Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Chap-2 of "कौन से कानून ड्राफ्ट मंदिरों के प्रशासन में सुधार ला कर सभी हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं?"
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Chap-2
विभिन्न धार्मिक विश्वास तथा उनसे जुड़े धार्मिक संस्थानो में नियुक्तियां एवं प्रशासन
धर्म के दो पहलू होते हैं:
(1) ईश्वर, आत्मा, आध्यात्म आदि में विश्वास
(2) वह प्रशासन जिसके अधीन धर्मस्थलों के पुजारी या प्रमुख, व्यवस्थापक, तथा सम्पदा होती है।
धर्मस्थल के पुजारियों तथा व्यवस्थापकों सम्बन्धी व्यवस्था जिस तरीके से की जाती है उसका सीधा असर उस धर्म विशेष में लोगों की आस्था के ऊपर पड़ता है। प्रत्येक धर्म के अनुयायी भारी मात्रा में सहायता व चंदे की राशि अपने मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि को दान करते हैं। अब मैं विभिन्न धर्मों द्वारा निम्नलिखित मुद्दों पर निर्णय लेने के तरीकों की तुलना करके उनमें अंतर देखना चाहूंगा-
(2a) धर्मस्थल के पैसों का उपयोग कहाँ किया जाये इसका निर्णय कौन करता है।
(2b) धर्माचार्यों एवं व्यवस्थापकों की नियुक्ति कौन करता है तथा किस प्रक्रिया के द्वारा एक पीढ़ी दुसरी पीढ़ी के पुजारी अथवा धर्माचार्य को नियुक्त करती है।
(2c) धर्मस्थल का धन किस प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता है।
(2d) जो तरीका (a) से लेकर (c) तक के लिए प्रयोग किया जाता है उसी से तय होता है कि "धर्माचार्य जो सन्देश समुदाय के सदस्यों को देते हैं उनपर अनुयायियों का कितना नियंत्रण होगा।"
अतः धर्मस्थलों की संपत्ति की व्यवस्था प्राचीन हिन्दू धर्म, वर्त्तमान हिन्दू धर्म, चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारों आदि में किस प्रकार होती रही है?
1. प्राचीन हिंदूवाद के अंतर्गत "मंदिरों" का प्रशासन-
रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो!! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस काल में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर- गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र- शस्त्र की शिक्षा देने, गरीबों को औषधि उपलब्ध कराने तथा उनके कल्याण हेतु किया जाता था। इसलिए आश्रम- प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम- प्रमुख के पुत्र को हीं आश्रम की बागडोर हस्तांतरित हो जाये। यह एक संत से दूसरे ऐसे संत को हस्तांतरित होता था जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनकी कार्यावधि भी स्थायी नही होती थी। संत हमेशा यात्रा पर भी जाते रहते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में शेष रह गई है।
अनुयायियों का कितना नियंत्रण मंदिरों तथा उनके संदेशों पर था: अनुयायियों का कितना नियंत्रण उस समय मंदिरों पर था यह स्पष्ट नही हो पाया है, चूँकि अब यह विगत की बात हो गयी है तथा इसके लिए लिखित सामग्री भी बहुत उपलब्ध नही है।
2. वर्त्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन-
