Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
जितना अधिक मैं परेश रावल की फ़िल्म OMG= oh my God की गहराई में जाता हूँ, उतनी ज्यादा कीचड पाता हूँ। यह फ़िल्म मिशनरी आधिपत्य वाली एक कम्पनी viacom द्वारा हिन्दूओं की परम्परागत मूर्ति पूजा पर कीचड उछालने तथा इस परंपरा को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से बनाई गयी थी। साथ हीं मिथुन चक्रवर्ती ने इस फ़िल्म में एक ऐसे व्यक्ति का चरित्र निभाया है जो कि आध्यात्म का दुरूपयोग पैसा कमाने के जरिये के रूप में करता है। इस चरित्र के माध्यम से श्री श्री रविशंकर महाराज की खिल्ली भी उड़ाई गयी है।
(translation by a friend of mine)
हिन्दुत्व की समस्या मूर्तिपूजा नही है। बल्कि असली समस्या तो यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी मंदिरों का स्वामित्व एक ही परिवार के पास रहता आया है (कृपया मंदिरों के स्वामित्व का विरासत के रूप में एक हीं परिवार के सदस्यों को हस्तांतरित होते रहने की समस्या तथा उसके समाधान पर मेरा लेख फेसबुक पर पढ़ें - facebook . com/groups/righttorecallparty/10152190088748103/ ) ।
मूर्तिपूजा की खिल्ली उड़ाने से नास्तिकता को बढ़ावा नही मिलेगा, बल्कि हिंदुत्त्व में लोगों का विश्वास कम होगा। यदि एक धार्मिक विश्वास ख़त्म होता है तो उसकी जगह कभी भी नास्तिकता नही आती। तब इस रिक्त स्थान पर कोई दूसरा धार्मिक विश्वास ही काबिज हो जाता है। इस प्रकार ईसाइयत को पूरे विश्व में फ़ैलाने के मंसूबे से यह मिशनरियों द्वारा अपनाया गया एक तरीका है। फिल्मों के माध्यम से वे किसी अन्य धर्म के मूल तत्तवों का मजाक बनाते हैं जैसे कि मूर्ती पूजा, जिससे उस धर्म के अनुयायी युवा वर्ग को अपने हीं धर्म के रीति रिवाजों का पालन करने में शर्म महसूस होने लगती है।
इस फ़िल्म में मूर्ति पूजा तथा हिन्दू साधुओ का मजाक बनाया गया है। फ़िल्म के एक दृश्य में परेश रावल स्वयं की मूर्ति तोड़ता है। अब इसे कोई भी अपमानजनक नही कह सकता, चूँकि उसने अपनी स्वयं की मूर्ति तोड़ी। किन्तु इस दृश्य द्वारा एक प्रकार से सभी मूर्तियों का अपमान हुआ। "ओह !! यह तो सिर्फ मिटटी की मूर्ति थी कोई जीता जागता इंसान नही"- ऐसा कहकर मूर्ति पूजा का विरोध करने वाला कोई व्यक्ति क्या अपने पिता की मूर्ति तोड़ सकता है? या अपने पिता की तस्वीर पर कीचड उछाल सकता है? यदि नहीं तो क्यों? आखिर यह भी तो सिर्फ एक मूर्ति और तस्वीर है! अतः यह सिर्फ मिटटी का टुकड़ा नहीं जिसे वह तोड़ रहा है, बल्कि इस फ़िल्म के माध्यम से निर्माता ने मूर्तिपूजा तथा पूरी हिन्दू परंपरा का अपमान किया है।
यह फ़िल्म मनोरंजक थी और इसलिए हिट हुई। लेकिन मनोरंजन के बहाने फ़िल्म निर्माता कम्पनी viacom ने हिन्दू परंपरा पर प्रहार किया। और परेश रावल ने उनके लिए काम किया। अब परेश रावल बचने के लिए कह सकते हैं "मैं तो सिर्फ अभिनेता था", लेकिन ऐसा नही है। बड़े व सफल अभिनेता स्वयं यह तय करते हैं कि वे किस लॉबी तथा उसके एजेंडे के साथ काम करेंगे। मिशनरी लॉबी बहुत अमीर है। अतः बहुत सारे अभिनेता (सभी नहीं) इस लॉबी के साथ अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं। मिशनरी लॉबी ऐसे अभिनेताओं आदि को बढ़ावा देती है जो कि मूर्तिपूजा जैसी हिन्दू परम्पराओं का मजाक उड़ाने में उनकी मदद करे। और ये लॉबी ऐसे अभिनेताओं को सिर्फ पैसे हीं नही देती बल्कि अन्य सारे क्षेत्रों में भी आगे बढाती है।
सारांश यह है कि चीजें हमारे सामने 180 डिग्री का घुमाव ले रही हैं। और सबसे दुखद बात ये है कि बहुत कम लोग इसपर ध्यान दे पा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, भाजपा आदि के नेता स्वयं को हिंदुत्त्व एवं हिन्दू परंपरा के रक्षक बताते हैं। और अब वे हीं एक अभिनेता को सांसद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। यह वही अभिनेता परेश रावल है जो कि मिशनरियों के साथ फ़िल्म बनाकर हिंदुत्त्व का मजाक उडाता है, युवाओं की आस्था हिंदुत्त्व में कम करता है, तथा उन्हें हिन्दू परम्पराओं पर शर्म महसूस कराता है। ताकि उनका धर्म परिवर्तन कराना आसान हो सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् तथा भाजपा के सभी कार्यकर्त्ता उनके लिए चुनाव प्रचार भी करेंगे। ऐसा तब होता है जब कार्यकर्त्ता अंधभक्ति से प्रेरित होता है न कि किसी कानून ड्राफ्ट से।
एक और दुखद पक्ष यह है कि श्री श्री रविशंकर महाराज भाजपा का समर्थन करेंगे और उनके भक्त भी भाजपा के पक्ष में ही मतदान करेंगे। क्या उन्हें पता है कि परेश रावल ने फ़िल्म OMG में काम किया है जिसमें मिथुन चक्रवर्ती द्वारा निभाए गए चरित्र के माध्यम से श्री श्री रविशंकर महाराज का मजाक बनाया गया है? मेरा अनुमान है कि अब तक वे इस तथ्य से अवगत नहीं हैं।
समाधान?
