Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Hindi translation of chap-9 of the article "कौन से कानून ड्राफ्ट मंदिरों के प्रशासन में सुधार ला कर सभी हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं?"
Chap- 9. मेरे द्वारा प्रस्तावित समाधान संक्षेप में
The main article is --- what law-drafts can make all sects of Hinduism as powerful as Sikhism . The full article is at facebook . com / note.php ? note_id = 10151479439181922 )
हिन्दू मंदिरों के लिए मैं यहाँ सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम जैसी एक संरचना प्रस्तावित करने जा रहा हूँ। समस्या यह है कि हिन्दू धर्म में अनेक संप्रदाय हैं तथा इनमें से प्रत्येक स्वयं को दूसरे से अलग रखना चाहता है। साथ हीं एक मुख्य समस्या करों से सम्बंधित है। धार्मिक ट्रस्टों पर कॉर्पोरेट के समतुल्य हीं परन्तु कुछ छूट के साथ कर लगाये जाते हैं। यदि ट्रस्टों पर कर नहीं लगाया जाये तो लोग ट्रस्ट बनाकर उसके माध्यम से करों से बचने लगेंगे। एक अन्य मुद्दा राज्य- केंद्र सम्बन्ध तथा भाषा का है। भाषा की समस्या के चलते सभी राज्य अपने सभी मंदिरों का प्रबंधन केंद्र के अधिकार में नहीं देना चाहते।
मैं जो समाधान प्रस्तावित कर रहा हूँ उसमें तीन प्रकार के HMPC= हिन्दू मंदिर प्रबंधक समिति के गठन का प्रावधान है- एक राष्ट्रीय स्तर पर, प्रत्येक राज्य के लिए एक, तथा प्रत्येक संप्रदाय के लिए एक। प्रत्येक समिति में एक प्रमुख तथा 4 ऐसे सदस्य होंगे जिनका निर्वाचन मतदाताओं द्वारा 2 वर्ष के कार्यकाल के लिए होगा। किन्तु किसी भी दिन मतदाता SMS/ ATM द्वारा अथवा पटवारी के कार्यालय में स्वयं जाकर उन्हें वापस बुलाने का मत देकर वापस भी बुला सकते हैं। प्रत्येक HMPC को धार्मिक ट्रस्ट की श्रेणी प्राप्त होगी। एक व्यक्ति इसके निर्वाचित सदस्य के तौर पर अपने पूरे जीवनकाल में अधिकतम 4 वर्ष हीं रह सकता है। साथ हीं पुजारी तथा कर्मचारियों की नियुक्ति लिखित परीक्षा द्वारा होगी तथा ज्यूरी सिस्टम का उपयोग करके इन्हें पदच्युत किया जा सकेगा। नियमित अदालत की न्यायपीठ (ज्यूरी) द्वारा आपराधिक मामलों की सुनवाई होगी।
प्रत्येक HMPC की सम्पत्ति पर कर लगेगा, तथा 100 रूपये (या एक निश्चित रकम) प्रति सदस्य प्रति वर्ष चुकाने का नियम लागू होगा। प्रत्येक नागरिक 5 ट्रस्टों को करों में राहत या छूट प्रदान कर सकता है। करारोपण के नियम सभी ट्रस्टों के लिए समान होंगे, चाहे वे हिन्दू, क्रिस्चियन, सिख, जैन, मुस्लिम, बौद्ध या कोई अन्य दान संस्था अथवा ट्रस्ट हों। एक नागरिक कितने भी ट्रस्टों का सदस्य हो सकता है। सदस्य दो प्रकार के हो सकते हैं- मतदाता सदस्य तथा गैर- मतदाता सदस्य। सिर्फ मतदाता सदस्य हीं समिति सदस्यों का निर्वाचन कर सकते हैं।
इसका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है-
1. NHDPT= ( राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट): प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्मजात मतदाता सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। इस ट्रस्ट को अपनी ओर से करों में छूट का लाभ वे दे भी सकते हैं और नहीं भी, किन्तु प्रत्येक स्थिति में उनका मतदान का अधिकार बना रहेगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का निर्वाचन सभी सदस्य मिलकर करते हैं, तथा उनके पास उसे वापस बुलाने का अधिकार भी होता है। प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जाती है, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। आरम्भ में NHMPT मात्र 4 मंदिरों का प्रबंधन करेगी- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यह अन्य मंदिरों का प्रबंधन भी कर सकती है, यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से मंदिर को इसके सुपुर्द कर दे।
