Pawan Jury BhilwaraRj
रिकालिस्ट्स को जहाँ तक हो सके “राईट टू रिकॉल” शब्द का स्वतंत्र प्रयोग करने से बचना चाहिए । राईट टू रिकॉल सिर्फ़ एक लेबल है । राईट टू रिकॉल की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि अमुक राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया क्या है , एवं यह किस पद पर लागू हुआ है ।
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उदाहरण के लिए यदि आप सिर्फ़ यह माँग करते है कि हमें “राईट टू रिकॉल” चाहिए , तो वे आपको कहेंगे कि राजस्थान में राईट टू रिकॉल पहले से मौजूद है !! जबकि सच्चाई यह है कि राजस्थान में जो राईट टू रिकॉल है वह स्थानीय निकायो के पदों पर है एवं इसकी प्रक्रिया बेहद कमज़ोर है ।
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तो जब भी राईट टू रिकॉल लफ़्ज़ का प्रयोग करे तो इसके साथ पद भी इंगित करे । उदाहरण के लिए , राईट टू रिकॉल-पी एम , राईट टू रिकॉल-सी एम , राईट टू रिकॉल-एस पी , राईट टू रिकॉल-जज आदि लिखे । और सबसे ज़रूरी बात इसका ड्राफ़्ट है । क्योंकि यदि ड्राफ़्ट कमज़ोर होगा तो यह प्रक्रिया कोई नतीजा नही देगी । चाहे इसे किसी भी पद पर लागू कर दिया जाए ।
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उल्लेखनीय है कि , जब राईट टू रिकॉल आंदोलन फैलना शुरू हुआ तो इसके समर्थकों को बुत्ता देने के लिए राजस्थान सरकार ने 2012 में स्थानीय निकायो के चुनावों में राईट टू रिकॉल के प्रावधान जोड़े थे । यह नक़ली राईट टू रिकॉल है एवं राईट टू रिकॉल के विरोधी मूवमेंट को तोड़ने के लिए इस तरह की हरकतें करते रहते है ।
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