Pawan Jury BhilwaraRj

जब कोई लेखक कोई कृति रचता है तो उसमे विभिन्न अच्छे-बुरे चरित्र होते है। इन चरित्रों की मनोदशा में अंतर से ही कथा में टकराव और रोचकता आती है। यदि टकराव नहीं होगा तो कथा नहीं कही जा सकती। लेखक जब कोई अपनी कृति के माध्यम से कोई सन्देश देता है तो या तो यह उद्भोदन नायक के माध्यम से होगा या फिर लेखक स्वयं इसे कहेगा। उदाहरण के लिए मदर इण्डिया में नायक सुनील दत्त नहीं है बल्कि नरगिस है। अत: जब बिरजू गावं की बेटी को जबरन उठाकर ले जाने का प्रयास करता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि लेखक यह संदेश दे रहा है कि किसी की बहन-बेटी को जबरन उठाकर ले जाना चाहिए।
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इसी तरह से जब रावण कहता है कि -- "यदि आपको कोई स्त्री भा जाए तो उसे छल-बल या कैसे भी अपने अधिकार में ले लेना चाहिए। यही वीर पुरुष की नीति है" तो यह सन्देश तुलसीदास जी तरफ से नहीं है। यह रावण की मानसिकता है। और रावण कथा का नायक नहीं है।
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बिधिहूँ न नारी ह्रदय गति जानी
सकल कपट अघ अवगुण खानी , ( भरत उवाच, अयोध्या काण्ड, तुलसीकृत रामायण )
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अर्थात - स्त्री के ह्रदय की गति ब्रह्मा जी भी नहीं जान सके। स्त्री सब छल-पाप और दोषों की खान है।
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नारी सुभाऊ सत्य कब कहही
अवगुण आठ सदा उर रहहि, ( रावण उवाच, लंका काण्ड, तुलसीकृत रामायण )
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अर्थात - नारी का स्वभाव ही ऐसा है कि वह सत्य भासण नहीं करती। उसके ह्रदय में आठों अवगुण का वास होता है।
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तो यदि आप भरत और रावण को नायक मानते है तो ही ऊपर दिए गए कथन पर विश्वास करेंगे। किन्तु भरत और रावण द्वारा किया गया यह बकवाद अनुकरणीय नहीं है। क्योंकि भरत और रावण तुलसीदास जी की रामायण के नायक नही है। न ही ये मर्यादित है। और न ही तुलसी दास जी ने इन चरित्रों के माध्यम से कोई सन्देश देने के लिए रामचरित मानस की रचना की है।
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इसी तरह से "ढोल गवांर शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी", नामक कथन श्री राम या तुलसीदास जी द्वारा नहीं कहा गया है। यह कथन समुद्र नामक चरित्र ने कहा है। और समुद्र खुद ही कहता है कि मुझे बुद्धि नहीं है, भले बुरे का ज्ञान नहीं है, इसीलिए मुझसे यह त्रुटी हुयी। तो किसी कथा में एक बेवकूफ या कमजोर चरित्र जो भी कहे न तो वह विचारणीय होता है न ही लेखक का हेतु होता है। यदि लेखक इस वक्तव्य को सही मानता है और स्थापित करना चाहता है तो वह यह सन्देश नायक के माध्यम से देगा।
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मेरा बिंदु यह है कि, रामचरित मानस में श्री राम क्या कहते है वह अनुकरणीय हो सकता है या तुलसीदास जी क्या कहते है इसकी टीका की जा सकती है किन्तु एक दोयम दर्जे का चरित्र समुद्र क्या कहता है इस पर विचार करना खुराफात है। और सबसे बड़ी बेवकूफी यह है कि समुद्र के कथन को रामचरित मानस या तुलसीदास जी का प्रतिनिधि मान लिया जाए। दरअसल इस चौपाई को विवादास्पद बनाने के पीछे लक्ष्य राजनैतिक है। अलगाव बढाने के लिए इसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया और पाठको के एक वर्ग ने इसे जस का तस लपक लिया।
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