2. RHDPT= ( राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट): प्रत्येक राज्य में एक RHDPT होगा, जिसके सदस्य उस राज्य के प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि मतदाता होंगे, तथा वे तब तक सदस्य बने रहेंगे जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता न छोड़ना चाहें। वे चाहें तो अपनी ओर से ट्रस्ट को करों में छूट का लाभ दे सकते हैं और नही भी दे सकते, इससे उनका मतदान का अधिकार प्रभावित नही होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का निर्वाचन सभी सदस्य मिलकर करेंगे, तथा उनके पास उसे वापस बुलाने का अधिकार भी होगा। प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जायेगी, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। आरम्भ में RHDPT राज्य के उन्हीं मंदिरों की व्यवस्था करेगा जिन्हें कि सम्बंधित संप्रदाय उस राज्य के सम्पूर्ण हिन्दू समुदाय के सुपुर्द करना चाहेगा।
3. RT = ( रिलिजियस ट्रस्ट अथवा धार्मिक ट्रस्ट): जितने भी हिन्दू ट्रस्ट अस्तित्व में हैं उनमें से प्रत्येक को इस श्रेणी में रखेंगे। आरम्भ में सिर्फ ट्रस्टी हीं VM= वोटिंग मेंबर (मतदाता सदस्य) होंगे, तथा NVM= नॉन वोटिंग मेंबर्स (गैर मतदाता सदस्य) की संख्या शून्य होगी। फिर वर्त्तमान मतदाता सदस्य 67% के बहुमत के साथ और मतदाता सदस्यों तथा गैर मतदाता सदस्यों को जोड़ सकते हैं। कोई एक नागरिक कितने भी धार्मिक ट्रस्टों में मतदाता सदस्य तथा गैर मतदाता सदस्य हो सकता है, बशर्ते उस धार्मिक ट्रस्ट को भी अपने सदस्यों के अन्य ट्रस्टों के सदस्य बनने से कोई एतराज न हो। प्रमुख की नियुक्ति मतदाता सदस्यों (VMs) द्वारा होती है जो कि 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति करता है। मतदाता सदस्य प्रमुख या किसी भी व्यवस्थापक को किसी भी दिन हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। यदि इस ट्रस्ट (RT) में ऐसा कोई आतंरिक कानून है कि मतदाता सदस्यों के बच्चे भी मतदाता सदस्य बन जायेंगे तो स्वतः वे बच्चे मतदाता सदस्य बन जायेंगे। और एक बार यदि कोई RT इस नियम को लागू करती है तो फिर वह उसे रद्द नहीं कर सकती।
4. मुस्लिम तथा क्रिश्चियन धार्मिक ट्रस्टों की व्यवस्था वर्त्तमान कानूनों के अनुसार हीं होगी। करों के लिए भी उनपर समान नियम लागू होंगे। तथा करों में उन्हें प्राप्त होने वाली छूट भी उनके सदस्यों द्वारा प्राप्त होने वाले कर छूट के यूनिटों के अनुपात में होगी।
वर्त्तमान में भारत में धार्मिक ट्रस्ट कोई आय कर तथा सम्पत्ति कर नहीं देते, इसमें बदलाव आएगा ।
इस प्रावधान के लागू होने पर सभी ट्रस्टों को अपने स्वामित्त्व वाले प्लाट/ इमारतों तथा सोना/ चांदी के बाजार मूल्य के अनुसार तथा अपनी आय तथा प्राप्त होने वाले दान के अनुसार कर चुकाने होंगे। करों में छूट इस बात पर निर्भर करेगी कि नागरिकों से कर छूट के कितने यूनिट उन्हें प्राप्त होते हैं। वर्त्तमान ट्रस्टों के लिए ट्रस्टी हीं मतदाता सदस्य माने जायेगे, तथा उन्हें गैर मतदाता सदस्यों की आवश्यकता नहीं होगी।