वर्त्तमान में मंदिर सामुदायिक सम्पदा नहीं हैं। इनका स्वामित्व कानूनी रूप से किसी ट्रस्ट के पास होता है, बिलकुल उसी तरह जैसे उनकी निजी संपत्ति हो। मंदिरों के मालिक उर्फ़ ट्रस्टी हीं निर्णय करते हैं कि मंदिर का धन कहाँ और किस काम में खर्च किया जाये। ट्रस्टी का कार्यकाल प्रायः आजीवन होता है, तथा वर्त्तमान ट्रस्टी हीं अगले ट्रस्टियों की नियुक्ति भी करते हैं, जो एक प्रकार से मालिक भी कहे जा सकते हैं। इस प्रकार मंदिरों का स्वामित्व एक ट्रस्टी से दुसरे ट्रस्टी को हस्तांतरित होता है, जो कि वर्त्तमान ट्रस्टियों द्वारा हीं नियुक्त किये जाते हैं न कि किसी चुनाव प्रक्रिया द्वारा। साथ हीं बहुत से प्रमुख व्यक्ति स्वयं को आजीवन के लिए स्वयं- नियुक्त कर लेते हैं। अतः व्यवस्था का लम्बे समय तक अयोग्य व्यक्ति के हाथ में रहना सम्भव है। वर्त्तमान मालिक की मृत्यु हो जाने पर नए मालिक की नियुक्ति उत्तराधिकार द्वारा होती है। अर्थात मंदिर के मालिक का पुत्र या कोई भांजा आदि हीं उसके बाद मंदिर का मालिक बनता है। कुछ समुदायों में मंदिर के मालिक को अविवाहित रहना पड़ता है, वहाँ गुरु प्रथा है। यानी जाने से पहले मंदिर प्रमुख अपने किसी प्रिय शिष्य को अगला गुरु नियुक्त कर के जाते हैं। पुजारी का स्थानांतरण भी हो सकता है। किन्तु यदि समुदाय बहुत छोटा है तो ज्यादा स्थानांतरण सम्भव नही।
वर्त्तमान हिन्दू मंदिरों पर अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायी, जिनमें मध्य संभ्रांत वर्ग शामिल है, उनका मंदिर के पुजारी पर अथवा उसके द्वारा समाज को दिए जाने वाले संदेशों पर या मंदिर के धन का उपयोग सम्बन्धी व्यवस्थापकों द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर कोई नियंत्रण नही होता। सत्ताधारी उच्च वर्ग का काफी हस्तक्षेप हो सकता है, चूँकि पुजारी काफी हद तक ट्रस्टियों पर निर्भर होता है। किन्तु ऐसे मंदिरों में जहाँ पुजारी स्वयं हीं मालिक भी है, वहाँ सत्ताधारी उच्च वर्ग का भी हस्तक्षेप न के बराबर होता है।
3. मस्जिद का प्रशासन-
मस्जिद का स्वामित्व ट्रस्ट के पास होता है जिसे "वक्फ' कहते हैं। ट्रस्ट के सदस्य समुदाय के बुजुर्ग, सम्मानित व्यवसायी, योद्धा तथा समाज में अन्य सम्मानित व्यक्ति होते हैं। इनकी नियुक्ति खुली सार्वजनिक बैठक में स्थानीय मुस्लिम बुजुर्गों की आमराय से होती है। प्रत्येक स्थानीय मुस्लिम को इस बैठक में शामिल होने को कहा जाता है। कोई औपचारिक मतदान नही होता, किन्तु अस्पष्ट तौर पर मतदान होता भी है। ट्रस्टी आजीवन के लिए नही होते बल्कि प्रत्येक 4- 5 वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं। फिर से नियुक्ति की प्रक्रिया दोहराई जाती है, जिसमें वे पुनःनियुक्त हो सकते हैं। ट्रस्टी के पुत्र की नियुक्ति की कोई गारंटी नही होती। तथा एक ही परिवार से कई सदस्यों की नियुक्ति आमतौर पर नही की जाती है। वस्तुतः कुछ ट्रस्टों की तो परंपरा हीं होती है कि एक समय में एक परिवार का केवल एक हीं सदस्य ट्रस्टी बन सकता है। मुल्ला एक वेतनभोगी कर्मचारी होता है जिसकी नियुक्ति ट्रस्टी करते हैं। मस्जिद की संपत्ति तथा दान में मिले धन को कैसे उपयोग किया जायेगा इसका निर्णय ट्रस्टी लेते हैं। कोई उत्तराधिकार