Pawan Jury BhilwaraRj

हिन्दू नागरिक : मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके हिन्दू श्रद्धालुओ की नियंत्रण में दिया जाना चाहिए।
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संघ समर्थक : "पहली बार हिंदुवादी पी एम बना है, इसीलिए मंदिर मोदी साहेब के कंट्रोल में रहे तो ही अच्छा है । और मंदिरो से जो सोना लिया है, वह देश के विकास में काम आ रहा है । अगर मंदिरो की सम्पत्ति विकास के काम आ रही है तो देश के लिए तो अच्छा ही है

अगर वाक़ई संघ परिवार डोनेशन के पैसे हिंदू संगठनों को शक्तिशाली बनाने हेतु कर रहे है, तो यह तो बहुत अच्छी बात है, इसमें बुराई क्या है ?".
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रिकलिस्ट राहुल मेहता : संघ का शीर्ष नेतृत्व इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ बीजेपी के चुनावी वोट बैंक को मजबूत बनाने में कर रहा है, न कि हिन्दुओ के सशक्तिकरण में। संघ की कोई भी भगिनी संस्था या आनुषांगिक संगठन हिन्दुओ को कानूनी शिक्षा व हथियारों का प्रशिक्षण नहीं दे रहा है।
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हो सकता है कि आप "संघ ही भारत है, और भारत ही संघ है" में मानते हो। और शायद इसीलिए आप मंदिरो के कोष का इस्तेमाल संघ की भगिनी संस्थाओ को समृद्ध करने में किये जाने के फैसलो का समर्थन कर रहे है। लेकिन में भारत को संघ से कहीं ज्यादा ऊपर मानता हूँ, और इसीलिए यह चाहता हूँ कि, मंदिरो के प्रशासन पर हिन्दू श्रद्धालुओ का नियंत्रण होना चाहिए न कि संघ का।
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किसी कुलीन वर्ग द्वारा नियुक्त अधिकारियों की तुलना में चुने हुए अधिकारी जिन पर सर्व साधारण का नियंत्रण हो, ज्यादा कुशलता से कार्य करते है। कैथोलिक चर्च की तरह ही संघ का शीर्ष नेतृत्व भी खुद की और अन्य मुख्य पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति स्वंय ही करता है, और इसीलिए कैथोलिक चर्च इस्लाम और प्रोटेस्टेंट का मुकाबला करने में असफल रहा। और इसी वजह से अंतत: कैथोलिक चर्च उ=यूरोपीय देशो की कठपुतली बनकर रह गया, और यही संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ हो रहा है। बीजेपी और संघ के नेता बहुत ही सहजता से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मिशनरीज के हाथो की कठपुतली बनते जा रहे है।
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सिक्ख "चुने" हुए नेतृत्व के कारण ही मुगलो को हराने और ब्रिटिश से मुकाबला करने में सफल हो पाए थे। लेकिन सिक्ख ब्रिटिश से सिर्फ इसीलिए पराजित हुए क्योंकि सिक्खो के पास अपने धर्म गुरुओ को चुनने की प्रक्रिया तो थी किन्तु वे अपने राजा को नहीं चुनते थे, और साथ ही सिक्खो के पास ज्यूरी प्रक्रियाएं भी नहीं थी।
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अतः मेरे विचार में हिन्दू मंदिरो को SGPC जैसी संस्था द्वारा अधिनियमित करना संघ के अधीन करने से कही ज्यादा बेहतर विकल्प है।
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SGPC अधिनियम में भी कुछ कमियां है, और इसी वजह से सिक्खो में भी एक हद तक दलितों के प्रति भेदभाव पाया जाता है। लेकिन गुरुद्वारों में यह भेदभाव हिन्दू मंदिरो की तुलना में काफी कम है। अब तक कितने दलितों को स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया है ? किसी को भी नहीं।
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संघ के शीर्ष नेतृत्व की मंशा सिर्फ मंदिरो की संपत्ति और प्रशासन को नियंत्रण में लेने की है, न कि मंदिरो का प्रशासन बेहतर बनाने की। उदाहरण के लिए, कई संघ के कार्यकर्ता आज भी "कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था" जैसी बकवास करते है। और कुछ समय पहले तक तो संघ का शीर्ष नेतृत्व "कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था" की खुलकर पैरवी करते थे। और आज और अब तक भी संघ/बीजेपी के किसी भी नेता ने "कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था" का विरोध नहीं किया है। यहाँ तक कि मोदी साहेब भी इस विषय पर खामोश ही रहे है, और उन्होंने अब तक कभी भी "कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था" के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है। और यही कारण है कि दलित आज भी संघ/बीजेपी को वोट करने से कतराते है। यहाँ तक कि गुजरात में भी ज्यादातर दलित कोंग्रेस को ही वोट करते है।
