Pawan Jury BhilwaraRj
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जीएसटी में मौजूद 'गंभीर समस्या' का "समाधान"। जीएसटी क़ानून कहता है कि , "क्रेता पहले कर की राशि विक्रेता को चुकाएगा। किन्तु, यदि विक्रेता यह राशि सरकार में जमा नहीं करता तो क्रेता को यह राशि सरकार को "फिर" से चुकानी होगी।
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कृपया आज के इंडियन एक्सप्रेस (22-जून-2017 , गुरुवार ) के अहमदाबाद / दिल्ली / मुंबई / कोलकाता / पुणे संस्करण की पृष्ठ संख्या 2, तथा फायनेंसियल एक्सप्रेस बेंगलोर की पृष्ठ संख्या 3 देखें।
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STAS पर दिए गए इस विज्ञापन ( पृष्ठ के बाएं कोने में नीचे ) के ई पेपर के लिंक -- http://epaper.indianexpress.com/c/19979082 , http://epaper.indianexpress.com/c/19977942
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विज्ञापन का छाया चित्र इस पोस्ट के साथ संलग्न है।
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इस विज्ञापन का मूल अंग्रेजी संस्करण इस लिंक पर देखें -- https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10154519348641922&set=a.10150240895441922.326034.704201921
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प्रकाशित विज्ञापन का हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है।
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( प्रकाशित विज्ञापन का हिन्दी अनुवाद )
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STAS - जीएसटी में मौजूद "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" नामक गंभीर समस्या के निराकरण के लिए टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित कानून ड्राफ्ट :
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यदि आप प्रस्तावित STAS क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो कृपया प्रधानमंत्री के ट्विटर हेंडल यह ट्विट करें - “ @PmoIndia #STAS mygov.in/comment/101405141 “
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(1) समस्या : MTP = जीएसटी में "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" – मान लीजिये कि जीएसटी की दर 20% है तथा क्रेता B विक्रेता S से 1000 रूपये की वस्तुए खरीदता है ; जीएसटी क़ानून के अनुसार क्रेता B विक्रेता S को जीएसटी के 200 रूपये चुकाएगा। अब मान लीजिये कि विक्रेता S सरकार को यह 200 रूपये नहीं चुकाता है। तो इस स्थिति को हम कार्यकर्ता "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" कह कर पुकारते है। अर्थशास्त्रियों ने इस समस्या को कोई नाम नहीं दिया है। क्योंकि उनका मानना है कि एक "मामूली और महत्त्वहीन" समस्या होने के कारण यह विचार योग्य नहीं है।
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अब SGST की धारा 16.2.c कहती है , "जबकि क्रेता ने विक्रेता को जीएसटी के 200 रूपये चुका दिए है, किन्तु यदि विक्रेता ने यह राशि सरकार को जमा नहीं करवाई है तो क्रेता को 'इनपुट क्रेडिट' नहीं मिलेगा"। तो इस स्थिति में क्रेता को 200 रूपये सरकार को फिर से चुकाने होंगे !!
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कैसे यह धारा ज्यादातर ईमानदार किन्तु छोटे/मझौले ट्रेडर्स और उत्पादको को तबाह कर देगा ? क्योंकि
(a) एक भी बड़ा ट्रेडर/उत्पादक इस तरह की धोखाधड़ी नहीं करेगा।
(b) किन्तु छोटे/मझौले ट्रेडर और उत्पादको में से कुछ 2% लोग इस तरह की धोखाधड़ी कर सकते है।
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और इस वजह से सभी छोटे/मझौले ट्रेडर और उत्पादक अपनी प्रतिष्ठा गवांने के कारण अपने क्रेता/ग्राहक खो देंगे। इस तरह "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" ईमानदार छोटे/मझौले कारोबारियों को भी बाजार से बाहर कर देगा। इसके अलावा सालाना 37 रिटर्न भरना भी एक बड़ी समस्या है। कोई समाधान ?
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(2) प्रस्तावित STAS (Separate Tax Account System) :
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(2a) बैंक जीएसटी कारोबारी को अलग से एक "टेक्स एकाउंट" = TA खोलने की अनुमति देगा। यह एकाउंट खाता धारक के करंट एकाउंट ( चालू खाता ) से लिंक्ड होगा।
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(2b) बैंक "टेक्स एकाउंट" धारक को अनुमति देगा कि वह टेक्स एकाउंट में जमा की गयी राशि सिर्फ दो उद्देश्यों के लिए ही ट्रांसफर कर सकता है -- (!) सरकार को जीएसटी चुकाने में अथवा (!!) किसी अन्य टेक्स एकाउंट में राशि ट्रांसफर करने में। इस तरह जो राशि एक बार टेक्स एकाउंट में आ गयी वह स्वत: ही सिर्फ सरकार को चुकाने में ही इस्तेमाल की जा सकेगी।
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(2c) मान लीजिये एक क्रेता B 1000 रूपये की वस्तुएं खरीदता है तथा इस खरीद पर उसके द्वारा 200 रूपये जीएसटी देय है। तो B अब दो चेक लिख सकेगा -- एक चेक 1000 रूपये का भुगतान करने के लिए विक्रेता के पक्ष में लिखेगा, और एक 200 रूपये का एक चेक वह विक्रेता के 'टेक्स एकाउंट' के लिए लिखेगा। इस तरह 200 रूपये का देय जीएसटी विक्रेता के माध्यम से सीधे सरकार के खाते में पहुँच गया है।
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(2d) अब क्रेता B को सरकार की तरफ से कभी इस शिकायत का सामना नहीं करना पड़ेगा कि -- चूंकि विक्रेता S ने जीएसटी जमा नहीं कराया है अत: तुम्हे ( क्रेता B ) यह राशि फिर से चुकानी होगी। दूसरे शब्दों में क्रेता B को कभी भी मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम का सामना नहीं करना पड़ेगा !!
