Pawan Jury BhilwaraRj
भाजपा, सपा, बसपा, आपा, कोंग्रेस : आत्मदाह, फाँसी, बंदूक़ की गोली, ज़हर या सूली -- कोई भी तरीक़ा चुनिए, नतीजा मौत ही होगा ।
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ये सभी पार्टियाँ, अन्य छोटी पार्टियाँ व निर्दलीय उम्मीदवार सिर्फ समस्याओ को उठाकर नागरिको से वोट मांग रहे है। समाधान में किसी की रुचि नहीं।
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पाँचो पार्टियाँ सरकारी स्कूलों व सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने का 'दावा' करती है लेकिन इसके लिए आवश्यक उन सभी कानूनो का विरोध करती है, जिनके लागू होने से इनकी मौजूदा हालत में सुधार लाया जा सके !!
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पाँचो पार्टियाँ पुलिस व अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़त्म करना 'चाहती' है, किंतु उन सभी कानूनो का विरोध करती है जिससे पुलिस व अदालतों के प्रशासन को बेहतर बनाया जा सके ।
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दरअसल इस पार्टियों का दावा है कि, व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कानूनो में सुधार करने की ज़रूरत नही है । सिर्फ़ भाषण और एलान देने से समस्याएँ स्वतः हल हो जानी चाहिए*। और यदि इतने भाषण देने से भी समस्याएँ जस की तस है, तो दोष इनका नही है !!
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(*) उदाहरण के लिए मोदी साहेब ने कुछ ढाई साल पहले ही बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से खदेड़ने का फार्मूला निकाल लिया था। और क्या था वह फार्मूला --- वे बंगाल में गए और चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने एलान दिया कि 14 मई ( २०१४ ) को बांग्लादेशी घुसपेठियो को भारत छोड़कर जाना होगा। उन्हें पीएम बने ढाई साल हो गए। कोई नहीं गया !! बल्कि घुसपैठ जारी है !! और अब ये घुस्पेठिए अपने आधार कार्ड भी बनवा रहे है।
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भाजपा हिन्दू धर्म को मज़बूत बनाना 'चाहती' है, तथा यह भी 'चाहती' है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो । उनकी यह भी मंशा है कि जनसंख्या के बढ़ते धार्मिक असंतुलन को रोका जाना 'चाहिए', तथा २ करोड़ अवैध मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से खदेड़ा जाना 'चाहिए' ।
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लेकिन --
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भाजपा उन सभी कानूनो का भी विरोध करती है जिससे राम मंदिर का निर्माण सम्भव हो, बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ा जा सके, तथा मंदिरो के प्रशासन को दुरुस्त किया जा सके । और साथ ही भाजपा जनसंख्या के बढ़ते धार्मिक असंतुलन को रोकने के लिए आवश्यक 'टू चाइल्ड पॉलिसी' क़ानून का भी विरोध करती है ।
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स्वदेशी वाद व हिंदुवाद में मानने वाले मतदाताओं को दुहने के लिए कुछ नयी पार्टियाँ एवं निर्दलीय उम्मीदवार भी तात्कालीन विधानसभा चुनावों के मैदान में है । इनके पास ॐ, भगवा, मंदिर, हिन्दू, हिंदुत्व आदि के बारे में नारे है, पृष्ठभूमि में राजीव भाई दीक्षित के फोटो है, स्वदेशी स्वदेशी की पोपाट है, और इनका मानना है कि जो बीजेपी से थक चुके है उन मतदाताओं के पास हमें वोट करने के सिवा चारा नहीं बचा है।
लेकिन इनके पास भी सिर्फ नारे है, वादे है, पर समाधान के ड्राफ्ट नहीं है। ये भी समाधान में रुचि नहीं रखते। ये आपसे घंटो इस मुद्दे पर बहस कर सकते है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कम्पनियां देश को लूट रही है। लेकिन जैसे ही आप इनसे कहेंगे कि विदेशी कम्पनियों के बढ़ते नियंत्रण को रोकने के लिए हमें किन कानूनों की जरूरत है ? तो बस, इसी बात पर इनके हाथ पाँव सुन्न हो जाते है। इसीलिए यदि आप इन्हें समाधान के ड्राफ्ट देंगे तो ये कानूनी ड्राफ्ट पर बात करने से ही मना कर देंगे। समर्थन तो दूर की बात है। इनका मानना है कि जब सिर्फ समस्या उठाने से ही वोट बटोरे जा सकते है तो हमें समाधान पर क्यों समय खर्च करना चाहिए !!
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मेरा सभी कार्यकर्ताओं से आग्रह है कि सिर्फ उन उम्मीदवारों को गंभीरता से लेवें जिन्होंने अपने एजेंडे में समाधान के कानूनी ड्राफ्ट को शामिल किया है, तथा वे चुनावों के दौरान नागरिको तक इन कानूनी ड्राफ्ट्स की जानकारी भी पहुंचा रहे है। यदि आपके क्षेत्र में ऐसा कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं है और यदि आप चुनाव लड़ने की स्थिति में है तो बेहतर है कि आप स्वयं लड़ने की कोशिश करे।
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समाधान के क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करने वाले जितने ज्यादा उम्मीदवार मैदान में होंगे, अन्य उम्मदीवारो पर समाधान के ड्राफ्ट देने का उतना ही अधिक दबाव बनेगा। यदि वे क़ानून ड्राफ्ट देते है तो इन कानूनों के आने की सम्भावना बढ़ जायेगी, वरना समस्या को उभाड़कर वोट खींचने वाले ऐसे उम्मीदवार मतदाताओ के सामने एक्सपोज हो जायेंगे।
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