Pawan Jury BhilwaraRj
प्रश्न - सोनिया-मोदी-केजरीवाल के समर्थको को अंध भगत क्यों कहा जाता है, चमचे क्यों नहीं ?
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स्पष्टीकरण :
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चमचे, भक्त, प्रशंसक और अंध भगत में फर्क :
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चमचे, भक्त एवं अंध भगत -- तीनो ही अपने स्वामी के प्रति समर्पित होते है। किन्तु भक्त सिर्फ आध्यत्मिक जगत में पाए जाते है। जो कि प्रशस्त है। भक्तो में विवेक होता है और उनकी बुद्धि भी काफी सूक्ष्म होती है। आध्यत्मिक विवेचना का मैं अधिकारी नहीं हूँ। अत: इस विषय पर मैं अमूमन टिपण्णी नहीं करता।
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लोकिक जगत में या तो चमचे होते है या प्रशंसक होते है या फिर अंध भगत होते है। भक्त नहीं होते। भक्त सिर्फ भगवान् का ही होता है।
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प्रशंसक/समर्थक - ये किसी व्यक्ति के कार्यो, उपलब्धियों, मूल्यों आदि से प्रभावित होते है और उनका सम्मान एवं अनुसरण करते है। किन्तु जब ये अपने आदर्श ( यानी हीरो ) को गलत कार्य में लिप्त पाते है तो खामोश हो जाते है। पर एक सीमा के बाद या तो उसका विरोध करने लगते है या उसका त्याग कर देते है।
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चमचे एवं अंध भगत में समानता यह है कि -- ये दोनों प्रजातियाँ अपने स्वामी के हर कार्य का समर्थन करती है। गलत हो या सही। इन्हें इनके स्टेण्ड में कोई फर्क नहीं आता। ये हर हाल में अपने स्वामी का समर्थन ही करेंगे।
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चमचे एवं अंध भगत में अंतर -- चमचा अक्लमंद व्यक्ति होता है और उसे सही गलत का बोध होता है। फिर भी एक चमचा अपने स्वामी का हर सूरत में समर्थन ही करेगा। क्योंकि इसके पीछे उसका निजी हित जुड़ा होता है। वह जानता है कि यदि मैंने स्वामी को खुश रखा तो स्वामी की कृपा दृष्टी से मुझे कई प्रकार के लाभ हो सकते है।
किन्तु अंध भगत अपने स्वामी की हरकतों की विवेचना करने की शक्ति खो देता है, और बिना किसी लाभ की आकांक्षा के भी स्वामी के हर कदम का समर्थन करता है। उसकी भावनाएं एवं पूर्वाग्रह उस पर हावी हो जाते है और वह यह धारण कर लेता है कि उसका स्वामी जो भी करता है वह अच्छे के लिए ही होता है। यहाँ तक कि, जब वह देख्नता है कि मेरा स्वामी डबके पे डबके खा रहा है, तब भी वह यह मान कर चलता है कि मेरा स्वामी इतना समझदार है कि कोई साधारण बुद्धि का मनुष्य उसकी चालों को समझ नहीं सकता। अवश्य इन डबको के पीछे कोई गहरा राज या कूटनीति रही होगी। और इस धारणा का शिकार होने के बाद अंध भगत हर परिस्थिति में आधारहीन ( कई मामलो में हास्यास्पद ) तर्क देकर अपने स्वामी की हरकतों का समर्थन करते रहता है।
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इसी गुल गपाड़े में कुछ अंध भगत निर्वाण की अवस्था में पहुच जाते है। इस अवस्था में वे अपने स्वामी की हरकतों को देखना या समझना ही छोड़ देते है। और जो कोई उनके स्वामी की हरकतों की समीक्षा करता है या उन्हें समझने की कोशिस करता है, उसे ये लोग बेवकूफ से कम नहीं समझते है। इस हालत में वे सिर्फ यह देखते है कि अमुक हरकत की किसने है। हरकत क्या है कैसी है इससे ये कोई सरोकार नहीं रखते। यदि हरकत इनके स्वामी ने की है तो.... तो बस , बात खत्म !!
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तो मोदी-सोनिया-केजरीवाल के ज्यादातर अंध भगत ( सभी नहीं। ज्यादातर ) अपने नेताओ की भगती सिर्फ इसीलिए कर रहे है क्योंकि उन्हें इसका बोध ही नहीं है कि उनका भगवान् ( मुराद नेता से है ) देश को नुकसान पहुँचाने वाले फैसले ले रहा है। वे धारणाओं के शिकार होकर अपनी विवेचना शक्ति खो चुके है। वे वास्तव में यह मानते है कि हमारा नेता देश हित में काम कर रहा है !!! इसीलिए इन्हे अंध भगत कह कर ही सम्बोधित करना चाहिए। चमचे नहीं।
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कैसे अंधभगत जीती मक्खी निगल जाते है ?