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(2e) यदि टेक्स एकाउंट का धारक अपना पैसा खाते से निकालना चाहता है तो उसे पहले सरकार को टेक्स चुकाना होगा, और तब वह टेक्स एकाउंट में जमा राशि निकाल सकेगा। टेक्स एकाउंट में से राशि निकालने के लिए प्राधिकृत कर अधिकारी की अनुमति आवश्यक होगी।
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इस लिंक -- tinyurl.com/RrpStas , में मैंने यह दर्शाया है कि किस तरह से STAS को इस तरह से लागू किया जा सकता है कि कारोबारी क्रेडिट/डेबिट कार्ड का उपयोग करके तुरंत भुगतान कर सके। और STAS आने के बाद कारोबारियों को साल में सिर्फ 4 रिटर्न फ़ाइल करने होंगे। क्योंकि चुकाए गए इनपुट क्रेडिट के गायब हो जाने की समस्या हल हो जाने से अब कारोबारियों को मासिक रिटर्न भरने की जरूरत नहीं रहेगी।
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हम सभी कार्यकर्ताओ, टेडर्स, उत्पादकों से आग्रह करते है कि वे प्रस्तावित STAS पर विचार करे। और यदि उन्हें लगता है कि यह प्रस्तावित व्यवस्था मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम व 37 रिटर्न फ़ाइल करने की समस्या में कमी ला सकती है तो कृपया प्रधानमंत्री को यह ट्वीट भेजें -- “ @PmoIndia #STAS mygov.in/comment/101405141 ”
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(3) जीएसटी में एक अन्य गंभीर समस्या यह है कि एक से अधिक राज्यों में आहरित किये गए SGST-क्रेडिट को सेटल नहीं किया जा सकता। समाधान ?
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यदि सरकार कारोबारियों को यह अनुमति दे कि वे SGST-क्रेडिट का क्रय/विक्रय बाजार मूल्य पर पूरे देश में कहीं भी कर सकते है तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उदाहरण के लिए - किसी राज्य में कारोबारी द्वारा आहरित किये गए 100 रूपये के SGST-क्रेडिट को यदि वह अन्य किसी राज्य में बेचना चाहे तो वह ऐसा कर सकेगा। राज्यों में SGST-क्रेडिट की आपूर्ति एवं कमी के आधार पर बाजार स्वतन्त्र रूप से यह तय करेगा कि अमुक राज्य में 100 रूपये का यह क्रेडिट 95 में बिकेगा या 105 रूपये में। तो SGST-क्रेडिट की खरीद फरोख्त को कानूनी बनाकर इस समस्या को कम किया जा सकता है।
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(4) हमारे द्वारा प्रस्तावित सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी समाधान यह है कि, प्रत्येक परिवार को 2000 वर्ग मीटर की छूट देते हुए भूमि पर 1% वेल्थ टेक्स लगाया जाए। इस वेल्थ टेक्स में से आयकर एवं कर्मचारियों को चुकाए गए वेतन के 5% के बराबर राशि को भी घटाया जाएगा। इस तरह जो भी व्यक्ति अपनी जमीन का "इस्तेमाल" कर रहे है उन पर प्रभावी वेल्थ टेक्स शून्य रहेगा !! वेल्थ टेक्स के इस प्रस्ताव के लागू होने से जमीनों की कीमतें नीचे आएगी, निर्माण इकाइयों की स्थापना में तेजी आएगी और बेरोजगारी कम होगी। इस बारे में विस्तृत विवरण इस लिंक पर देखें -- tinyurl.com/RrpWealthTax
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विज्ञापनदाता : राहुल चिमनभाई मेहता, बी टेक , कम्प्यूटर साइंस, आई आई टी दिल्ली ; एम एस, कम्प्यूटर साइंस, रटगर्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका।
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राईट रिकॉल पार्टी ( पंजीकरण प्रक्रियाधीन )
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राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स आदि विषयों पर वीडियो देखने के लिए यू ट्यूब पर यह लिंक सर्च करें -- youtube.com/RightToRecallGroup
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( प्रकाशित विज्ञापन का समापन )
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