Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
नमो द्वारा नवनियुक्त मुख्य सचिव आईएएस नृपेन्द्र मिश्रा ने आईएफएम में 5 वर्षों तक काम किया है, तथा हार्वर्ड से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है।
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ये मोदी की सरकार में सर्वोच्च बाबू (अधिकारी) होंगे। स्पष्ट है कि नमो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े किसी व्यक्ति को इस पद के लिए नियुक्त नही कर पाये। और इसके बदले ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जो 100% वैश्वीकरण के रंग में रंगा है। इस प्रकार यह भी एक और मन मोहन सिंह की तरह दिख रहे हैं।
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आईएफएम में नौकरी प्राप्त करना किसी आईएएस के लिए कठिन नही है। किन्तु वहां 5 साल के लम्बे समय तक टिक कर रहना उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो पूर्णतः एक गुलाम की मानसिकता रखता हो। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रवादी है तो वह 3-6 महीने के अंदर आईएफएम को या तो स्वयं ही छोड़ देगा, या उसे धक्के मारकर वह से निकाल दिया जायेगा। आईएफएम एजेंसी का मानना है कि भारत जैसे देश के नागरिकों को गुलामों की तरह काम करना चाहिए।
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और नृपेन्द्र मिश्रा तो ठहरे वीवीवीवीवीवीआईपी। मई- 31 को जो कानून प्रभावी था उसके अनुसार कोई भी व्यक्ति जो TRAI का प्रमुख रह चुका हो, मुख्य सचिव नहीं बन सकता। किन्तु 24 घंटो के अंदर, रविवार को नमो ने एक अधिसूचना प्रकाशित करके TRAI अधिनियम को संशोधित कर दिया, ताकि उनके मुख्य सचिव बनाने में कोई रूकावट न हो!! मुझे आश्चर्य है, नमो ने अब तक इसकी 10% भी तत्परता मॉरीशस मार्ग को समाप्त करने के लिए क्यों नही दिखाई?
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जो भी हो, नमो प्रधान मंत्री हैं तथा अपना मुख्य सचिव वे स्वयं ही नियुक्त करेंगे। किन्तु इतने सारे व्यक्तियों में से यदि नमो आईएफएम के पूर्व कर्मचारी को ही चुनते हैं तो दाल में कुछ काला दिखता है।
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--- - by Rahul Chimanbhai Mehta, Right to Recall Group.
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