Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
नृपेन्द्र मिश्रा की नाटकीय तथा त्वरित नियुक्ति यह दर्शाती है कि आईएफएम = विदेशी संभ्रांत वर्ग (elit) ही प्रधान मंत्री कार्यालय को संचालित कर रहे हैं।
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संभ्रांत वर्ग (elit) की एक पुरानी कार्यप्रणाली इस प्रकार है-- जब एक संभ्रांत व्यक्ति, जैसे मुकेशभाई अम्बानी एक सांसद या मंत्री को बनाते हैं, तो मुकेशभाई ही निर्णय करते हैं कि उस सांसद या मंत्री का पीए, पीएस आदि कौन होगा। इससे मुकेशभाई उस मंत्री की गतिविधियों पर नजर रख सकेंगे। दुनिया पिछले 5000 वर्षों से इसी प्रकार चल रही है।
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ऐसा माना जा रहा है कि नृपेन्द्र मिश्रा आईएफएम के आदमी हैं। तो क्या आईएफएम आदि ने ही यह निर्देश दिया कि नृपेन्द्र मिश्रा ही मुख्य सचिव बनाये जाएँ?
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क्या नमो मिश्रा को निजी तौर पर ठीक से जानते हैं? क्या उन्होंने उनके साथ कभी काम किया है? मैंने कभी भी नही सुना कि मिश्रा ने गुजरात में कभी काम किया हो। तो नमो ने गुजरात कैडर के अफसरों में से ही किसी एक को क्यों नही चुना, जिनके साथ उन्होंने कई वर्षों तक काम किया है?
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अब यदि मुख्य सचिव के पद पर मिश्रा को नियुक्त करने का फैसला भाजपा या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या स्वयं नमो का है तब तो ठीक है। किन्तु यदि यह फैसला आईएफएम ने किया है, तो कुछ न कुछ गड़बड़ है। कृपया मिश्रा की नियुक्ति को इस सन्दर्भ से जोड़कर देखें कि प्रधान मंत्री कार्यालय ने कितनी शीघ्रता से विदेशी संभ्रांत वर्ग (elit) की रक्षा, समाचारपत्रों आदि में एफडीआई को अनुमति देने की मांग को पूरा किया। अतः मुझे लगता है, सब कुछ गड़बड़ है। हम फिर से पी वी नरसिम्हाराव के दिनों में जा सकते हैं जब आईएफएम भारत के सभी नीतिगत निर्णय लेती थी। मैंने जून- 2013 में एक वीडियो बनाया था, जिसमे मैंने कहा था कि "बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक बिकाऊ मीडिया तथा एके का प्रयोग करके नमो/ भाजपा को किनारे कर देंगे, अथवा अपनी सभी शर्तें मानने के लिए मजबूर कर देंगे।" और ऐसा ही हुआ होगा।