माफिया है और उनकी मिलीभगत से ही ये सारा धंधा चल पाता है ।
बजाय इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने के आरएसएस ने गौ सेवको को सोशल मिडिया में गाय बचाओ गाय बचाओ के नारे लगाने में व्यस्त कर रखा है और क़ानून के अभाव में गायों की कटवाई जारी है ।

- मुझे सन 2010 में बंगाल के कृष्णा नगर स्थित इस्कोन टेम्पल देखने का अवसर मिला था, सैकड़ो एकड़ में फैला ऐसा भव्य और विशाल मंदिर देख कर मुझे बरबस विहिप के देशव्यापी नारे 'सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वहीँ बनायेंगे' की याद हो आयी ।

संसद को यह शक्ति है कि वह किसी भी न्यायाधीन मामले पर संसद में बिल पास कर के फैसले के निपटान के लिए कमिटी या आयोग बना सकती है ।
किन्तु लगता है कि अब आरएसएस को राम की सौगंध तोड़ने में ज्यादा सुविधा है न कि संसद में भव्य राम मंदिर निर्माण का क़ानून बनाने में ।
वैसे भी कृष्ण जन्म भूमि, काशी विश्वनाथ पर मंदिर बनाने का मंसूबा अब बीजेपी के घोषणा पत्र से हटाया जा चुका है, हालांकि श्री राम ,घोषणा पत्र के अंतिम पन्ने पर अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहे ।

धारा 370 पर नमो ने आरएसएस को 'बहस' करने की अनुमति दी है, बहस 66 वर्ष से चल रही है, शायद कुछ वर्ष और चलने से धारा 370 बहस से घबराकर स्वत: ही ख़त्म हो जायेगी ।
जबकि आरएसएस कार्यकर्ताओ का मानना है कि यदि सभी कार्यकर्ता सुबह शाम दोनों समय -
'दूध मांगा तो खीर देंगे,
कश्मीर माँगा तो चीर देंगे'
और 'कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है' टाइप के श्ललोको का जाप करते है तो धारा 370 उसी प्रकार गायब हो जायेगी जिस प्रकार घड़ी का बटन दबाने से मि. इंडिया गायब हो जाता है । हद हो गयी पोंगापंथी की ।
एक और मुद्दा था इनके थेले में !!!! अच्छा सा, हाँ... समान नागरिक संहिता । बड़े नारे चले थे इस पर भी, अब तो नारे भी नसीब नही इस विषय को । क़ानून बनाने की तो बात ही छोड़ दीजिये ।

सारांश यह है कि आरएसएस एक ऐसा थका हुआ चुम्बक है जो पूरे देश से उन कार्यकर्ताओं को अपनी और खींच लेता है जिसमे राष्ट्र प्रेम का जरा भी लौह अंश होता है ।

इन कार्यकर्ताओं को आरएसएस टोपी पहनकर पथ सञ्चालन करने, नारे लगाने, चिंतन शिविर करने, हिन्दुओ को 'जगाने', 'एकता' बढाने और ज्यादा से ज्यादा मेंबर बनाने में उसी प्रकार व्यस्त कर के रखता है जिस प्रकार 80 वर्ष पहले मोहन दास गांधी युवा कार्यकर्ताओं को बकरी का दूध पीकर, चरखा चलाने और भजन गाने में व्यस्त कर देते थे ।

इन चिल्लर हरकतों में करोडो युवको का टाइम पास हो जाता है और देश की सेना मज़बूत करने, भ्रष्टाचार कम करने और गरीबी कम करने के लिए आवशयक प्रजा लक्षी कानूनों का प्रचार नही हो पाता ।

यह नितांत आवश्यक है कि जो भी राजनेतिक दल या पार्टी यदि कोई समस्या उठाती है तो उसे समाधान भी कार्य्कर्ताओ को देना चाहिए । और यदि समाधान नारे है, वादे है और बयान है, तो ये समाधान नही बल्कि समाधान को टालने की चतुराई है , एक बौध्दिक बैईमानी । और कुछ नही ।
समाधान सिर्फ क़ानून ड्राफ्ट्स ही हो सकते है, क़ानून ड्राफ्ट्स स्पष्ट होते है और समस्या का वाजिब और कानूनी हल मुहैया कराते है , इस से संघठन की विचारधारा का स्पष्ट रूप से आशय प्रकट हो जाता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण यह खुलासा होता है कि अमुक संघठन की रुचि समस्या के समाधान में है या भावनाए भड़का कर वोट भुनाने की ।

तो आरएसएस ने चुनाव पूर्व इन सभी मुद्दों के कानूनी ड्राफ्ट अपने प्रचारको और बीजेपी को क्यों नही दिए ?

- क्योकि यदि ऐसा किया जाता तो आरएसएस इन मुद्दों को 'नियंत्रित' करने की क्षमता खो देता । यदि एक बार कानूनी ड्राफ्ट कार्यकर्ताओं में वितरित हो जाता है तो संघठन को उस मुद्दे के प्रति नही बल्कि उस ड्राफ्ट के प्रति वचनबद्धता दिखानी पड़ती है ।
इसलिए सभी पार्टिया और संघठन समस्या को उभाड़कर वोट खींचते है और सत्ता में आने के बाद कमेटी वगेरह बना कर टाइम पास करते है या कमजोर कानून बनाते है , ज़्यादातर तो क़ानून बनाते ही नही । अगले चुनाव में नये मुद्दे, फिर नये बयान , नये नारे आदि आदि । इस प्रकार समस्याओं को जिंदा रखने की ये राजनीति चलती रहती है ।

सबक - आइन्दा से यदि कोई संघठन आपके सामने कोई समस्या उठाता है तो कार्यकर्ताओं को चाहिए कि नेताओं से उस समस्या के समाधान का लिखित में कानूनी ड्राफ्ट देने को कहे ।

प्रजा अधीन राजा @ pk