Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

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chap-1. सारांश

300 ई. पू. से हिंदूवाद का विस्तार थम गया, तथा 700 ई. से इसका लगातार सिमटना आरम्भ हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूवाद का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी।

सिखों तथा मराठा ने इस क्षति को काफी हद तक रोका तथा बहुत सारी भूमि पुनः प्राप्त कर ली। किन्तु लोगों को फिर से जोड़ नहीं सके। इनकी यह पुनर्विजय स्पेन के धार्मिक पुनर्विजय (जिसमें पहले ईसाई बहुल रहे स्पेन ने अपनी खोई हुई धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिमों के हाथों से दोबारा प्राप्त कर ली), की तुलना में काफी कमजोर रही। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह इतना कमजोर क्यों रहा? फिर 1947 ई. में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया, तथा आगे चलकर इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना। 1947 से लेकर अब तक उत्तर- पूर्व तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके हैं।

1700 ई. से लेकर अब तक के समयांतराल में हिन्दुत्व की पकड़ लोगों पर कमजोर होती जा रही है और इसका स्थान ईसाइयत लेती जा रही है। पिछले 20 वर्षों में भी मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति तथा गति तेजी से बढ़ी है।

किसी अन्य लेख में मैं इस विषय पर भी लिखूंगा कि विगत में हिन्दुत्व को यह क्षति क्यों हुई। यह लेख वर्त्तमान एवं भविष्य के लिए सम्भावित दिशानिर्देशों के सम्बन्ध में है।

मेरे विचार से वर्त्तमान में मिशनरियों के हाथों हिन्दुत्व की लगातार होती क्षति के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:

1. मिशनरियों का गठबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के साथ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारत की तुलना में उन्नत तकनीक तथा सेना है। उनके पास उन्नत तकनीक होने का कारण है पश्चिमी देशों में राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम (न्यायपीठ प्रणाली), संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि का होना।

2. चर्चों में नियुक्तियां तथा धन वितरण मंदिरों की तुलना में ज्यादा अच्छे व सुव्यवस्थित है। इसके अच्छे होने के निम्नलिखित कारण हैं:

(2a) चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड नामक एक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी सभी निर्णय पादरी (priests) लेते हैं। किन्तु ये पादरी प्र. मं./ सांसदों के द्वारा नियुक्त होते हैं तथा कोई भी आपराधिक कार्य करने पर ज्यूरी के नियंत्रण में होते है। साथ हीं चर्च की संपत्ति पर उनका कोई उत्तराधिकार नही होता।

(2b) अन्य सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों में स्थानीय बुजुर्गों द्वारा पादरी नियुक्त किया जाता है। अतः चर्च के पैसों पर उत्तराधिकार लागू नही होता। और इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्चों में धन संग्रह की प्रवृत्ति नही पाई जाती। तथा वे इस धन को समुदाय के निर्माण व विस्तार में उपयोग करते हैं।

(2c) कैथोलिकों में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी निर्णय पादरी द्वारा लिए जाते हैं, जो कि पोप के अधीन होता है। अगले पोप की नियुक्ति 100- 200 सर्वाधिक पुराने पादरी जिन्हें कार्डिनल्स कहते हैं, मिलकर करते हैं। उत्तराधिकार यहाँ भी नही होता, चूँकि पादरी अविवाहित रहते हैं तथा उनमें गुरु प्रथा भी नही होती। अर्थात वर्त्तमान पादरी द्वारा अगले पादरी कि नियुक्ति नही की जाती। अतः कैथोलिक चर्चों में भी संपत्ति संग्रह नही होता, तथा ये भी दान में मिले पैसों को समुदाय के निर्माण व विस्तार पर खर्च करते हैं।

3. हिन्दू मंदिरों में धन के वितरण सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख (ट्रस्टी) या संप्रदाय प्रमुख (गुरु) द्वारा लिए जाते हैं, जिनका स्वामित्व उस मंदिर पर होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। अर्थात वर्त्तमान गुरु हीं अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति- संग्रह की प्रवृत्ति होती है, तथा इसका उपयोग तड़क- भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी होता है।

इसका समाधान सिख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था, तथा इसे सभी सिख गुरुद्वारों में लागू किया था। किन्तु दुर्भाग्यवश यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। मेरे विचार से हमें चाहिए कि इसे आज हीं लागू करें। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति संग्रह को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते हैं।
वर्त्तमान में फैक्टर १ के समाधान हेतु हमें भारत में राइट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि जैसे कानूनों की आवश्यकता है। इनका वर्णन मैंने rahulmehta . com / 301.htm में किया है। फेसबुक पर यह नोट लिखने का मेरा उद्देश्य यह बताना है कि कैसे हिन्दू मंदिरों की व्यवस्था सशक्त बनाई जा सकती है।