या गुरुप्रथा नही होती। मुल्ला के पास किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से डिग्री होनी चाहिए जैसे देवबधी आदि से। एक मस्जिद से दुसरी मस्जिद में मुल्ला का स्थानांतरण हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में मुल्ला अर्ध- न्यायिक कर्तव्य भी निभाता है, तथा विवादों का निबटारा करता है , साथ हीं सजा भी देता है। इसे हीं कभी कभी शरीयत न्यायालय कहते हैं। इस प्रकार की सभी न्यायिक एवं व्यवस्था सम्बन्धी निर्णय आम सभा करके ली जाती है।
अनुयायियों का मस्जिद पर नियंत्रण: गरीब अनुयायियों का तो कोई हस्तक्षेप मस्जिद की व्यवस्था या धन पर नही होता। किन्तु मध्य संभ्रांत वर्ग ट्रस्टी बन सकते हैं। अतः मौलवी पर, उसके द्वारा समाज को दिए जाने वाले संदेशों पर तथा मस्जिद के धन का उपयोग सम्बन्धी निर्णयों पर मध्य संभ्रांत वर्ग का नियंत्रण होता है।
4. कैथोलिक चर्च का प्रशासन-
(देखें: bible . ca / catholic-church-hierarchyorganization.htm)
कैथोलिक धर्माचार्य या पादरी आजीवन अविवाहित रहते हैं तथा अपने नाम से संपत्ति भी नही रख सकते। जो भी संपत्ति या दान चर्च को मिलता है वह वेटिकन का हो जाता है। कैथोलिक पद- स्तर इस प्रकार है- पोप > बिशप > स्थानीय पादरी। दुनियाभर में लगभग 1 करोड़ कैथोलिक हैं, जिनकी सेवा के लिए लगभग 3000 बिशप तथा 2 लाख स्थानीय पादरी है। कुछ बिशप को कार्डिनल या आर्कबिशप की उपाधि मिली होती है। यह उपाधि पोप द्वारा वर्त्तमान कार्डिनलों तथा आर्कबिशापों की राय लेने के बाद दी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण चीज यह देखी जाती है कि कितने नये सदस्य इन्होने जोड़े तथा बनाये रखे। वर्त्तमान में लगभग 120 कार्डिनल हैं। कार्डिनल प्रायः आजीवन सेवा प्रदान करते है। किन्तु प्रायः वे 80 साल की उम्र के बाद उतने सक्रिय नहीं रह जाते। फिर भी उनकी कार्डिनल की उपाधि बनी रहती है। पोप का कार्यकाल भी आजीवन होता है। लेकिन अब धीरे- धीरे पोप के 85 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त होने का चलन आ रहा है। कैथोलिक तथा वर्त्तमान हिन्दू समुदायों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि 100- 150 कार्डिनल मिलकर अगले पोप की नियुक्ति करते हैं, तथा यह उत्तराधिकार गुरुप्रथा द्वारा नही होता। अगला पोप कौन होगा इसपर वर्त्तमान सेवानिवृत्त होने जा रहे पोप कोई बयान नही देते या अपनी पसंद नही बताते। चूँकि पादरी हीं विवाह नही करता, अतः इस पूरी पद- श्रंखला में उत्तराधिकार का कोई प्रश्न हीं नही उठता। मान लीजिये पादरी का कोई प्रेम-प्रसंग हो और उसके चलते उसका कोई बच्चा भी हो, तो जरूरी नही कि वह बच्चा भी अविवाहित रहकर पादरी बनना चाहे। पादरी का स्थानांतरण देश के अंदर तथा देश के बाहर भी होना आम बात है। इससे उसे पूरी दुनिया से पहचान बनाने का मौका मिलता है। पादरी यदि किसी पेशे से जुड़ना चाहे तो इसे अच्छा समझा जाता है। उदाहरण के लिए - बहुत से पादरी शिक्षक, चिकित्सक, वकील, सम्पादक तथा यहाँ तक कि निम्न स्तर के समझे जाने वाले काम जैसे बढ़ई का काम भी करते हैं। पादरी को पुलिस या अन्य प्रभुत्त्व मिलने