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उदाहरण के लिए, हाल ही में मोदी साहेब ने जो जीएसटी का क़ानून लागू किया है। उसका हिंदी अनुवाद रखने के लिए जेटली को मना कर दिया है। अंध भगती व्यक्ति की दशा कितनी शोचनीय बना देती है यह जानने के लिए आप अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर ऐसे किसी व्यक्ति को खोजिये जिसे अंग्रेजी नहीं आती हो तथा वह मोदी साहेब का प्रशंसक हो। अब आप उनसे कहिये कि -- मोदी साहेब ने जीएसटी का हिंदी अनुवाद नहीं रखा है। अत: देश के करोडो हिंदी भाषी नागरिक एवं व्यापारी इसे पढ़ने से वंचित हो गए है। अत: कृपया मोदी साहेब को ट्वीट करके कहे कि इसका हिंदी अनुवाद उपलब्ध करवाए।
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तो ऐसी हालात में इस प्रजाति द्वारा आपको कुछ इस तरह प्रत्युत्तरों को सामना करना पड़ेगा :
वे आपसे कहेंगे कि, भाई तुम खुद क्यों नहीं कर लेते अनुवाद !! क्या मोदी साहेब ने अनुवाद करने पर रोक लगा रखी है !!! यदि आप कहेंगे कि, भाईसाहब मुझे अंग्रेजी नहीं आती। तो वे आपसे कहेंगे कि तो क्या हुआ, अंग्रेजी सीख नहीं सकते क्या ? यदि आप कहेंगे कि यदि मैं अंग्रेजी सीख कर अनुवाद कर भी दूँ तो यह अधिकृत अनुवाद नहीं माना जाएगा अत: इसे कोई नहीं पढ़ेगा और इसकी विश्वसनियता शून्य होगी। तो वे आप से कहेंगे कि तुम अपने लिए अनुवाद कर लो दुसरो से तुम्हे क्या मतलब है। फिर यदि आप कहेंगे कि बात सिर्फ मेरी नहीं है सभी करोडो हिंदी भाषी नागरिको की है। तो वे आपसे कहेंगे कि तो जिसको हिन्दी में पढ़ना होगा वो खुद से अनुवाद कर लेगा या किसी अनुवादक से अनुवाद करवा लेगा। यदि आप कहेंगे कि ऐसी हालत में लाखों नागरिको को अनुवाद करना होगा और इनमे से किसी भी अनुवाद की विश्वसनीयता नहीं होगी। लेकिन यदि मोदी साहेब ने जैसे अंग्रजी का क़ानून दिया है वैसे ही हिंदी में भी दे देंगे तो इसके अधिकृत होने के कारण किसी अन्य को इसका अनुवाद नहीं करना पड़ेगा। तो वे आपसे पूछेंगे कि ये "अधिकृत" किस चिड़िया का नाम है ? और फिर वे अपने नेचुरल मोड पर आ जाएंगे। माने, वे कहेंगे कि तुम 60 साल तक कहाँ थे, और कांग्रेस ने क्यों नहीं मांगते अनुवाद, और कांग्रेस ने तुम्हे कितने पैसे दिए है, आदि आदि !!
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अब यदि आप उनसे कहेंगे कि -- श्री मान जी, आपको अंग्रेजी पढ़ने आती नहीं है। और मैं आप जैसे हिंदी भाषियों की सुविधा के लिए ही हिन्दी में क़ानून देने की मांग कर रहा हूँ। तो वे कहेंगे कि --- तो तुम ये मांग मोदी जी से क्यों कर रहे हो !!! किसी दूसरे से जाकर क्यों नहीं करते !!
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इसमें कोई अतिशियोक्ति नहीं है। न ही यह मजाक है। आप खुद इसे आजमा सकते है। अंध भगती की तासीर ही ऐसी है। अंध भगत अपने स्वामी की भक्ति में इतना रत हो जाता है कि जहाँ उसके स्वामी की बात आ जाये वह सही गलत का निर्णय करने की क्षमता खो देता है। लेकिन जब बिना किसी सन्दर्भ के इस भगत से आप पूछेंगे कि -- भारत में सरकार जो कानून लागू करती है उन्हें किस भाषा में प्रकाशित करना चाहिए ? तो वे तुरंत कहेंगे कि हिंदी में करना चाहिए। क्योंकि वे यह बात जानते है कि यदि अंग्रेजी में हुआ तो वे पढ़ ही नहीं सकेंगे !!!
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और यह प्रजाति सिर्फ मोदी भगतो तक सीमित नहीं है। सोनिया एवं केजरीवाल के अंध भगतो की भी यही दशा है। अंध भगती की कोई सीमा नहीं हो सकती। पराकाष्ठा यह है कि श्री राहुल गांधी के भी अंध भगत पाए जाते है !! और वे उन्हें सीरियसली भी लेते है !! बताइये !!!
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अंधभगती पर इतना विवरण इसीलिए क्योंकि राजनीती में अंध भगती बेहद खतरनाक हो जाती है। पेड मीडिया के माध्यम से अल्पज्ञ एवं भावना प्रधान नागरिको को नेता अपनी चपेट में ले लेते है। और जब तक नशा उतरता है तब तक खासी देर हो चुकी होती है। और पूरे देश को इसे भुगतना होता है। मोदी साहेब के अंध भगतो को समझना चाहिए कि 1947 से 1965 तक पूरे भारत के मतदाता तक घास नहीं खा रहे थे। दरअसल वे उसी तरह से जवाहर लाल की चपेट में थे जिस तरह आज वे मोदी साहेब की चपेट में है। जवाहर लाल का नशा उतरने में देश को पूरे 50 साल लगे !!! और इस दौरान देश 100 साल पीछे हो गया।
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हमारे विचार में, एक स्वस्थ मस्तिष्क के व्यक्ति को यह देखना ही नहीं चाहिए कि कोई प्रस्ताव "किसने" रखा है। उसे यह देखना चाहिए कि प्रस्ताव की "विषय वस्तु" क्या है। इससे वे प्रस्ताव की विषय वस्तु तक पहुँच पाएंगे और अच्छे व बुरे प्रस्तावों में अंतर् कर सकेंगे।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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