Pawan Jury BhilwaraRj
नेताओ पर लगाए गए ये आरोप पूरी तरह से सही नहीं है कि -- वे चुनावो में किये गए अपने वादों को पूरा नहीं करते।
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यह सच है कि, नेता अपने वादे कभी कभार ही तोड़ते है। वे जितने वादे करते है उनमे से ज्यादातर को पूरा कर देते है।
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यह भी सच है कि, नेता अपने वादे कभी कभार ही पूरे करते है। जितने वादे वे करते है, उनमे से ज्यादातर वादों को वे कभी पूरा नहीं करते।
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ऐसे कैसे ?
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१) अस्पष्ट वादे -- दरअसल नेता अपने चुनावी अभियान में जानबूझकर अस्पष्ट वायदे करते है। ताकि अपने काम काज के प्रदर्शन की व्याख्या अपनी मर्जी से कर सके। उदाहरण के लिए वे कहेंगे कि -- हम भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और अपराध को खत्म कर देंगे। लेकिन वे यह कभी भी नहीं बताएँगे कि इन समस्याओ को खत्म करने के लिए वे किन कानूनों को लागू करेंगे।
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बाद में वे अपने कार्यकाल की तुलना पूर्ववर्ती सरकार से करेंगे और ये दावा करेंगे कि हमारे कार्यकाल में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और अपराध आदि में बेहद कमी आ गयी है। इस तरह से चुनावो के दौरान इस बात को लेकर बयानबाजी और थुक्का फजीहत होगी कि हमारा शासन अच्छा है और उनका बुरा है। यह जांचने का कोई "सटीक" तरीका नहीं होगा कि नेता ने अपने वादे पूरे किये है या नहीं। बयानबाजी और माहौल से मामला धारणाओ पर आधारित हो जाएगा, और धारणाए अपने आप में ही एक धोखा है।
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जनता कहेगी कि वादे पूरे नहीं हुए। जबकि नेता दावा करेंगे कि हमने वादे पूरे कर दिए है। जो जिस धारणा से सहमत हो वह उस धारणा की पैरवी कर सकता है।
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२) सिर्फ समस्याओ पर तब्सरा -- ज्यादातर नेता किसी समस्या पर बार बार बात करते है और नियमित रूप से बयान देकर इस तरह का माहौल बना देते है जिससे नागरिको को यह भ्रम हो कि ये आदमी सत्ता में आकर इस समस्या को हल कर देगा। पर टेक्निकली नेता ने यह कभी कहा ही नहीं होता है कि वे सत्ता में आकर इन समस्याओ को हल कर देंगे।
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ताजा उदाहरण 'टू चाइल्ड पॉलिसी' का है । साक्षी महाराज समेत संघ और सभी बीजेपी के नेता पिछले 20 साल से सभी हिन्दुओ को बार बार यह "याद" दिलाते रहते है कि अमुक धर्म की आबादी लगातार बढ़ रही है। इससे मासूम व आवेगी ( और खुद से ही समझदार भी ) हिन्दू नागरिक यह अर्थ निकालते है कि यदि बीजेपी सत्ता में आयी तो जनसँख्या के बिगड़ते धार्मिक असन्तुलन को सुधारने के लिए वे 'टू चाइल्ड पॉलिसी' क़ानून को लागू कर देंगे।
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जबकि सच्चाई इसके उलट है। दरअसल बीजेपी ने कभी भी अपने मेनिफेस्टो में टू चाइल्ड पॉलिसी के ड्राफ्ट को शामिल नहीं किया है। मतलब साफ़ है कि वे ऐसा कोई वादा नहीं कर रहे। अतः उन पर यह आरोप लगाना गलत है कि उन्होंने 'टू चाइल्ड पॉलिसी' का वादा किया था और वे मुकर गए।
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३) तकनिकी बहानेबाजी -- यह नया पैंतरा है। बीजेपी इसका प्रयोग इफरात में करती है। बीजेपी ने 1990 में कहा कि, मंदिर बनाएंगे। 1998 में सत्ता में आकर उन्होंने कहा कि, हम गठबंधन सरकार चला रहे है। पूर्ण बहुमत चाहिए। 2004 में सत्ता से बाहर होने के बाद फिर से कहा कि, मंदिर बनाएंगे। 2014 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला। बहुमत मिलने के बाद उन्होंने फिर से पहलू बदला और कहा कि, "राज्य सभा में बहुमत नहीं है"। जब राज्यसभा में बहुमत आ जाएगा तो वे कहेंगे कि, "यह मामला तो कोर्ट में है, हम कैसे मंदिर बना सकते है ? कोर्ट फैसला करेगा"।
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इस तरह से वे हमेशा आधी बात बोलकर मामले को उभाड़ देते है, और वक्त देखकर कानूनी प्रक्रियाओ का हवाला देकर मामले को भोट कर देते है। टेक्निकली नेता फिर से सही है। क्योंकि उन्होंने यह कभी भी नहीं कहा कि, यदि हम सत्ता में आये तो मंदिर बनाने की लिए अमुक कानूनी ड्राफ्ट को संसद में रखेंगे या इसे गेजेट में प्रकाशित कर देंगे।
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समाधान ?
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अपने नेताओ से वादे नहीं ड्राफ्ट मांगिये। यदि वे ड्राफ्ट देंगे तो पेंडुलम की तरह झूलने की जगह एक जगह टिक जाएंगे। तब सत्ता में आकर या तो वे अमुक ड्राफ्ट को लागू करेंगे या फिर साफ़ तौर पर एक्सपोज हो जायेंगे ।
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देश की विभिन्न समस्याओ के समाधान के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट्स की सूची यहाँ देखी जा सकती है :
https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112
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