Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

क्या भाजपा के शीर्ष नेताओं ने तय कर लिया है कि वे हरियाणा/ चंडीगढ़ की लोकसभा सीटें आप/ कांग्रेस की झोली में डाल देंगे?

सामान्यतः मेरा पूरा ध्यान व प्रयास इस बात पर होता है कि " अच्छे कानून- ड्राफ्ट कैसे पास कराये जाएँ।" मैं इसकी चिंता नही करता कि " कौन कहाँ से जीतेगा" ( मैं भी जीतने नही जा रहा) . लेकिन हरयाणा से जिस प्रकार से भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची जारी की है, उससे इन मसलों में रुचि न रखने के बावजूद मैं भी हतप्रभ हूँ।

चंडीगढ़ की बात करें तो किरण खेर की कोई लोकप्रियता भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच नही है। वहीँ सोनीपत से भाजपा प्रत्याशी रमेश कौशिक ४ महीने पूर्व तक कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे थे। कमोबेश यही दृश्य लगभग सभी सीटों पर दिख रहा है। हरियाणा और चंडीगढ़ की लोकसभा सीटों के लिए भाजपा द्वारा उम्मीदवारों के चयन को देखकर ऐसा लगता है कि भाजपा आलाकमान की कांग्रेस के साथ कोई गुप्त डील हुई है कि " हरियाणा और चंडीगढ़ की सीटें आपकी हुई।" बिलकुल स्पष्ट तौर पर भाजपा ये सीटें आप/ कांग्रेस या हाल में ही भाजपा में शामिल हुए पूर्व कांग्रेस नेताओं को देने को तैयार दिखती है।

इससे भाजपा को क्या फायदा है इसका बहुत सावधानी से तथा खुले दिमाग से अनुमान लगाने की जरुरत है। मिशनरियों की योजना हरियाणा के दलितों के बीच अपनी पैठ ज़माने की है जिसके लिए वे उनमें सामाजिक भेदभाव की भावना को पैदा कर उसे भुनाना चाहते हैं। आम आदमी पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव तथा स्वयं अरविन्द केजरीवाल भी छिपे तौर पर ईसाई समर्थक (crypto-christian) हैं। हरियाणा/ चंडीगढ़ में अभी कांग्रेस विरोधी माहौल है। ऐसे में यदि भाजपा इस प्रकार के अलोकप्रिय उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो इसका बड़े पैमाने पर फायदा आम आदमी पार्टी को होगा। तो क्या सचमुच मिशनरियों के साथ किसी डील के तहत भाजपा हरियाणा कि सीटें आप = मिशनरियों को देने को बाध्य है?

हरियाणा/ चंडीगढ़ में राष्ट्रवादी, स्वदेशी तथा हिंदुत्ववादियों की बड़े पैमाने पर हार हुई है। कोई भी १२ लोकसभा सदस्य यहाँ से चुनकर आयें, वे भारत विरोधी, स्वदेशी विरोधी, तथा हिंदुत्वविरोधी ही होंगे।

समस्या यह है कि राष्ट्रवादी, हिंदुत्ववादी, तथा स्वदेशी के समर्थक कार्यकर्त्ता नेताओ और संगठनों के पीछे पड़कर अपना समय नष्ट कर रहे हैं। ये कार्यकर्त्ता भारत, स्वदेशी, एवं हिंदुत्ववाद के समर्थन में अच्छे कानून बनाने के लिए कोई प्रयास नही कर रहे हैं। अच्छे व उपयुक्त कानूनों के बिना नेता भी कमजोर हैं और समझौता करने को बाध्य हैं।