Pawan Jury BhilwaraRj
सिक्ख धर्म के कारण पंजाब में हिन्दू और सिक्ख बढ़ते इस्लामिक आतंक से भयग्रस्त नहीं है। जबकि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यो के हिन्दू इस्लाम के बढ़ते गैर वाजिब प्रभाव से डरे हुए है। और नतीजे में वे मोदी साहेब/बीजेपी/आरएसएस के उम्मीदवारों को वोट करते है।
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सिक्ख धर्म के उत्कृष्ट प्रशासन ने पंजाब में सिक्खो और हिन्दुओ को शक्तिशाली बनाया है, जबकि बीजेपी/आरएसएस हिन्दुओ की रक्षा करने का दिलासा देते है किन्तु उन्हें दुर्बल बनाये रखते है। इस तरह कमजोर होते हिन्दू बीजेपी/आरएसएस को वोट करना जारी रखते है। जितना ही हिन्दू कमजोर महसूस करके भयग्रस्त रहेंगे, उतना ही वे लामबंद होकर बीजेपी/आरएसएस को वोट करेंगे।
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राईट टू रिकॉल पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओ में यह सबसे निर्णायक व मूलभूत अंतर है।
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हम राईट टू रिकॉल पार्टी के कार्यकर्ता मतदाताओ से यह अनुरोध करते है कि वे उन कानूनों का समर्थन व मांग करे जिससे हिन्दू धर्म एवं इसके विभिन्न सम्प्रदायो के प्रशासनिक ढाँचे को सिक्ख धर्म की तरह मजबूत बनाया जा सके तथा मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जा सके। इन कानूनों के आने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि मंदिरो के कोष का इस्तेमाल हिन्दू धर्म के प्रशासन को दुरुस्त करने और हिन्दुओ को हथियारों का प्रशिक्षण देने में किया जा सके।
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इसके उलट बीजेपी/आरएसएस के कार्यकर्ता मंदिरो पर सरकार का नियंत्रण चाहते है, ताकि मन्दिरो के कोष पर बीजेपी/आरएसएस के नेता नियंत्रण रख सके। इस तरह से मंदिरो की संपत्ति का उपयोग बीजेपी/आरएसएस के नेता अपने संगठन को मजबूत बनाने में कर पाते है और हिन्दुओ को हथियारों का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था गड्ढे में चली जाती है। इस वजह से हिन्दू कमजोर बने रहते है और असहाय होकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बीजेपी/आरएसएस की और दौड़ लगाते है।
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इसके अलावा भारत में इस्लामिक आतंक के बढ़ने के लिए दो कारण जिम्मेदार है -- टू चाइल्ड पॉलिसी क़ानून व जनमत संग्रह प्रक्रियाओ का अभाव।
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राईट टू रिकॉल पार्टी ने टू चाइल्ड पॉलिसी व जनमत संग्रह प्रक्रियाओ के लिए आवश्यक क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। लेकिन मोदी साहेब, आरएसएस एवं इनके सभी अंध भगत कतार बाँध कर इन कानूनों का विरोध कर रहे है !!!
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जैसा कि बीजेपी/आरएसएस के नेताओ को कहते सुना जाता है --- "जब तक हिन्दू डरा हुआ है, वह बीजेपी को ही वोट देगा" !! और एक भेदक नेता की तरह मोदी साहेब व आरएसएस के अन्य नेता यह सुनिश्चित करके रखते है कि हिन्दू दुर्बल बने रहे, खौफ में रहे और बीजेपी को वोट करते रहे।
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तो मेरा सभी कार्यकर्ताओ से कहना है कि यूपी की विजय का महिमामंडन करने से बचिए। उत्तर प्रदेश की विजय इस तथ्य को साबित करती है कि मोदी साहेब के पौने तीन साल के शासन के बावजूद हिन्दु खौफ में है उनके शासन ने हिन्दुओ को मजबूत नहीं बनाया है।
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समाधान - कार्यकर्ताओ को टू चाइल्ड पॉलिसी क़ानून, जनमत संग्रह प्रक्रियाऐ, हिन्दू धर्म के प्रशासन को सिक्ख धर्म की तरह मजबूत बनाने तथा मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए आवश्यक कानूनों को लागू करने के लिए प्रयास करने चाहिए। बीजेपी/आरएसएस को वोट देना सिर्फ इन संगठनों को ही मजबूत बनाएगा, हिन्दुओ को नहीं।
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हिन्दू धर्म एवं हिन्दूओ के कमजोर होने का मुख्य कारण हिन्दू धर्म का कमजोर प्रशासन है। प्रशासन को मजबूत बनाकर धर्म व हिन्दुओ को शक्तिशाली बनाया जा सकता है। हिन्दु धर्म के प्रशासन को सिक्ख धर्म से भी मजबूत बनाने के लिए हमने "राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट" क़ानून प्रस्तावित किया है। इस क़ानून के गेजेट में प्रकाशित होने से यह तय है कि हिन्दू धर्म विश्व के अन्य सभी धर्मो से अधिक शक्तिशाली* होकर उभरेगा।
(*) यहाँ अभिप्राय धर्म तथा उसके अनुयायियों को शक्तिशाली बनाने से है।
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प्रस्तावित क़ानून के बारे में कुछ विवरण यहाँ दिया जा रहा है। पूरा ड्राफ्ट देखने के लिए निचे दिया गया लिंक देखें।
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300 ईस्वी पूर्व से हिंदूवाद का विस्तार थम गया था, तथा 700 ई.पू. से यह लगातार सिमटना शुरू हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूवाद का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई.पू. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी। फिर 1947 ईस्वी में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया तथा बाद में इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना और 1947 से लेकर अब तक उत्तर-पूर्व तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके है।
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रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो !! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस समय में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर-गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र-शस्त्र (हथियार चलने) की शिक्षा देने, गरीबों को दवाई दिलवाने तथा उनके भलाई के लिए किया जाता था। इसलिए आश्रम-प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार (वारिस) द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम-प्रमुख के पुत्र को हीं आश्रम की बागडोर सौंपी जाये। आश्रम की यह बागडोर एक संत से दूसरे ऐसे संत को दी जाती थी जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनका कार्यकाल भी स्थायी नही होता था। संत बहुधा यात्रा पर रहते थे और मुक्त विचरण करते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में बची हुई है।
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वर्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन -
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वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख (ट्रस्टी) या संप्रदाय प्रमुख (गुरु) द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है।
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इसका समाधान सिक्ख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिक्ख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था तथा इसे सभी सिक्ख गुरुद्वारों में लागू किया। किन्तु दुर्भाग्य से यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। हमारे विचार से हमें इसे आज ही लागू करवाने के प्रयास करने चाहिए। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति को इकठ्ठा करने की प्रवृति को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते है।
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सिक्ख प्रशासन में उत्तराधिकार परम्परा नहीं होने से गुरूद्वारे प्रमुखों में धन संग्रह की प्रवृति नहीं थी और यही कारण है कि गैर सिक्ख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने आक्रमणकारियों को युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिक्ख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की बहुत कम मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का चुनाव निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होता है, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नहीं पाया जाता, इसलिए वे घायलों और मरने वालों के रिश्तेदारों की मदद करते हैं। इसलिए सिक्ख समुदाय में धर्म के लिए लड़ने का जोश बना रहता है, तथा लगातार बढ़ता हीं जाता है। और इस कारण सिक्ख अपने आप को और हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट यहाँ देखें -- https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407
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