Pawan Jury BhilwaraRj

१) काले धन के तहत काली "नकदी" पर कार्यवाही -- गोया मुर्दे के बाल उतार कर उसका वजन कम करने का स्वांग किया जा रहा है !!
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२) क्या मोदी साहेब के शरीर में तीन गुर्दे है ?
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१)
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काले धन में वे संपत्तियां शामिल है, जिसका संचय बिना कर चुकाए किया गया हो, तथा जिन संपत्तियों की जानकारी सरकार को न दी गयी हो। अंग्रेजी में --- "अन एकाउंटेड एसेट्स"।
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काला धन मुख्य रूप से इन चार मदो में संचय किया जा रहा है --- जमीन, सोना, डॉलर और नकदी।
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जब आप कोई जमीन खरीदते या बेचते है, तो सर्किल रेट और मार्केट रेट में जो अंतर है, वह काला धन है। मतलब, यदि आपने कोई जमीन १० लाख में खरीदी, लेकिन रजिस्ट्री 4 लाख में करवाई और 6 लाख नकद दिए, तो यह 6 लाख काला धन है, जो कि आपके द्वारा अब जमीन में निवेश किया जा चुका है। इस 6 लाख के बारे में सरकार को खबर नहीं है। अतः सरकार को न इस पर कोई टेक्स मिलता है, न ही ये कहीं दर्ज किया जाता है।
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जितना सोना भारतीय परिवारों के पास है, किन्तु उन्हें बिल द्वारा नहीं ख़रीदा गया है, न ही आय या संपत्ति में घोषित किया गया है, वह काला धन है। चूंकि किसी भी जमीन को खरीदने के लिए कुछ मात्रा में सर्किल रेट के हिसाब से वैध धन चुकाना ही होता है, और यदि जमीन की कीमत ज्यादा है और किसी के पास इतना पैसा भी खाते में नहीं है तो कई लोग अपने काले धन को सोने में निवेश कर देते है। इस तरह सोना खरीदने में १००% काले धन का इस्तेमाल होता है।
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सार्वजनिक जीवन जीने वाले अरुण जेटली, चिदंबरम, सोनिया, केजरीवाल, मुलायम जैसे नेता, नौकरशाह, जज, और इनकी ही बिरादरी के रसूखदार लोग, जिनके पास अकूत काला धन है अपना पैसा देश से बाहर स्विस बैंक आदि में डॉलर के रूप में जमा रखते है।
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काली नकदी -- काले धन का वह प्रकार, जो नोटों यानी कैश के रूप में हो।
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भारत में जितना काला धन है, उसका सिर्फ 3 से 5% ही नकदी के रूप में है। शेष काला धन जमीनों, स्वर्ण और देश से बाहर संचित है।
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1000-500 के नोटों पर कार्यवाही काले धन पर कार्यवाही नहीं है। बल्कि यह "काली नकदी" पर की गयी कार्यवाही है। और यह कुल काले धन का सिर्फ 5% है। काले धन के जमाखोर भारत के नागरिको को पैसा निकलवाने की लाइनों में हलकान होते देख कर हंस रहे है, जबकि पेड मिडिया और प्रधानमंत्री इन हैरान नागरिको को यह समझाने में लगे है कि काला धन रखने वालो का सरकार ने तेल निकाल कर रख दिया है !!!
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२)
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सवाल पूछा गया कि -- "मोदी साहेब ने जिस तरह से काले धन पर कार्यवाही कि, इस तरह क्या वे अगले चरण में भू-स्वामियों पर भी ऐसी ही कार्यवाही कर सकते है ?
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जवाब -- क्या मोदी साहेब के पास तीन गुर्दे है ?
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आप नकदी को जला सकते है, कूड़े में फेंक सकते है, बहा सकते है, एक जगह से दूसरी जगह पर ले जा सकते है। लेकिन आपके नाम पर जो जमीन है उसे उखाड़ कर कहाँ लेकर जाएंगे ? आप अपने जमीनों के कागज़ जला भी देंगे तो राजस्व रिकार्ड यह जता देंगे कि, आपके और आपके पारिवारिक सदस्यो के नाम कितनी भूमि है। कितने ट्रस्टो में आप जुड़े हुए है और कितनी जमीन आपने ट्रस्टो के माध्यम से दबा रखी है, और इनका बाजार मूल्य क्या है।
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तो यदि मोदी साहेब देश के सभी भू स्वामित्व के रिकोर्ड नेट पर डालने का आदेश दे देते है तो जनता मय सबूत के यह जान जायेगी कि भारत के सांसदों, विधायको, मंत्रियों जजों, नौकरशाहों आदि ने कितने लाख करोड़ की जमीन अपने, अपने पारिवारिक सदस्यों और विभिन्न ट्रस्टो के नाम से दबा रखी है। और फिर जनता की सेवा के नाम पर जो मिलकियत इन्होने खड़ी की है उसका हिसाब जनता इनसे फौजदारी तरीके से लेगी। शायद देश के 90% नेताओ को अपनी जान बचाने के लिए रातो रात सपरिवार देश छोड़ना पड़े।
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तो क्या मोदी साहेब में यह राजनैतिक और नैतिक साहस है कि वे इन बघियारो को दुह सके ? नहीं। ये निरीह गायें नहीं है, जिन्हें मर्जी से हांका जा सके। इनके पास पैने दांत और तीखे पंजे है। इसीलिए मैंने कहा, यदि आप इन पर नकेल डालना चाहते है तो दो गुर्दे काफी नहीं है। आपके पास तीन होने चाहिए।
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बहरहाल, "काली नकदी" पर कार्यवाही के बाद कई लोग मोदी साहेब से यह उम्मीद लगा बैठे है कि वे भू स्वामित्व के सभी लेखे सार्वजनिक कर देंगे। उम्मीद भी बेवजह नहीं है। क्योंकि मोदी साहेब ने अपने भाषण में अगली कार्यवाही प्रोपर्टी वालो पर करने का एलान दिया है। मुझे उम्मीद कम है। इसकी दो वजह है -- 1) लगभग 2 वर्ष हुए, मैं मोदी साहेब के भाषण नहीं सुनता* ( हालांकि मैं केजरीवाल और राहुल के भाषण भी नहीं सुनता ), 2) मुझे इस बात की जानकारी है कि ऐसा फैसला करना मोदी साहेब की कूव्वत में नहीं है।
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फिर भी यदि काली नकदी पर कार्यवाही करने के बाद अगले चरण में मोदी साहेब भू-स्वामित्व के अभलेख सार्वजनिक कर देते है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकेगा कि, उन्होंने वह साहस दिखाया है जो 56 इंची छाती और 3 गुर्दे होने की तस्दीक करता है।
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(*) लोकसभा चुनावों के दौरान मैंने मोदी साहेब को काफी सुना था। लेकिन अब मैं उन्हें नही सुनता।

