Pawan Jury BhilwaraRj
एसएम- कार्यकर्ताओं (सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं) द्वारा किये गए कार्य का श्रेय नेता ले रहे हैं,
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कैसे? उदाहरण--- एसएम- कार्यकर्ताओं तथा एसएमएस के कारण गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर ने गोवा के भाजपा विधायकों को फीफा का आनंद उठाने के लिए ब्राज़ील भेजने का 90 लाख रूपये का प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। बिकाऊ मीडिया इसका श्रेय मनोहर परिकर, नमो को दे रहा है। बड़े और प्रभावशाली नेता किसी अच्छे काम का श्रेय क्यों चुराना चाहते हैं? और बिकाऊ मीडिया इसमें उनकी मदद क्यों करता है? इसका कारण यह है कि संभ्रांत वर्ग (elite) नही चाहते की कार्यकर्ताओं को यह बात पता चले कि बिना किसी बड़े नेता की छत्रछाया के भी कार्यकर्ता कोई बड़ा बदलाव लाने में सफल हो सकते हैं।
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भाजपा के गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर ने गोवा के खेल विभाग के सचिव पर दबाव डाला कि वे 90 लाख रूपये का प्रोजेक्ट स्वीकृत करें जिसके तहत भाजपा के 6 विधायक फीफा का आनंद उठाने के लिए ब्राज़ील भेजे जाएँ। इस मुद्दे पर एसएम पर कार्यकर्ताओं ने आक्रोश भरे पोस्ट लिखने शुरू किये, तथा गोवा के कई रिकॉलिस्टों ने मतदाताओं से अपील करनी शुरू की ताकि वे अपने विधायक को एसएमएस भेजकर इस ट्रिप को रद्द करने का आदेश दें। अंततः एसएम तथा एसएमएस द्वारा किये गए प्रयासों के चलते परिकर अपने आदेश/ योजना को वापस लेने के लिए बाध्य हो गए।
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अब बिकाऊ मीडिया ने लोगों को बताया कि परिकर ने अपने निर्णय में परिवर्तन मनोहर परिकर , नमो के कहने पर किया!! इस तरह एसएमएस- कार्यकर्ताओं तथा एसएम- कार्यकर्ताओं द्वारा किये गए कार्य का श्रेय बिकाऊ मीडिया ने नमो को दिया।
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5000 वर्षों से चली आ रही दुखद कहानी का यह एक और नया अध्याय है--- इतिहास गवाह है कि कार्यकर्ता ही सब कुछ करता है और परिवर्तन लाता है, जबकि नेता अंत में आकर बिकाऊ मीडिया का सहारा लेकर सारा श्रेय ले लेता है। वस्तुतः अधिकांश बड़े नेता कार्यकर्ताओं का विरोध करते हैं, उन्हें दबाने, उनके आंदोलन को नष्ट करने तथा उन्हें जितनी जल्दी हो सके थका कर हार मनवाने की कोशिश करते हैं। अगर ऐसा करने में वे असफल हो जाते हैं, और आंदोलन बढ़ता ही जाता है, तब आखिरी क्षणों में वे आकर सारा श्रेय ले लेते हैं।
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और बिकाऊ मीडिया इसमें उनकी मदद क्यों करता है? इसका कारण यह है कि संभ्रांत वर्ग (elite) नही चाहते की कार्यकर्ताओं को यह बात पता चले कि बिना किसी बड़े नेता की छत्रछाया के भी कार्यकर्ता कोई बड़ा बदलाव लाने में सफल हो सकते हैं। संभ्रांत वर्ग (elite) नेताओं को रिश्वत देकर या उन्हें हटाने/ उनकी असलियत सामने लाने की धमकी देकर उन्हें अपने नियंत्रण में रख सकता है, चूँकि वे संख्या में कम होते हैं। किन्तु संभ्रांत वर्ग कार्यकर्ताओं को रिश्वत या धमकी देकर नियंत्रित नही कर सकते क्योंकि वे बहुत बड़ी संख्या में होते हैं। अतः वे एके जैसे दलालों को आम आदमी के प्रतिनिधि के मुखौटे में छिपाकर आगे बढ़ाते हैं। कार्यकर्ता बिकाऊ मीडिया की बातें सुनकर मूर्ख बन जाते हैं, तथा वे विश्वास करने लगते हैं कि सचमुच यह नेता आम आदमी का प्रतिनिधि/ हितैषी है, न कि संभ्रांत वर्ग का। अतः वे ऐसे नेता को महत्व देने लगते हैं। यहाँ तक कि स्वदेशी कार्यकर्ता भी बिकाऊ मीडिया की इस बात पर विश्वास करके मूर्ख बने कि नमो भारत से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व खत्म करने हेतु काम करेंगे।
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अतः संभ्रांत वर्ग (elite) बिकाऊ मीडिया का उपयोग करके कार्यकर्ताओं द्वारा किये गए सभी अच्छे कामों का श्रेय बड़े नेताओं को दिल देते हैं, चाहे वह बड़ा नेता नमो हो, एके, पीवी नरसिम्हाराव, या मनमोहन सिंह अथवा कोई और। वे कार्यकर्ताओं के बीच यह भ्रम बनाये रखना चाहते हैं कि "कार्यकर्ता बिना किसी बड़े नेता का सहारा लिए सफल नही हो सकते, अतः किसी भी बदलाव को लाने या किसी भी काम को करने में सफल होने के लिए जरूरी है कि पहले वे किसी बड़े नेता के अंध- भक्त बने!!" इस प्रकार कार्यकर्ता किसी बड़े नेता के अंध- भक्त बन जाते हैं, और उस नेता को रिश्वत देकर या धमकी देकर कार्यकर्ताओं को भी नियंत्रित करना संभव हो जाता है।
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समाधान यह है कि कार्यकर्ता ऐसे नेताओं के पीछे चलना छोड़ दें जो समय की कमी, वोट बटोरने, रणनीति आदि के नाम पर समझौता करने पर जोर देते हैं। जिस प्रकार एसएम- कार्यकर्ताओं तथा एसएमएस- कार्यकर्ताओं ने बिना किसी धरना, अनशन, या किसी बड़े नेता का सहारा लिए मनोहर परिकर को गोवा के 6 विधायकों के फीफा ट्रिप को रद्द करने के लिए बाध्य कर दिया, उसी प्रकार बिना धरना या अनशन के, और बिना किसी बड़े/ प्रभावशाली नेता का सहारा लिए वे और भी अनेकों बदलाव ला सकते हैं।
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--- राहुल चिमनभाई मेहता, राइट टू रिकॉल ग्रुप
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