Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
एक कौआ एक इमारत की छत पर बैठा। कौवे के वजन से इमारत ध्वस्त हो गयी, और गुप्तचर विभाग (इंटेलिजेंस ब्यूरो) ने सारा आरोप कौवे पर मढ़ दिया!!
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भारतीय गुप्तचर विभाग ने एक अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ग्रीनपीस को "देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा" बताया। इस प्रकार एनजीओ पर आरोप लगाकर गुप्तचर विभाग अपने 4 अंकीय आई क्यू (बुद्धिमत्ता) का परिचय दे रही है। गुप्तचर विभाग राष्ट्र को गुमराह कर रहा है। बिकाऊ एनजीओ तो ऐसे एजेंट हैं जो आवरण पर दिख रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के वास्तविक दलाल तो न्यायाधीश तथा बिका हुआ मीडिया है। जैसे- नर्मदा डैम का निर्माण वर्षों तक रोक रखने वाले और कोई नही बल्कि बिके हुए न्यायाधीश थे। तथा बिके हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इसे सही ठहराया। एनबीए के जैसे एनजीओ ने तो सिर्फ पीआईएल के लिए एक आवरण तैयार किया।
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भारत का विकास रोकने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक बिकाऊ न्यायाधीशों को स्टे आर्डर के लिए पैसे देते हैं, तथा बिकाऊ मीडिया का उपयोग यह भ्रम फ़ैलाने के लिए करते हैं कि न्यायाधीश प्रायः ईमानदार होते हैं और इसलिए उनके द्वारा दिए गए स्टे आर्डर भी न्यायसंगत हैं। बिकाऊ एनजीओ तो महज तमाशाई हैं, जो न्यायालय में उपस्थित होते हैं या धरना देते हैं।
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गुप्तचर विभाग केवल एनजीओ को दोषी ठहरा रहा है, और बिकाऊ मीडिया एवं बिकाऊ न्यायाधीशों का कोई जिक्र नही कर रहा। और इस प्रकार गुप्तचर विभाग ने अपनी रिपोर्ट में बिकाऊ मीडिया एवं बिकाऊ न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर उन्हें एक प्रकार से एक साफसुथरी छवि का प्रमाणपत्र दे दिया है।
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फलस्वरूप नागरिकों का पूरा ध्यान इस मामले में बिकाऊ एनजीओ की भूमिका पर केंद्रित हो जायेगा, और बिकाऊ मीडिया एवं बिकाऊ न्यायाधीशों पर किसी का ध्यान भी नही जायेगा। इस प्रकार समस्या हल होने की जगह और अधिक बढ़ती ही जाएगी।
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मेरे विचार से, कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे अन्य कार्यकर्ताओं को इस बारे में अधिक से अधिक सूचित करें कि कैसे और क्यों बिकाऊ न्यायाधीश स्टे आर्डर देकर प्रोजेक्टों को वर्षों तक विलम्बित करते हैं। कार्यकर्ताओं को यह तथ्य भी सामने लाना चाहिए कि गुप्तचर विभाग में इतनी हिम्मत नही है कि वे बिकाऊ मीडिया एवं बिकाऊ न्यायाधीशों के खिलाफ बोल सकें, और इसलिए वे मात्र इन बिकाऊ एनजीओ के पीछे पड़े हैं।
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--- राहुल चिमनभाई मेहता, राइट टू रिकॉल ग्रुप, 11- जून -2014.
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