Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के अनेक कार्यकर्ता तथा आआपा एवं कांग्रेस के कार्यकर्ता एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के पक्ष में निम्नलिखित गलत तर्क दे रहे हैं-" पैसा सिर्फ आ रहा है, तो इसमें विरोध करने की क्या बात है?" इसका जवाब है- कर्ज की तरह ही एफडीआई में भी, सरकार= राष्ट्र को इसके लिए वचनबद्ध होना पड़ता है कि जब भी निवेशक अपनी पूँजी और लाभांश को वापस लेना चाहेगा तो उसे वे डॉलर के रूप में पूरी कीमत चुकाएंगे!!! जबकि रूपये के रूप में किया गया निवेश इस प्रकार की प्रतिबद्धताओं तथा शर्तों से मुक्त होता है । समाधान? अंतिम पैराग्राफ देखें।
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कर्ज का मतलब वह राशि अथवा वस्तु है, जिसे चुकाने की वचनबद्धता होती है। निवेश में सरकार या राष्ट्र की ऐसी कोई वचनबद्धता नही होती -- हानि- लाभ का जोखिम निवेशक का स्वयं का होता है। किन्तु एफडीआई तो एक रोचक वर्णसंकर है। मान लीजिये एक निवेशक 1 अरब डॉलर= 6000 रूपये भारत में निवेश करता है, तो सरकार उसे 1 अरब डॉलर+ उसपर होनेवाला लाभ उसे डॉलर के रूप में वापस देने की प्रतिबद्धता देगी। उस समय प्रचलित विनिमय दर आज से अलग हो सकता है, किन्तु डॉलर के रूप में चुकाना होगा। । अतः एफडीआई अन्य निवेशों की तरह नही है जिनमे सरकार की प्रतिबद्धता नही होती।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये मुंबई का एक व्यक्ति दिल्ली में निवेश करता है। ऐसी स्थिति में दिल्ली सरकार बदले में उसे कुछ भी चुकाने की वचनबद्धता नही देती। किन्तु एफडीआई में बदले में डॉलर चुकाने की वचनबद्धता होगी।
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ऐसी वचनबद्धता विगत में भी विनाशकारी रही है, और भविष्य के लिए भी उतनी ही घातक है। यदि सरकार के पास बदले में चुकाने के लिए उतने डॉलर नही होंगे तो यह विनाशकारी हो जाएगी। जैसे- वर्तमान में 360 अरब डॉलर= 360* 6000 करोड़ रूपये = लगभग 21 लाख करोड़ रूपये का एफडीआई है, तथा कर्ज 300 अरब डॉलर= 300 * 6000 करोड़ रूपये = लगभग 18 लाख करोड़ रूपये है। भारत सरकार के पास कुल 300 अरब डॉलर= 18 लाख करोड़ रूपये है। अतः यदि विदेशी निवेशक अपना निवेश बेचना चाहें तथा अपनी रकम वापस चाहें, तो उसे चुकाने के लिए हो सकता है सरकार के पास पर्याप्त डॉलर न हों। इससे गंभीर डॉलर ( विदेशी मुद्रा) संकट उत्पन्न हो जायेगा, रूपया गिरने लगेगा, तथा पेट्रोल के साथ साथ सभी आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी।
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सारांश यह है कि एफडीआई समर्थक जैसे- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता अब इस तथ्य को स्पष्टतः छिपा रहे हैं कि एफडीआई में डॉलर के रूप में भुगतान करने की अप्रत्यक्ष वचनबद्धता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता एफडीआई को इस प्रकार से पेश कर रहे हैं कि यह "बिना किसी वचनबद्धता के अथवा सरकार या राष्ट्र पर बिना कोई बोझ डाले आनेवाला पैसा है।" इस प्रकार से झूठ बोलने का कारण तो सिर्फ वे स्वयं ही जानते होंगे। आआपा एवं कांग्रेस के कार्यकर्ता तो शुरू से ही मॉरीशस मार्ग के समर्थक रहे हैं। ये दोनों ही स्वयं भी एफडीआई के ही उदाहरण हैं। अब इनका साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता भी दे रहे हैं।
