Pawan Jury BhilwaraRj

"विस्मृत नायक"

अंतिम मुग़ल सम्राट .. बहादुर शाह ज़फर ।

अंतिम हिन्दू सम्राट..... ??????

युद्ध शुरू होने के साथ ही बैरम खान को एहसास हो गया था कि उसके फैसले ने मुग़ल सल्तनत को दांव पर लगा दिया है , बैरम खान का सामना ऐसे योद्धा से था जो अपने जीवन में कभी कोई युद्ध नही हारा था ।

मुगलों के सेनानायक अली कुली खान ने हाथियों को रोकने के लिए सामने की ज़मीन पर गड्ढे खुदवा दिए थे ताकि हाथी मुग़ल सेना पर चढ़ नही पाए , किन्तु सम्राट 'विक्रमादित्य हेमचन्द्र' ने दाहिने और बायीं तरफ से सेंध लगायी और राजपूत और अफगानी लड़ाके मुगलों पर टूट पड़े ।

बैरम खान चतुर रणनीतिकार था तथा उसे मुगलों की जीत पर पहले से ही अंदेशा था, इसलिए मुग़ल सल्तनत के वारिस को बचाने के लिए बैरम खान ने अकबर को रण भूमि से 5 कोस दूर रखा था , तथा ताकीद की थी कि यदि मुग़ल जंग में हार जाते है तो काबुल की और भाग जाये ।

सम्राट की तोपों ने अग्रिम मोर्चे को ढहा दिया था, और मुग़ल सेना की सुरक्षा पंक्ति टूटने से मुग़ल सेना घिर चुकी थी । पिछली पंक्ति से मुग़ल तीरंदाज़ तीर बरसा रहे थे ।

युद्ध एक तरफ़ा होता जा रहा था, मुग़ल असहाय थे, और दूर टीले से 13 वर्षीय बालक अकबर मुग़लो के पतन को देख रहा था ।

हाथियों की चिंघाड़ और तोपों की गर्जना संकेत दे रही थी कि मुग़लो के पाँव उखड चुके है ।

अकबर और उसके 5 हज़ार रक्षक पेशोपेश में थे कि युद्ध भूमि में जाकर मुगलों की मदद करने का जोखिम उठाये या सल्तनत का वारिस बचाने के लिए काबुल की और कूच करे ।

तभी हवा को चीरता हुआ एक तीर सम्राट 'विक्रमादित्य हेमचन्द्र' की आँख में आकर लगा । तीर का नश्तर इतना तीखा था की तीर सम्राट की आँख के को छेदता हुआ सिर के के पार हो गया ।

मर्मान्तक अंग विच्छेद से पीड़ित सम्राट अपने हौदे* से भूमी पर गिर पड़ा ।

*हौदा - हाथी पर सवारी के लिए बनायी गयी पालकी जिस पर छत्र होता है ।

सम्राट के भूमि पर गिर कर अचेत होने से सेना नेतृत्व विहीन हो गयी और भगदड़ मच गयी । तभी बैरम खान ने आगे बढ़कर सम्राट 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' को गिरफ्तार कर लिया और मुगलों की जीत हुयी ।

[ कुछ इतिहासकारो का मत है कि सम्राट ने अचेत होने से पहले अपने हाथो से तीर को निकाल दिया था ]

सम्राट को अकबर के सामने पेश किया गया, तथा बैरम खान ने अकबर से सम्राट का सिर कलम करने को कहा ।

अकबर ने सम्राट की ही तलवार से 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' का सिर कलम किया और "ग़ाज़ी" की उपाधि धारण की ।

[ कुछ इतिहासकारों का मत है कि अकबर ने नीम बेहोश सम्राट को क़त्ल करने से इनकार कर दिया था, तब बैरम खान ने स्वयं सम्राट का सिर कलम किया ]

सम्राट के सिर को काबुल में 'दिल्ली दरवाजा' के बुर्ज़ पर टांग दिया गया और धड़ को दिल्ली किले के दरवाजे पर लटकाया गया , ताकि हिंदूओ के जेहन में भय पैदा किया जा सके ।

