Pawan Jury BhilwaraRj
क्रिकेट को क्यों खेल की श्रेणी से निकाल देना चाहिए ?
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एक तर्क यह है कि -- "सरकार को सभी खेलो के साथ समान रूप से पेश आना चाहिए । क्रिकेट को खेल की श्रेणी से निकालना क्रिकेट के साथ सौतेला व्यवहार है" ।
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किंतु मेरा मानना है कि क्रिकेट अन्य खेलो की तरह नही है । क्रिकेट का मामला अपवाद है ।
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१. क्रिकेट कोई खेल नही है, यह एक बिज़नेस है । अतः सरकार इसे यदि खेल की श्रेणी से निकाल भी देगी तब भी पैड मीडिया एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इसे प्रोत्साहित करती रहेगी और यह चलन में बना रहेगा । क्योंकि यह खेल पैसा बनाता है जबकि अन्य सभी खेल पैसा गँवाते है ।
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२. क्रिकेट में बेतहाशा सट्टे बाज़ी है, और हर सिरीज़ ख़त्म होते होते सैंकड़ों घर परिवार उजड़ जाते है । युवाओं को भी इस पर सट्टा लगाने की लत है । वे पैसा उधार करके रातों रात लखपति बनने के लिए सट्टा लगाते है और गले गले तक क़र्ज़ में डूब जाते है ।
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३. अनिश्चितता खेल का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है । किंतु क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग एक अनिवार्य तत्व है जो कि इसे खेल नही रहने देता । अन्य खेलो में इस पैमाने पर फ़िक्सिंग नही है ।
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४. क्रिकेट एक महँगा खेल है । बच्चों को क्रिकेट की लत लग जाती है और माता पिता को हैसियत न होने पर भी उन्हें खेल का सामान दिलाना होता है । एक बच्चे की किट पर लगभग 5-10 हज़ार का ख़र्च आता है । जबकि अन्य आउटडोर खेल सस्ते है, और किसी भी वर्ग के बच्चे इन्हें खेल सकते है ।
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५. बाज़ार क्रिकेट को भुगतान करता है, अतः राज्य स्तर के खिलाड़ियों को भी मोटा पैसा एवं सुविधाएँ मिलती है । ( आज का मुझे मालूम नही है, किंतु १० साल पहले राज्य स्तर के जूनियर [१७ वर्ष से कम आयु ] खिलाड़ी को एक मैच का 4 हज़ार रुपया मिलता था जबकि हेंडबोल या होक़ी के खिलाड़ी को 150 रुपए मिलते थे । जूनियर क्रिकेटरों को तब 3 स्टार होटेल में ठहराते थे जबकि अन्य खेलो के खिलाड़ियों को धर्मशाला में )
यह सभी भुगतान बाज़ार करता है तो इसमें दख़ल नही दिया जा सकता । किंतु उस पर तुर्रा यह कि ज़िला स्तर पर सरकारें सम्मानित भी इन्ही खिलाड़ियों को कर देती है । अर्जुन, पद्म, भारत रत्न आदि एवार्ड अलग से है । यह सरकारी सम्मान और प्रोत्साहन अन्य खेल के खिलाड़ियों को बलात रूप से क्रिकेट की और ठेलता है । उन्हें लगता है कि हम बेवक़ूफ़ है जो क्रिकेट नही खेल रहे है । इस तरह क्रिकेट अन्य खेलो को खा रहा है । जब बाज़ार क्रिकेट के पीछे इतनी मजबूती से खड़ा है तो सरकार को चाहिए कि वह इसे पूर्ण रूप से बाज़ार के हवाले कर दे ।
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६. और इस बात पर कोई बहस नही है कि जितने ज़्यादा युवा/बच्चे क्रिकेट खेलेंगे और देखेंगे देश को उतना ही नुक़सान होगा । बेरोज़गारी बढ़ेगी, आत्म हत्याएँ बढ़ेगी, अपराध में वृद्धि होगी और प्रतिभाशाली बच्चों का भविष्य बर्बाद होगा । अन्य खेल इस पैमाने पर हानि नही पहुँचाते ।
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७. क्रिकेट के कारण युवा आज ऐसे लोगों को अपना हीरो बना कर रखे है जो कि वास्तविक अर्थों में अनुसरण करने लायक नही बल्कि बहिष्कार करने लायक है । आज के सभी क्रिकेट खिलाड़ी फिक्सर है, यानी वे कपटी, धूर्त, झूठे, मक्कार और भ्रष्ट है । सभी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंट है वो अलग से । मतलब एंटी नेशनल भी है । टके टके पर नीलाम होते है । और ये युवा पीढ़ी के आदर्श है । इतनी गंदगी अन्य किसी खेल में नही । एक बोलीवुड़ है और अब बोलीवुड़ की यह दूसरी ब्रांच और आ गयी है ।
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८. क्रिकेट में जितना व्यापार, सट्टा और फ़िक्सिंग है सब विदेशियों एवं डी कम्पनी के नियंत्रण में है । इस तरह यह खेल जो रुपया बनाता है वह हमारे दुश्मन को मजबूत और देश को कमज़ोर करता है ।
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इसीलिए मैं इस बात में मानता हूँ कि जिस तरह सभी प्रकार के नशों को एक श्रेणी में नही रख सकते उसी तरह क्रिकेट को अन्य सभी खेलो के समकक्ष नही रखा जा सकता । क्रिकेट शराब, तम्बाकू, अफ़ीम, भांग, कैफ़िन नही है, यह कोकीन बन चुकी है ।
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इसीलिए मेरे मत में सरकार को चाहिए कि वह इसे खेल की श्रेणी से निकाल बाहर करे और क्रिकेट की मैच फ़िक्सिंग को क़ानूनी कर दे । इससे देश पर छाये इस नशे का काफ़ी हद तक शमन हो जाएगा ।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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