Pawan Jury BhilwaraRj
सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए सिर्फ 10 दिनों का गोला बारूद है -- कैग
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http://economictimes.indiatimes.com/news/defence/no-improvement-in-armys-availability-of-ammunition-cag/articleshow/59705766.cms
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सेना की ताकत आंकने का पैमाना मात्रात्मक नहीं बल्कि गुणात्मक होता है। इसीलिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि भारत की सेना के पास कितने दिन का गोला बारूद है। भारत के पास 100 दिनों का गोला बारूद होगा और यदि हमारा युद्ध चीन से हो जाता है और ऐसे में अगर अमेरिका भारत को हथियारों की मदद देने से मना कर देता है तो हम 10 दिन में ही हार जाएंगे और 90 दिन का बारूद माल खानो में पड़ा रह जाएगा और इस बारूद पर चीन की सेना आकर कब्ज़ा कर लेगी !!!
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ऐसे कैसे और क्यों कर लेगी ?
क्योंकि चीन अपने लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, लेसर गाइडेड मिसाइल, लेसर गाइडेड बम, रडार, टैंक, युद्ध पोत आदि सभी आधुनिक हथियार खुद से बनाता है और इस लिहाज से युद्ध लड़ने के लिए वह आत्मनिर्भर है। जबकि भारत उपरोक्त हथियारों में से सिर्फ टैंक बनाता है और वह भी पोचे दर्जे का, तथा शेष सभी का आयात करता है। अत: भारत की सेना परजीवी है।
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इसी तरह यदि हमारे पास क़यामत तक लड़ने का गोला बारूद हो तब भी यदि अमेरिका से हमारा युद्ध हो जाता है तो सुबह शुरू हुआ युद्ध हम दोपहर तक ही हार जाएंगे।
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उदाहरण के लिए भारत के पास पर्याप्त गोला बारूद था और हम 2 महीने पर इनसे कारगिल युद्ध लड़ते रहे थे। किन्तु जीत नहीं पा रहे थे। क्योंकि हमारे पास गुणात्मक रूप से बढ़त दिलाने वाले हथियार नहीं थे। जब अमेरिकी-ब्रिटिश-फ़्रांस ने हमें लेजर गाइडेड बम दिए तो ये हथियार निर्णायक साबित हुए और हमने कारगिल जीता। इसीलिए भारत के पास कितने लाख की सेना है और कितने टन गोला बारूद है, इस आधार पर सैन्य शक्ति का आकलन करना खुराफात है।
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"भारत के पास महीनो तक लड़ने का गोला बारूद है, किन्तु इस तरह के रक्षा से संबधित तथ्य गोपनीय रखे जाते है। इसीलिए केग के कहने से कुछ नहीं होता कि हमारे पास हथियारों की कमी है।" -- भक्त उवाच
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स्पष्टिकरण
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यह तर्क एक ही साथ चालाक भी है और मासूम भी। चालाक उन लोगो के लिए है जो जानते है कि शासकीय मशीनरी कैसे काम करती है किन्तु फिर भी वे जानबूझकर नागरिको को बुत्ता दे रहे है। और मासूम उन लोगो के लिए है जिन्हे व्यवस्था के संचालन की जानकारी नहीं है।
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पैसा आबंटित करने और इसे खर्च करने की प्रक्रिया :
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सरकार बजट बनाती है। मान लीजिये यह बजट १ लाख रुपया है। इससे पहली बात यह तय हो जाती है कि सरकार के पास 1 लाख रुपया ही खर्च करने के लिए है। सरकार इसमें से कम तो खर्च कर सकती है किन्तु अधिक खर्च नहीं कर सकती। क्योंकि खर्च करने के लिए पैसा है ही नहीं। दरअसल इस बजट का 90% भी पहले से ही निश्चित हो चुका होता है। इस खर्चे को देखकर ही बजट धारण किया जाता है। सरकार को यह बजट संसद से पास करना होता है।
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अब मान लीजिये कि सरकार इस 1 लाख में से 10 हजार रूपये रक्षा बजट के लिए आवंटित करती है। तो रक्षा मंत्रालय के पास अब खर्च करने के लिए 10 हजार रूपये है। यदि रक्षा मंत्रालय 11 हजार रूपये खर्च करना चाहता है तो उसके पास कोई उपाय नहीं है। क्योंकि खर्च करने के लिए सिर्फ १० हजार ही है। अब मान लीजिए कि इस 10 हजार ने सेना के वेतन, भत्ते, एवं अन्य संचालन सम्बन्धी स्थायी व्यय 80 हजार है, तो ये 80 हजार इस मद में चले जाएंगे। यदि इन्हे 75 हजार कर दिया गया तो या तो कुछ सैनिको को वेतन नहीं मिलेगा या कुछ मेस में राशन नहीं पहुंचेगा।
