Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Pawan Jury BhilwaraRj:
प्रश्न - यदि भारत में FDI आने से विनाश हो जाएगा तो FDI तो चीन में भी आयी है। फिर उनकी सुरक्षा खतरे में क्यों न पड़ी ?
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[ repatriation crisis, difference between FDI in india and FDI in china, side effect of make in india, how FDI will ruin india ]
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सन्दर्भ - असली खतरा ऍफ़डीआई जनित विकास है। जितना ही भारत में एफडीआई जनित विकास होगा उतनी ही हमारी सुरक्षा खतरे में पड़ती जायेगी।
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स्पष्टीकरण - एफडीआई के दुष्प्रभाव :
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1) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में इस शर्त पर पूँजी निवेश कर रही है कि जो "मुनाफा" वे रुपयों में कमाएंगे उसके बदले हमें उन्हें डॉलर का चुकाने होंगे। उदाहरण के लिए - मान लीजिये कोई विदेशी कम्पनी भारत में बुलेट ट्रेन चलाने के लिए 100 करोड़ डॉलर का निवेश करना तय करती है। तो अमुक कम्पनी भारत सरकार में 100 करोड़ डॉलर जमा करेगी और भारत में कारोबार करने के लिए भारत सरकार से 100*70 = 7000 करोड़ रुपये प्राप्त करेगी।
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अब मान लीजिये कि अमुक कम्पनी अगले 10 वर्ष भारत में बुलेट ट्रेन चलाकर पूँजी पर पांच गुना मुनाफा कमाती है। कम्पनी ने मूल रूप से 7000 करोड़ रूपये का निवेश किया था अत: इस हिसाब से उसका मुनाफा 7000*5 = 35,000 करोड़ रूपये हुआ। अब कम्पनी ये पूरे 35 हजार करोड़ रुपये भारत सरकार में जमा करेगी और इसके बदले में भारत सरकार को डॉलर चुकाने होंगे !!! मतलब भारत सरकार इस कम्पनी को 35,000/70 = 500 करोड़ डॉलर चुकाने के लिए बाध्य है। कमाए गए इन रुपयों के बदले इस तरह डॉलर चुकाने को पुनर्भरण कहते है।
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भारत ने बीमा से लेकर निर्माण, मीडिया, मशीनरी, उपभोक्ता, रक्षा, कृषि, बैंकिंग, रियल एस्टेट, सोशल मिडिया, कंप्यूटर, मोबाईल, खनन, शिक्षा, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्र एफडीआई के लिए खोल दिए है अत: जितना ही इन कंपनियों का भारत में विकास होगा उतना ही ये कम्पनियां मुनाफा कमाएगी एवं उसी अनुपात में इनके पास रुपयों का ढेर इकट्ठा होगा। और रुपयों के इस ढेर के बदले हमें डॉलर चुकाने होंगे। भारत के पास सिर्फ रुपये छापने की मशीने है, डॉलर छापने की मशीने नहीं है। तब हम ये डॉलर कहाँ से लायेंगे ? चूंकि हमारा निर्यात पहले से ही गिरा हुआ है और हम उधर भी डॉलर गवां रहे है अत: इसके लिए हमें अपनी राष्ट्रीय संपत्तियों का विनिवेश करना होगा।
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मतलब हमें अपने प्राकृतिक एवं भू संसाधन बेचने होंगे। इस बेचने को सरकार, मीडिया एवं बुद्धिजीवी वर्ग विनिवेश विनिवेश एवं निजीकरण या पीपीपी मोड़ कह कर पुकारता है। जैसे भारत ने कोल इण्डिया बेच दिया, रेलवे स्टेशन बेचने शुरू कर दिये, ट्रेन ट्रेक बेचे जा रहे है, आईसीआईसीआई एवं एचडीऍफ़सी बेचे जा चुके है, एसबीआई को बेचने की तैयारी है, कई खदाने हम विदेशियों को बेच चुके है आदि। इस बेचान से सरकार के पास पुनर्भरण के लिए एवं आवश्यक सामान आयात करने के लिए डॉलर आते है। लेकिन इन संसाधनों को बेचने की एक सीमा है। जब यह ख़त्म हो जाते है तो देश दिवालिया हो जाता है। दर्जनों देश दिवालिये हो चुके है।
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लेकिन चीन ने इस समस्या का क्या समाधान किया ?