वाले कार्य नही करने होते हैं। किन्तु युद्ध के समय यदि वे सेना में भर्ती होना चाहें तो इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। लगभग 300 ई. से लेकर अब तक पूरे यूरोप में बड़ी संख्या में पादरियों ने न्यायाधीश के पद पर कार्य किया है। इसमें कमी तब आई जब यूरोप में ज्यूरी सिस्टम आरम्भ हुआ। गरीब रहने की शपथ लेने के कारण पादरी अपने नाम से संपत्ति नही रख सकता। उनके पास अपने नाम से कोई घर, कार, बैंक खाता नही होता। सारा धन चर्च के नाम से रहता है। वे अपनी नौकरी से प्राप्त वेतन भी चर्च में जमा कर देते हैं। तथा वे ऐशो आराम की जिंदगी नही बिताते।
अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायी चाहे वे गरीब हों या मध्य संभ्रांत वर्ग या सत्ताधारी उच्च वर्ग, उनका कोई सीधा हस्तक्षेप नही होता। लेकिन इसके बदले पादरी का भी कोई उत्तराधिकार नही होता।
5. चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन-
चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन इंग्लैंड की महारानी तथा कैंटबरी के आर्कबिशप के अधीन होता है। सैद्धांतिक रूप से तो प्रधान मंत्री तथा सांसदों का कोई हस्तक्षेप नही होता, किन्तु वास्तव में उनका काफी हस्तक्षेप इस बात पर होता है कि महारानी, आर्कबिशप तथा पादरी किस प्रकार चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन चलाएंगे। हालांकि प्रधान मंत्री, सांसद तथा यहाँ तक कि रानी भी दिन प्रतिदिन के मामलों में हस्तक्षेप नही करते। लेकिन दीर्घकालीन नीतियों सम्बन्धी निर्णय अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं पर निर्भर करता है। कैसे?
कैंटरबरी के आर्कबिशप कि नियुक्ति इंग्लैंड की महारानी द्वारा होती है, जिसका सीधा मतलब हुआ कि यह नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से प्रधान मंत्री द्वारा की जाती है। पादरी की नियुक्ति की अनुशंषा एक बोर्ड द्वारा की जाती है जो कि जिसका गठन आर्कबिशप तथा महारानी (परोक्ष रूप से प्र. मं. एवं सांसदों) द्वारा होता है। तथा सांसदों का निर्वाचन जनता करती है। साथ हीं पादरी यदि कोई आपराधिक कृत्य करता है तो उस पर ज्यूरी द्वारा सुनवाई होती है।
अनुयायियों का नियंत्रण: चर्च के अनुयायी जो कि इंग्लैण्ड की जनता है, उनका नियंत्रण चर्च पर दो तरीके से है- प्रधान मंत्री के माध्यम से तथा ज्यूरी के माध्यम से। इस प्रकार चर्च ऑफ़ इंग्लैंड पूर्णतः लोकतान्त्रिक है। सांसदों के माध्यम से, प्रधान मंत्री के माध्यम से तथा पादरी के चयन की अनुशंषा करने वाले बोर्ड के माध्यम से अनुयायियों का नियंत्रण इस बात पर होता है कि चर्च आम जनता को क्या सन्देश देगा तथा चर्च का धन कैसे खर्च किया जायेगा।
6. एपिस्कोपल प्रोटेस्टेंट चर्च का प्रशासन-
इस चर्च का स्वामित्व एक ट्रस्ट के अधीन होता है जिसका गठन एपिस्कोपल (बिशपों के) संभ्रांत वर्ग द्वारा होता है। ट्रस्टी चक्रीय क्रमानुसार बदलते रहते हैं तथा उत्तराधिकार की कोई गारंटी नही होती। पादरी की नियुक्ति ट्रस्टियों द्वारा होती है जो कि संभ्रांत वर्ग से होते हैं। किन्तु पादरी द्वारा कोई भी आपराधिक कृत्य करने पर निर्णय ज्यूरी द्वारा लिया जाता है। ज्यूरी के सदस्य समाज के बीच से हीं यादृच्छिक रूप से चुने जाते हैं। अतः पादरी तथा संभ्रांत वर्ग का ज्यूरी के ऊपर कोई नियंत्रण नही होता।
अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायियों का कोई सीधा नियंत्रण चर्च प्रमुखों या व्यवस्थापकों पर नही होता, मात्र ज्यूरी के माध्यम से थोडा नियंत्रण होता है। किन्तु ज्यूरी का चयन पूरे समाज से होता है न कि सिर्फ अनुयायियों के बीच से। तथा ज्यूरी मात्र आपराधिक मामलों में हीं हस्तक्षेप करती है, अन्य मामलों में नहीं। चूँकि संभ्रांत वर्ग ट्रस्टी होते हैं तथा वही पादरी की नियुक्ति करते हैं, अतः अनुयायियों का कोई सीधा हस्तक्षेप पादरी द्वारा दिए जाने वाले 'संदेशों' पर नही होता। किन्तु अनुयायी अपने कदमों की ताकत का इस्तेमाल कर इस चर्च से पलायन कर किसी अन्य चर्च से जुड़ सकते हैं। चर्च तथा पादरी उन्हें जबरन नही रोक सकते, चूँकि ज्यूरी उनके द्वारा बलप्रयोग को आपराधिक कृत्य मानेगी। अतः अनुयायियों को बनाये रखना है तो चर्च के ट्रस्टी एवं पादरी को उनकी बात सुननी हीं होगी।
7. अन्य प्रोटेस्टेंट चर्चों का प्रशासन-
चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड को छोड़कर यूरोप एवं अमेरिका के लगभग सभी प्रोटेस्टेंट चर्चों का प्रशासन एपिस्कोपल चर्च की तरह होता है। चर्च एक ट्रस्ट के अधीन होता है जिसके सदस्य समुदाय के संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति होते हैं। ट्रस्ट हीं पादरी की नियुक्ति करता है जो कि लोगों को धार्मिक सन्देश तथा आध्यात्मिक परामर्श देता है।
अनुयायियों का नियंत्रण: चूँकि संभ्रांत वर्ग से ही ट्रस्टी नियुक्त होते हैं तथा वही पादरी को नियुक्त करते हैं, अतः पादरी द्वारा दिए जानेवाले धार्मिक संदेशों में अनुयायियों का कोई सीधा हस्तक्षेप नही होता। किन्तु अनुयायी इस चर्च को छोड़कर कोई अन्य चर्च से जुड़ सकते हैं। तथा चर्च एवं ट्रस्ट उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकते, चूँकि ज्यूरी उन्हें किसी भी प्रकार का बल प्रयोग करने की इजाजत नही देगी। अतः अपने अनुयायियों को बनाये रखने के लिए चर्च ट्रस्टी तथा पादरी को उनकी बात भी सुननी होगी।
8. सिख गुरुद्वारा का प्रशासन-
मेरे विचार से सिख गुरुद्वारा प्रशासन हर तरीके से सर्वोत्तम है तथा सर्वाधिक वैदिक प्रकृति का भी प्रतीत होता है। तथा मेरा यह भी मानना है कि सभी हिन्दू मंदिरों को भी अपना प्रशासन इन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर सुधारना चाहिए। सिखों के इतने सशक्त होने का एकमात्र कारण उनके द्वारा अपनाया गया गुरुद्वारों के प्रबंध का तरीका रहा है। सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी अधिनियम (SGPC act) के दिशा निर्देशों के अनुसार ही सभी सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन होता है। इसका विस्तृत वर्णन मैंने अगले सेक्शन में किया है।
अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायियों द्वारा हीं गुरुद्वारा प्रमुख क़ी नियुक्ति की जाती है, अतः उनका पूर्ण नियंत्रण पूरी व्यवस्था पर होता है।