जब सोनिया, प्रियंका व राहुल भाषण देते है तो सुनने के लिए कुछ होता नहीं। सभी को मालूम है कि इन्हें कुछ नहीं मालूम। ये कभी कुछ बोलना नहीं चाहते। असल में इनके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं। ये सिर्फ तब ही बोलते है, जब बोलने के सिवा इनके पास कोई विकल्प शेष न रहे। एक तरह से ये तीनो बलात वक्ता है, जो जनता के सामने बोलने के लिए खुद से ही संघर्ष कर रहे है । जाने कैसे कांग्रेस के नेताओं ने इन्हें आज भी इस मुगालते में रखा हुआ है कि, लोग इन्हें सुनना चाहते है !!! जबकि लोगो की रुचि इनकी शक्ल देखने में भी नहीं बची है। इनका भाषण या बयान बकवास से शुरू होकर बकवास पर ही ख़त्म होता है। और भाषण के बीच में भी बकवास ही होती है। तो इस तरह की बकवास सुनने में कोई भी अपना समय नष्ट नहीं करना चाहेगा।

केजरीवाल और मोदी साहेब पाखंडी है। और ये पाखंड सिर्फ तब नजर आता है जब ये लोग भाषण देते है। यदि ये भाषण नहीं दे रहे होते है तो इनके द्वारा किये जा रहे काम को देख कर कोई इन्हें हद से हद वादा फरामोश, प्रजा विरोधी, स्वार्थान्ध और सत्ता लोलुप नेता ही कह सकता है। लेकिन भाषणों में इनका पाखण्ड खुलकर सामने आ जाता है। ये जब काम करते है तो दो पेड़ काट देते है। वैसे, सभी नेता धुवांधार देश की जड़े ही काट रहे है। लेकिन ये दोनों जब भाषण देते है, तो श्रोताओं से कहते है कि हम आज 4 पेड लगा आये है !!! ये पाखण्ड है। सुब्रह्मनियम स्वामी भी इसी श्रेणी के नेता है। तीनो में एक साम्य है। ये तीनो ही अच्छे वक्ता है, और ईमानदार भी है। मतलब धन लोलुप नहीं है, सिर्फ सत्ता लोलुप है। तो जब आप जानते है कि अमुक व्यक्ति आज ही दो पेड़ काट कर आया है, और वह शुरुआत ही इससे करे कि, आज मैंने 4 पेड़ लगा दिए है, तो आप में आगे कुछ सुनने का हौसला स्वत: ही ख़त्म हो जाता है।

शेष सभी नेताओ के भाषण भी झूठ से शुरू होकर झूठ पर ही ख़त्म होते है। और उनका ये झूठ उनके चेहरे पर साफ़ नजर आता है। जब आप जानते है कि, ये आदमी पहला वाक्य ही झूठ बोलेगा और अंत भी झूठ से ही करेगा, तो सुनने का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता।
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वैसे भाषण बाजी सिर्फ मनोरंजन है। देश के शासन का भाषणों से कोई लेना देना नहीं है। शासन उन आदेशो से चलता है जो आदेश प्रधानमन्त्री/मुख्यमंत्री गेजेट के माध्यम से जारी करते है। अत: मैं सरकार के काम काज को परखने के लिए उनके द्वारा लागू किये जा रहे कानूनों और राजपत्र अधिसूचनाओ के अवलोकन तक ही सीमित रहता हूँ। जब नेता अपने काम से जनता को संतुष्ट नही कर पाते तो भाषणों का पलेथन लगाकर उन्हें कन्विंस करने यानि फुसलाने की कोशिश करते है। वाजपेयी इस कला के पहुंचे हुए अय्यार थे।
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