Pawan Jury BhilwaraRj
योगी आदित्यनाथ ; सोशल मिडिया पर चलाये गए प्रचार अभियान और प्रधानमंत्री को भेजे गए ट्विट्स द्वारा बने जन दबाव में मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मिशनरीज को पीछे हटना पड़ा। हिंदुवादियो ने यूपी में सांकेतिक विजय हासिल कर ली है। लेकिन कार्यकर्ताओ और योगी जी की असली परीक्षा अब शुरू होगी।
.
१) हिन्दूवादी छवि, भीड़ में उन्माद जगाने वाली वक्तृता, वास्तविक जनाधार, उर्जावान, ब्रह्मचारी, अपने दम पर चुनाव जीत कर आने और जिताने की योग्यता, और कट्टरपंथी --- मोदी साहेब के बरअक़्स योगी जी पीएम मेटेरियल है। मोदी साहेब के लिए योगी आदित्यनाथ पहली पसंद नहीं थे। मिशनरीज और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भी यही चाहते थे कि महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह ही उत्तर प्रदेश में भी किसी लुंज पुंज नेता को टेप दिया जाए। लेकिन हिंदूवादी कार्यकर्ताओं ने सोशल मिडिया पर अभियान चलाकर उन पर निर्णायक दबाव बना दिया। शायद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मोदी साहेब ने इस बात को महसूस कर लिया था कि, यदि उन्होंने अपना फैसला नहीं पलटा तो कार्यकर्ताओ का एक बड़ा वर्ग "खुले तौर" पर मोदी साहेब के खिलाफ जा सकता है। तो मेरे विचार में, कार्यकर्ताओ को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मोदी साहेब को पीछे हटने के लिए बाध्य कर दिया।
.
=====
.
२) एक नुकसान यह हुआ कि मोदी साहेब एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने योगी जी को चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित नहीं किया था। यदि ऐसा किया जाता तो जनता द्वारा दिया गया यह जनादेश सीधे योगी जो के लिए होता और वे सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होते। किन्तु व्यवहारिक तौर पर अब योगी जी पार्लियामेंट्री बोर्ड और मोदी साहेब के प्रति जवाबदेह हो गए है। और यही सबसे बड़ी समस्या बन सकती है।
2014 से पहले तक मुझे मोदी साहेब से कुछ उम्मीद थी। किन्तु पीएम बनने के बाद जिस तरह भारत में मिशनरीज और इस्लाम के बढ़ते "गैर वाजिब" प्रभाव में वृद्धि हुई और हिन्दू धर्म की हानि हुयी है, उसके कारण मैं मोदी साहेब की नीतियों का विरोधी हूँ। अब कार्यकर्ताओ को अपेक्षा है कि योगी जी राष्ट्रवादी-हिंदूवादी एजेंडे क आगे बढ़ाएंगे। किन्तु इसी बिंदु पर योगी जी को मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मिशनरीज के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। यदि वे पहले से मुख्यमंत्री के प्रत्याशी होते तो उनकी लड़ाई बेहद आसान होती। क्योंकि प्राप्त जनादेश भी उनका अपना होता। किन्तु अब स्थिति भिन्न है। इस स्थिति में उन्हें कार्यकर्ताओ के सक्रीय समर्थन की जरुरत होगी। वर्ना ज्यादातर संभावनाएं है कि मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक और मिशनरीज उन्हें दबा लेगी। और यदि वे दबाव में आ गए तो जल्दी ही योगी जी का मोदीकरण हो जाएगा।
.
=====
.
३) निचे कुछ वरीय मुद्दे दिए गए है, जिन पर "प्रभावी कदम" उठाने की अपेक्षा योगी जी से की जाती है, और इसके लिए योगी जी को मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको और मिशनरीज के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा :
.
(a) यूपी/भारत में मिशनरीज के बढ़ते प्रभाव को कम करना।
.
(b) यूपी/भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते कदम रोकना। क्योंकि यदि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक यदि अर्थव्यवस्था/मिडिया आदि के क्षेत्रो को इसी तरह से अधिगृहित करते रहेंगे तो आनुपातिक रूप से मिशनरीज की ताकत भी बढती चली जायेगी।
.
(c) जनसँख्या के बिगड़ते धार्मिक संतुलन को रोकने के लिए "टू चाइल्ड पोलिसी"
.
(d) गौ हत्या में कमी लाने के लिए आवश्यक कानूनो को लागू करना।
.
(e) अयोध्या में राम, मथुरा में कृषण एवं काशी में विश्वनाथ देवालय के निर्माण के लिए आवश्यक कानूनो पर फ़ैसला।
.
(f) अपराध कम करने के क्रम में पुलिस व अदालतों को सुधारने के लिए व सरकारी स्कूलों एवं सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाने के लिए वे क्या कदम उठाते है।
.
(g) यूपी/भारत से बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए वे किस क़ानून का प्रस्ताव करेंगे।
.
=====
.