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समाधान : हमें ऐसे कानून ड्राफ्ट लागू करने की आवश्यकता है जो भारत के नागरिकों को अपने बैंक खातों में डॉलर रखने की अनुमति दे, तथा उन्हें इसके बारे में आयकर विभाग को सूचना देनी हो। यह खाता एक मान्यताप्राप्त यूएस बैंक में होगा जिसका संचालन भारत में एसबीआई करेगा। अब यदि कोई विदेशी निवेशक आएगा तो उसे इन व्यक्तियों से भी निजी तौर पर पैसे प्राप्त हो सकेंगे, और जब वो जाना चाहेंगे तो इन्ही व्यक्तियों से उन्हें निजी तौर पर ही डॉलर प्राप्त करने होंगे। सरकार या आरबीआई को इन्हें डॉलर चुकाने का कोई वादा नही करना होगा। साथ ही, कुछ खास उद्योगों से विदेशियों को प्रतिबंधित करना होगा। शेष में वे निवेश कर सकते हैं।
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इससे भारतीयों तथा विदेशियों के बीच एक आधार निर्मित होगा।
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इससे सिर्फ विदेशी मुद्रा की व्यवस्था की समस्या ही हल होगी। मुख्य समस्या है-- हमारी फैक्टरियां अमेरिकी तथा यहाँ तक कि चीनी फैक्टरियों की तुलना में भी काफी कम सक्षम है। जब तक हम यह समस्या हल न कर लें, तब तक अर्थव्यवस्था तथा फिर सेना के माध्यम से विदेशी वर्चस्व की समस्या भी बरकरार रहेगी। इसका समाधान है- टीसीपी, डीडीएमआरसीएएम= एमआरसीएम, ज्यूरी सिस्टम, राइट टू रिकॉल, संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि।
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चाहे आपको एफडीआई के बारे में सही- सही जानकारी प्राप्त करनी हो, अथवा एफडीआई का समाधान/ विकल्प तलाशना हो, कृपया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट, आआपा, कांग्रेस आदि के कार्यकर्ताओं के साथ अपना समय व्यर्थ न करें। आआपा और कांग्रेस तो स्वयं ही एफडीआई का जीता जागता उदाहरण हैं- एक को 1880 के दशक में ब्रिटीश लाये थे, तथा दूसरे को फोर्ड फाउंडेशन अप्रैल- 2011 में लाया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ/ भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता पहले नमो के अंध भक्त थे, और अब वे एफडीआई के अंध भक्त भी हैं। यदि आप स्वदेशी समर्थक हैं, तो उनसे बात करके अआप्का सिर्फ समय नष्ट होना है। अतः कृपया राइट टू रिकॉल ग्रुप में शामिल हों। हमारा ग्रुप ही एकमात्र है जो भारत की तरक्की के लिए एफडीआई हटाने तथा उपयोगी कानून ड्राफ्ट लाने के लिए प्रयास कर रहा है।
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मैंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ताओं के बारे में जो कहा उसमे मेरा उद्देश्य उनपर तंज करना नहीं है, ताकि वे भी स्वदेशी बन जाएँ। किन्तु मेरा उद्देश्य यह है कि बाकी कार्यकर्ता उनसे बातें करके अपना समय व्यर्थ न करें। यदि राजीव दीक्षित भारत स्वाभिमान कार्यकताओं को मॉरीशस मार्ग का विरोध करने को तैयार न कर सके तो मैं कौन होता हूँ उन्हें समझाने वाला। वे बेशरम लोग हैं, उनपर तंज करने से कोई असर नही होने वाला । मैं चाहता हूँ कि एक सच्चा स्वदेशी इनके चक्कर में पड़ कर अपना समय नष्ट न करें। उनके खिलाफ लिखने के पीछे मेरा एकमात्र उद्देश्य यही है।