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चीन ने 1978 में जब विदेशी निवेश के लिए अपनी अर्थव्यवस्था खोली तो उसने पुनर्भरण से बचने के लिए निम्न दो कदम उठाये
a) चीन ने विदेशी कंपनियों को युआन में कमाए गए मुनाफे के बदले डॉलर देने से इनकार कर दिया। चीन में यह शर्त रखी कि वह किसी कम्पनी को पुनर्भरण के रूप में उतना ही डॉलर देगा जितना कि उसने मूल पूँजी का निवेश किया है। यदि अमुक कम्पनी को ज्यादा डॉलर चाहिए तो उसे निर्यात करना होगा।
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स्पष्टीकरण : मान लीजिये कोई कम्पनी 'ट' चीन में 100 करोड़ डॉलर का निवेश करती है तो चीन सरकार उसे 100*7 = 700 करोड़ युआन देगी। अब यदि 'ट' अगले 10 वर्ष में 5 गुना मुनाफा कमाती है तो 'ट' के पास 700*5 = 3500 करोड़ युआन होंगे। किन्तु चीन की सरकार इन सभी युआन के बदले डॉलर नहीं देगी। चीन कम्पनी 'ट' को सिर्फ 100 करोड़ डॉलर ही देगी। क्योंकि दस साल पहले 'ट' ने जो पूंजीगत निवेश किया था वह 100 करोड़ डॉलर ही था। अब यदि 'ट' को ज्यादा डॉलर चाहिए तो उसे चीन से निर्यात करना होगा। यदि 'ट' निर्यात करेगी तो चीन को 'ट' की वजह से डॉलर की कमाई होगी और जितना डॉलर 'ट' के निर्यात से चीन की तिजौरी में आएगा चीन की सरकार 'ट' को उतना ही डॉलर चुकाएगी। और इस व्यवस्था के कारण चीन पर डॉलर चुकाने का बोझ नहीं आएगा। ऐसे चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पुनर्भरण की समस्या से छुटकारा पाया।
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b) कई कम्पनियां ऐसी भी होती है जो निर्यात नहीं कर सकती जैसे मेक्डोनाल्ड या पिज्जा कम्पनियां। और जो विदेशी पर्यटक चीन में आते है उन्हें दैनिक खान-पान आदि के लिए अमेरिकन उत्पाद ( पेप्सी, मेक्डोनाल्ड आदि ) चाहिए। यदि ये प्रोडक्ट चीन में नहीं मिलेंगे तो चीन में विदेशी पर्यटन घटेगा और उन्हें विदेशी मुद्रा की हानि होगी।
इस समस्या के समाधान के लिए चीन ने एक नयी करेंसी "FEC युआन" चला दी। यह भी युआन की तरह ही है। किन्तु विदेशी उपभोक्ता कम्पनियां अपने उत्पाद FEC युआन के बदले ही बेच सकती थी, सामान्य युआन के बदले में नहीं। इस तरह यदि कोई विदेशी पर्यटक चीन में आता है तो वह अपने डॉलर जमा करके FEC युआन ले लेता है। उसे जो भी विदेशी प्रोडक्ट चीन में खरीदने है उसके बदले में वह FEC युआन देगा। और अमुक कम्पनी ये FEC चीन की सरकार में जमा करके डॉलर ले सकती है। यदि विदेशी कम्पनी सामान्य युआन के बदले में अपने उत्पाद बेचेगी तो चीन की सरकार उसके बदले में डॉलर नही देगी। इस तरह से चीन ने डबल करेंसी चलाकर विदेशी पर्यटन को बनाए रखा और डॉलर चुकाने से भी बच गया।
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2) बहुराष्ट्रीय कंपनियां एवं मिशनरीज जॉइंट पैकेज है। अत: जिस देश एफडीआई आएगी वहां दूसरे चरण में बड़े पैमाने पर धर्मान्तर होंगे। सरकारी स्कूलों एवं सरकारी अस्पतालों का ढांचा टूटेगा, गरीबी पनपेगी ताकि धर्मान्तर एवं सस्ते श्रम के अवसर उपलब्ध हो। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुख्य लक्ष्य है --- देश पर आर्थिक, सामरिक एवं सांस्कृतिक नियन्त्रण बना लेना, ताकि प्राकृतिक संसाधनों को औने पौने दामो पर लूटा जा सके। मीडिया विदेशियों के नियंत्रण में जाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के पास नेताओ को चुनाव जिताने एवं हराने की ताकत आ जाती है। मीडिया द्वारा जन मानस को नियंत्रित करने से नेता नियंत्रण में आ जाते है और नेताओ को काबू करने के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के मालिक नेताओ को अपना कठपुतली बना कर देश को नियंत्रित करते है। किन्तु मीडिया इस तरीके से दिखाता है कि स्थानीय नेता ही कंट्रोल कर रहे है।
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इसके अलावा एफडीआई आने से बड़ी कम्पनियां व्यापार स्थानीय स्वदेशी इकाइयों को धीरे धीरे निगल जाती है और पूरे बाजार पर एकाधिकार कर लेती है। इस पूरी कवायद का आधार यह है कि अमुक देश को सैन्य दृष्टी से अक्षम बनाए रखा जाए। यदि अमुक देश में सैन्य आत्म निर्भरता हुयी तो वे किसी भी दिन बल प्रयोग से इन्हें उखाड़ कर फेंक सकते है। इसीलिए जिस भी देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जाती है उस देश की स्थानीय हथियार निर्मात्री संस्थाओं की कमर तोड़ देती है। एक बार सैन्य आत्मनिर्भरता खोने के बाद अमुक देश वास्तविक रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियंत्रण में आ जाता है।
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चीन ने इस समस्या का सामना कैसे किया ?