इस तरह अंतिम हिन्दू सम्राट को शिकस्त दे कर अकबर की फ़ौज ने दिल्ली में आमद की और दिल्ली में मुग़ल सल्तनत कीं स्थापना हुयी , जिनका शासन भारत में अगले 300 वर्षो तक रहा ।

दिल्ली प्रवेश के बाद बैरम खान ने सल्तनत का डर अवाम में पैदा करने के लिए कत्ले आम का हुकुम जारी किया जो कि कई सालो तक चला ।

सम्राट 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' की रानी संतानों के साथ महल से पलायन कर गयी जिनका फिर इतिहास में कोई चिन्ह नही मिला ।

सम्राट के वृद्ध पिता को मुग़ल सिपहसालारो ने अलवर से गिरफ्तार किया और इस्लाम कुबूल न करने पर क़त्ल कर दिया ।

अकबर ने जंग की निशानी के तौर पर नरमुंडो की तीन मीनारो का निर्माण करवाया, जिनमे से अंतिम मीनार 1876 तक देखी गयी, जिसका भित्ति चित्र मौजूद है ।

यह युद्ध 5 नवम्बर 1556 ई. को पानीपत में बादशाह अकबर की सेना और सम्राट 'हेमचन्द्र विक्रमतदित्य' के बीच लड़ा गया था, जिसे पानीपत के द्वितीय युद्ध के नाम से जाना जाता है ।

सम्राट की सेना में 1200 हाथी, तोपखाना और 20 हज़ार घुड़सवार और सेनिक थे ।
जबकि मुग़ल सेना में 10 हज़ार घुड़सवार थे ।

परिचय एवं उत्कर्ष:

सम्राट 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' का जन्म मेवात प्रदेश के रेवाड़ी [हरियाणा] के वेश्य कुल में हुआ था । ये सूर वंश के आदिल शाह के सिपहसालार थे किन्तु अपनी लगन और योग्यता से जल्दी ही आदिल शाह के विश्वस्त बन गए अस्तु आदिल शाह ने इन्हें अपना प्रधानमन्त्री नियुक्त कर दिया था ।

फ़रवरी 1556 में हूमायू की मृत्यु होने से दिल्ली का तख़्त खाली हो गया था , तब हेमचन्द्र नें शाह मुहम्मद को हराकर बंगाल पर अधिकार कर लिया था ।

दिल्ली में हिन्दू शासन का अवसर देखकर हेमचन्द्र ने दिल्ली की और कूच कर दिया, और कालपी, ग्वालियर और आगरा पर अधिकार कर लिया ।

इस समय अकबर पंजाब् कलानौर में था ।

हेमचन्द्र ने दिल्ली पर हमला किया और अकबर के सेनानायक तरदी खां बेग को हरा कर अक्टूबर 1556 में दिल्ली के तख्त् पर अधिकार कर लिया , और "विक्रमादित्य" की उपाधि धारण की ।

अबुल फज़ल के "अकबरनामा" के अनुसार अकबर के अमीरों ने अकबर को काबुल चले जाने को कहा, परन्तु बैरम खान को खबर थी कि सम्राट सेना मजबूत कर के काबुल कंधार पर हमला करने की योजना बना रहा है इसलिए बैराम खान ने पानीपत में 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' से युद्ध करने का फैसला किया ।

एक साधारण परिवार से दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने वाले 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' को प्रसिद्द इतिहासकार एच एन कीन ने "भारत का नेपोलियन" कहा है ।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने अपने जीवन काल में कुल 22 लड़ाईया लड़ी और सभी में विजय हासिल की ।

सभी इतिहासकारों ने एकमत से 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' को "अंतिम हिन्दू सम्राट माना है ।

लेकिन हमारी पाठ्य पुस्तको में 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' को असम्मानजनक शब्द "हेमू" नाम से संबोधित किया है तथा उनकी भूमिका को कमतर कर के आँका गया है ।

हमें चाहिए कि सम्राट 'हेमचन्द्र विक्रमादित्य' को इतिहास में उनके गौरव के अनुरूप सम्मान दिलाने के लिए प्रयास करे ।

प्रजा अधीन राजा @ pkै