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अब ,मान लीजिये कि सेना बचे हुए 20 हजार में से 10 हजार या पूरे 20 हजार के रक्षा उपकरण या गोला बारूद खरीदती है। तो सेना इस मद में सिर्फ वे 20 हजार ही खर्च कर पाएगी। और ये खरीद भी ऐसे नहीं होती है कि जनरल या मेजर साब ट्रक लेकर जाएंगे और मार्केट से इसे लोड करवा कर ले आएंगे। इसके लिए खरीद विभाग को पहले प्रस्ताव भेजना पड़ता है। जिसमे यह लिखा होता है कि इतने उतने बम चाहिए, इतने जैकेट-बन्दुक चाहिए, इतने उतने टैंक-विमान आदि चाहिए। ये प्रस्ताव मंत्रालय से पास होता है। फिर विक्रेताओं से करार होता है। तय होने के बाद रक्षा मंत्रालय विक्रेता को पैसा जारी करता है। हर वर्ष सेना के आयुध विभाग को इसका प्रतिवेदन प्रस्तुत करना पड़ता है कि उनके पास कौन से हथियार है और कितनी मात्रा में है। जब कोई खरीद होती है तो इसे उस स्टॉक में जोड़ दिया जाता है, और इस्तेमाल होने से इसे घटा दिया जाता है। इस प्रतिवेदन की सूचना हर वर्ष देनी होती है।
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जटिल एवं बड़े हथियारों की खरीद प्रक्रिया कम से कम 6 से 10 वर्ष लेती है, तथा बंदूके, गोला-बारूद आदि की खरीद प्रक्रिया कम से कम 2 से 5 वर्ष खा जाती है। कैग इस पूरी खरीद फरोख्त की एक एक पाई और एक एक कारतूस का हिसाब रखता है। मौद्रिक एवं संख्यात्मक रूप में। कोई मेजर या ब्रिगेडियर चाहे नहीं बता सकेगा कि सेना के पास कितनी बंदूके या बारूद है किन्तु साल के अंत में यह जानकारी कैग के पास सटीक रूप से रहती है। कैग सरकार के प्रत्येक लेन देन का मौद्रिक हिसाब रखता है और चीजे सभी पैसे से आती है।
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कुल मिलाकर, यदि कैग ने कहा है कि भारत की सेना के पास 10 दिन का गोला बारूद है तो इसका मतलब यह है कि सेना ने ही कैग को बताया है कि हमारे के पास इतना ही गोला बारूद है। और सेना के पास ऐसा कोई मेकेनिज्म नहीं है कि वह कैग को झूठ बता दे। यदि सेना गलत सूचना देती है तो इसे ही गबन कहा जाता है। और कैग की यह रिपोर्ट ही संसद में रखी जाती है और इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार यह कहती है कि हमारी सेना के पास इतनी मात्रा में गोला बारूद है। सरकार के मंत्री खुद से स्टॉक गिनने नहीं जाते या जनरल ऐसा नहीं कर सकता है कि उसके स्टॉक में 4 टैंक हो लेकिन वो कैग को 2 टैंक बता दे और सरकार को 6 !!
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और सिर्फ सेना ही नहीं सभी मंत्रालय एवं विभाग इसी तर्ज पर काम करते है। यही प्रक्रिया है। क्योंकि देश की मालिक सेना नहीं है। न ही प्रधानमंत्री या मंत्री है। न ही कैग है। देश की मालिक जनता है। जनता के टेक्स के पैसे से सेना चलती है और हथियार ख़रीदे जाते है। तो कैग या सरकार की यह ड्यूटी होती है कि वह देश के मालिकों ( यानी नागरिको ) को यह बताये कि उनके देश की सेना के पास किसी समय में कितने हथियार है। यदि वे इसे कम ज्यादा करके बताएँगे तो यह गबन और धोखा होगा। और साबित होने पर उन पर मुकदमा बनेगा या कार्यवाही होगी। ( वो पैसा खिलाकर छूट जाएंगे, वो बात अलग है )
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यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कैग भी दूध का धुला नहीं है। और वे घूस खाकर ऑडिट को इस तरह से प्रस्तुत करते रहते है जिससे तिल का ताड़ एवं ताड़ का तिल नजर आये। किन्तु ऐसा वे ज्यादातर आकलन की मद में कर सकते है। या घूस खाकर कोई भ्रष्टाचार छिपा सकते है या उछाल सकते है। किन्तु स्टॉक जैसे मामलो में अमूमन आंकड़े सच्चे होते है। इन्हे छिपाना शुद्ध गबन है।
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और गोला बारूद की कमी कोई नयी बात नहीं है। पिछले 10 साल से हर साल कोई न कोई अधिकारी / मंत्री ये बात कहता ही रहता है या किसी न किसी समाचार पत्र / पत्रिका में यह विवरण लगातार आता रहता है कि सेना के पास पर्याप्त रूप से हथियार नहीं है, बंदूके नहीं है, बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं है, जूते नहीं है, कारतूस नहीं है, दूरबीन नहीं है यहाँ तक कि चश्मे और पानी की बोतले तक नहीं है। शायद दो साल पहले खुद जनरल ने भी इसी आशय का बयान दिया था।
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बहरहाल कैग के आंकड़ों से हमें सेना की शक्ति का आकलन नहीं करना चाहिए। क्योंकि कैग सिर्फ संख्यात्मक एवं मात्रात्मक आकलन दे रहा है गुणात्मक नहीं। और गुणात्मक रूप से हमारी सेना चीन एवं अमेरिका की तुलना में बेहद कमजोर है।
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समाधान ?
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सेना को मजबूत बनाने के लिए हमें वेल्थ टेक्स, ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल कानूनों की जरूरत है। इन कानूनों के आने से भारत की स्थानीय इकाइयो का निर्माण का स्तर सुधरेगा और हमारी स्वदेशी इकाइया आधुनिक हथियार बनाने में सक्षम हो जायेगी।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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