मैं यह समाधान प्रस्तावित करता हूँ कि हम कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् तथा भाजपा आदि के कार्यकर्ताओं से अनुरोध करना चाहिए कि वे अंधभक्ति छोड़कर इस बात पर गौर करें कि परेश रावल का उन लॉबियों व कंपनियों से क्या रिश्ता है जिन्होंने फ़िल्म OMG बनाई।
कार्यकर्ताओं को यह फ़िल्म कम से कम दो बार फिर से देखनी चाहिए तथा समझने की कोशिश करनी चाहिए कि viacom कंपनी के मालिकों की इस फ़िल्म के निर्माण के पीछे क्या मंशा थी। फिर वे यह समझें कि परेश रावल ने यह भूमिका क्यों स्वीकार की। इस पक्ष का विश्लेषण करने पर हिंदूवादी यह समझ जायेंगे कि परेश रावल ने मिशनरियों के लिए काम करने का निर्णय लिया ताकि मिशनरियां तथा उनकी सहयोगी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ न सिर्फ उन्हें फ़िल्म में भूमिका देंगे तथा फ़िल्म का प्रचार प्रसार करेंगे, बल्कि बाद में उन्हें राजनीति में भी आगे बढ़ाएंगे। इसी बात से कार्यकर्त्ता समझ सकते हैं कि दुश्मन कितना सशक्त है। इसका समाधान व्यक्ति की अंध पूजा नही बल्कि कानून ड्राफ्ट है। कौन से कानून ड्राफ्ट? यह एक अन्य लम्बी चर्चा का विषय है।
मेरा अपना विश्वास क्या है: मैं आंशिक रूप से मूर्तिपूजा में विश्वास करता हूँ। 12 वर्ष की उम्र तक मैं पूरी तरह मूर्तिपूजा में विश्वास करता था। परन्तु इसके बाद मैं नास्तिक बन गया। 25 वर्ष की उम्र में मैं अर्ध-नास्तिक बना। अर्थात अब मैं हफ्ते के तीन दिन भगवान में विश्वास करता हूँ। मंगलवार, बुधवार तथा बृहस्पतिवार को मैं भगवान को मानता हूँ। सोमवार, शुक्रवार तथा शनिवार को मैं भगवान को नही मानता। रविवार का दिन छुट्टी का होता है। इनमें से बृहस्पतिवार को मैं देवी इंदिरा अम्मा की तस्वीर की पूजा करता हूँ जिन्हें मैं देवी दुर्गा का अवतार मानता हूँ। किन्तु मंगलवार तथा बुधवार को मैं मूर्तिपूजा नही करता।
अब सवाल यह है कि मैं इस विषय पर आज हीं क्यों लिख रहा हूँ, और दो साल पहले क्यों नही लिखा। इसका जवाब यह है कि इस बीच बहुत सारी गलत घटनाएं घटीं। परन्तु मैं समयाभाव के कारण सभी मुद्दों पर नही लिख सकता। मुझे फ़िल्म OMG अच्छी नही लगी क्योंकि इसमें हिन्दू आस्था का मजाक उड़ाया गया था। किन्तु मैंने इसके खिलाफ कुछ नही लिखा, क्योंकि मेरे पास समय की कमी थी। किन्तु अब मिशनरी लॉबी इतनी सशक्त हो चुकी है कि वे फिल्मों में हिन्दू आस्था का मजाक उड़ाने में सहयोग करने वाले अभिनेता को अब सांसद के पद पर बैठा सकते हैं। अतः मैं इसे नजरअंदाज नही कर सका।