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चीन ने विदेशी मिडिया को कारोबार करने की अनुमति नहीं दी। सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए सोशल मिडिया आज बेहद ताकतवर है और इसका राजनैतिक महत्त्व है। यदि विदेशी मिडिया एवं सोशल मिडिया की बड़ी कम्पनियां चीन में आ जायेगी तो चीन की स्थानीय इकाइयां पनप नहीं सकेगी और मिडिया पर विदेशियों का एकाधिकार हो जाएगा। इसीलिए चीन ने फेसबुक, गूगल, वहाट्स एप्प, याहू, गूगल मैप्स, यू ट्यूब, ट्विटर, ब्लोग स्पोट, इन्स्टाग्राम आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिए, ताकि इस क्षेत्र में Weibo जैसी स्थानीय इकाइयों को पनपने का अवसर मिला और आज चीन का सारा इंटरनेट और सोशल मिडिया नेटवर्क उनकी खुद की कम्पनियों पर चल रहा है।
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भारत की स्थानीय इकाइयां और देशी उद्योगपति भी भारत के लिए फेसबुक, ट्विटर, गूगल जैसी कम्पनियां खड़ी कर सकते थे किन्तु भारत की सरकारों ने विदेशीयों से घूस खायी और भारत का बाजार इनके हवाले कर दिया। उल्लेखनीय है कि फेसबुक और गूगल जैसी कम्पनियों के विश्वव्यापी विस्तार के पीछे वजह यह है कि इन कम्पनियों को अमेरिकी सरकार ( सीआईए ) मदद देती है। फेसबुक-गूगल दोनों कम्पनियां घाटा बनाती है, किन्तु अमेरिकी सरकार इनका घाटा पूरा करके इन्हें बाजार में बनाए रखती है। पर भारत की सरकारे भी फेसबुक और गूगल को ही बढाने में सहयोग करती है और इनका देश में प्रमोशन करती है। जबकि चीन ने इन्हें प्रतिबंधित किया, और स्थानीय इकाइयों को सहयोग किया जिसकी वजह है उनका मिडिया चीनी कंपनियों के नियंत्रण में रहा।
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इसके अलावा चीन ने रक्षा, बैंकिंग, खनन जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रो में विदेशी कंपनियों को व्यापार करने के अवसर नहीं दिए। इस वजह से चीन की स्वदेशी हथियार उत्पादक कम्पनियां टिकी रही और आज लड़ाकू विमान से लेकर युद्ध पोत, रडार, पन्दुब्बियाँ, मिसाइले आदि सभी हथियार खुद से बनाता है, जिससे उनकी सेना आत्मनिर्भर बनी हुयी है। भारत ने अपना समूचा रक्षा क्षेत्र विदेशियों के हवाले कर दिया है जिससे हमारी सेना आज परजीवी बन चुकी है और यह स्थिति बद से बदतर होती चली जायेगी।
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साथ ही चीन ने विदेशियों को चीन में भूमि खरीदने की अनुमति नहीं दी, जिसकी वजह से विदेशी बड़े पैमाने पर चीन में जमीने नहीं खरीद पाए। चीन में भारत की तुलना में 10 गुना ज्यादा न्यायधीश होने और उनकी नियुक्ति सिर्फ लिखित परीक्षा होने से वहां की न्यायपालिका तेजी से काम करती है, और न्याय पालिका वह कारक है जो उद्योगिक विकास को सीधे प्रभावित करता है।
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तो इस तरह के व्यवस्थागत फैसलों द्वारा चीन ने FDI के बावजूद विकास किया और आत्मनिर्भरता हासिल की।
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आज भारत के सभी क्षेत्र विदेशी निवेश के लिए खोले जा चुके है। हथियार निर्माण में हम जीरो है। तकनिकी निर्माण में हम कहीं नजर नहीं आ रहे। समूची सूचना क्रान्ति जैसे कम्प्यूटर, मोबाईल, टीवी, इंटरनेट, सोशल मिडिया, प्रिंट मिडिया, इलेक्ट्रोनिक मिडिया आदि विदेशियों के हवाले है। बैंक विदेशियों के हवाले है। रेल, स्टेशन, रेल ट्रेक, सड़के, यातायात, खनन से लेकर सभी महत्त्पूर्ण क्षेत्र विदेशियों के नियंत्रण में है और ये नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पतालों की हालत खराब है और ऍफ़डीआई आने से यह और भी खस्ता होती चली जाएगी।
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समाधान ?
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इस स्थिति को सिर्फ अच्छे कानूनों को लाकर ही पलटा जा सकता है। सभी समस्याओं के समाधान के लिए हमें कई क़ानून चाहिए। यदि कार्यकर्ता सरकार पर अच्छे कानूनों को लागू करने का दबाव बना पाते है तो उन कानूनों को लागू करवाया जा सकता है जिससे इन समस्याओं का समाधान हो।
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समाधान के लिए हमने राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स, हथियार बंद नागरिक समाज जैसे कई कानूनों के ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। इन कानूनों के विवरण देखने के लिए इस लिंक को क्लिक करे --- https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112
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