४) ऊपर लिखे गए सभी मुद्दों को मोदी साहेब ने पीएम बनते ही तिलांजलि दे दी थी, और उन्होंने अपने तीन साला कार्यकाल में इनमे से किसी भी समस्या को हल करने के लिए कोई भी क़ानून पास नहीं किये। उल्टे उन्होंने ऐसे कई कदम उठाये जिससे हिन्दू धर्म की क्षति हुयी, राष्ट्र कमजोर हुआ और भारत में मिशनरीज एवं इस्लाम के "गैर वाजिब" प्रभाव में बढ़ोतरी हुई। अंध भगतो को जाने दे तो, ये मुख्य कारण थे जिनकी वजह से राष्ट्रवादी-हिंदुवादी कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मोदी साहेब से मोह भंग हो गया। लेकिन "विकल्प के अभाव में" वे मोदी साहेब का समर्थन करने के लिए बाध्य थे। लेकिन योगी जी का विकल्प आने से अब स्थिति पलट चुकी है।
.
बीजेपी का मुख्य प्रभाव क्षेत्र हिंदी पट्टी या उत्तर भारत है। उतर प्रदेश, उत्तर भारत का राजनैतिक-धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से प्रतिनिधित्व करता है। योगी जी यदि इन मुद्दों पर प्रभावी कदम उठाते है तो देश में राष्ट्रवादी-हिंदुवादी कार्यकर्ताओ में उनकी लोकप्रियता बेहद तेजी से बढ़ेगी। और समर्थको के इस प्रतिस्थापन से मोदी साहेब का आभा मंडल गिर जाएगा। यूपी का मुख्यमंत्री तय करने में इसीलिए इतना वक्त लगा। योगी जी मोदी साहेब की अंतिम पसंद थे। किन्तु जनसमर्थन के कारण योगी का दावा मजबूत होता चला गया। यह फैसला सर्वसम्मति से नही बल्कि टकराव से निकला है।
.
=====
.
५) यदि योगी जी मोदी साहेब के उलट राष्ट्रवादी-हिंदूवादी एजेंडे को अमल में लाने के लिए आवश्यक कदम उठाते है तो मोदी साहेब और उनके आकाओ ( बहुराष्ट्रीय कम्पनिया एवं मिशनरीज ) से उनका टकराव बढ़ जाएगा। यदि वे इन मुद्दों पर दब जाते है तो उन्हें इनके किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा।
.
धरातल की बात करे तो मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कम्पनियो एवं मिशनरीज की ताकत के सामने योगी जी टिक नहीं पायेंगे। बशर्ते कार्यकर्ता एवं नागरिक इन मुद्दों पर योगी जी के समर्थन में डटे रहे।
.
मेरे विचार में एक मात्र समाधान यह है कि जिस तरह कार्यकर्ताओ ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए सोशल मिडिया पर अभियान चलाया है, यह अभियान जारी रहना चाहिए। कार्यकर्ताओ को चाहिए कि जिस दिन योगी जी शपथ ले उसके अगले दिन से ही योगी जी के ट्विटर हेंडल पर इन समस्याओ को हल करने के लिए आवश्यक कानूनों के प्रस्ताव ट्वीट करने शुरू कर दे। जैसे जैसे कार्यकर्ता गौ हत्या रोकने, बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने, राम मंदिर निर्माण, मंदिरो के प्रशासन को बेहतर बनाने आदि मुद्दों पर ट्वीट करना शुरू करेंगे अन्य नागरिक भी इस अभियान में जुड़ते चले जायेगे। यदि उनके ट्विटर हेंडल पर किसी मुद्दे को लेकर लाखों ट्वीट आएंगे तो यह साफ़ नजर आएगा कि नागरिक अमुक क़ानून की मांग कर रहे है।
.
और यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है ---- इन मांगो का जन दबाव साफ़ नजर आना चाहिए। सिर्फ तब ही योगी जी इन मुद्दों पर कार्यवाही कर पाएंगे। यही "व्यक्त" जनदबाव मोदी साहेब पर यह दबाव बनाएगा कि वे योगी जी के काम में रोड़े न डाले। यदि कार्यकर्ता यह दबाव बनाने और इसे जाहिर तौर पर "व्यक्त" करने में कामयाब रहते है तो इस बात की 100% संभावनाए है कि मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं मिशनरीज को फिर से पीछे हटना पड़ेगा।
.
यह उम्मीद इसीलिए है कि, मोदी साहेब के पीएम बनने के बाद ऐसा पहली बार देखा गया है कि, मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं मिशनरीज को जनदबाव के आगे अपने कदम पीछे खींचने पड़े है।
.
======
.
6) पहले दौर में मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं मिशनरीज को पीछे हटना पड़ा है, लेकिन दूसरे दौर में वे योगी जी को उसी तरह से नियंत्रित करने की कोशिश करेंगे जिस तरह उन्होंने पीएम बनने के साथ ही मोदी साहेब को कंट्रोल में ले लिया था/है। यही असली लड़ाई है। यदि कार्यकर्ता यह दबाव बनाने में नाकामयाब रहते है तो ज्यादातर से भी ज्यादा संभावनाए है कि मोदी साहेब, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक और मिशनरीज योगी जी को जल्दी ही नियंत्रण में ले लेंगे। और यदि ऐसा हो गया तो यह लड़ाई शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगी।
.
_____________________________