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संघ समर्थक : "संघ मानता है कि, हिंदू एकजुटता के लिए हिंदू समाज से जात-पात का समाप्त होना अत्यावश्यक है"।
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रिकालिस्ट राहुल मेहता : संघ का शीर्ष नेतृत्व जातीय भेदभाव का सिर्फ जबानी विरोध करता है, लेकिन व्यवहार में जातीय भेदभाव को बढ़ावा देता है। असल में, संघ के शीर्ष नेतृत्व ने हमेशा से ही न्यायलय और प्रशासन में साक्षत्कार के आधार पर नियुक्तियों का समर्थन किया, जिससे उच्च पदों पर अगड़ी जातियाँ प्रतिस्थपित रहे और प्रशासन व समाज में जातिगत भेदभाव बना रहे।
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संघ का शीर्ष नेतृत्व दलितों से हमेशा यह कहता है कि, "जातिगत आधार पर वोट मत करो"। लेकिन संघ का शीर्ष नेतृत्व जजो से कभी नहीं कहता कि, साक्षात्कार के आधार पर नियुक्तियों की प्रणाली बंद करो। दूसरे शब्दो में जब अगड़ी जातियों में साक्षत्कार के चलते भाई भतीजावाद का अतिरिक्त लाभ मिलता है तो संघ का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी ओढ़ लेता है। यही कारण है कि ज्यादातर (न कि सभी) दलित आज भी संघ का विरोध करते है।
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संघ सिर्फ वही पर पनपता है जहाँ मुस्लिम अपराधी अपनी स्थिति मजबूत बना लेते है। और तब संघ/विहिप/बजरंगी वहां पहुँचते है और इस तरह का माहौल खड़ा करते है जिससे हिन्दू वोट हिन्दू होने के आधार पर लामबन्द हो उन्हें वोट करे। लेकिन उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दू हितो की बात कर या उन्हें इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से धमकाकर उनके वोट बीजेपी के खाते में डलवाने का होता है। और जैसे ही बीजेपी पूरी धमक के साथ सत्ता में आती है बीजेपी के नेता सबसे पहला काम विहिप और बजरंग दल की कमर तोड़ने का करते है !!! उदाहरण के लिए, मोदी साहेब और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने सत्ता में आने के बाद बजरंग दल और विहिप का गुजरात से पूरी तरह से सफाया कर दिया !!
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1990 से ही बीजेपी के नेता "टू चाइल्ड पॉलिसी" का विरोध कर रहे है !!! वे संसद के बाहर इस क़ानून का समर्थन करते है, किन्तु इस विषय पर क़ानून बनाने या जनमत संग्रह करवाने का विरोध करते है !!! और इसीलिए, 1990 में जहाँ मुस्लिम जनसँख्या का प्रतिशत सिर्फ 9 था, वह आज बढ़कर 16 हो गया है। इतना ही नहीं, 1998 में सत्ता में आने के तुरंत बाद से ही अटल और आडवाणी ने 1 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने का क़ानून लाने से साफ़ साफ़ मना कर दिया था, (आज इनकी संख्या लगभग 2 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है ) और वे इन्हें खदेड़ने का विरोध 2004 तक यानी कि जब तक सत्ता में रहे तब तक करते रहे। लेकिन जैसे ही ये लोग सत्ता से बाहर हुए वैसे ही इन्होंने फिर से इन्हें खदेड़ने की "बातें" करना शुरू कर दी।
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अपने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी मोदी साहेब ने कहा था कि, 15 मई को सभी बांग्लादेशियों को जाना होगा। ढाई साल निकल चुके है। उन्होंने उन्हें खदेड़ना तो दूर उनके बसने को और भी आसान बनाने के लिए आधार कार्ड में यह क्लॉज़ जोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया की, "मैं घोषणा करता हूँ कि मैं भारतीय नागरिक हूँ" !! इससे अब इसके लिए आधार कार्ड बनवाना आसान हो गया है, और वे कानूनी रूप से अपना आधार कार्ड बनवा रहे है।
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जुल मिलाकर सार यह है कि, बीजेपी के नेता हिन्दुवाद का राग सिर्फ अपने वोट उगाहने के लिए ही अलापते है। लेकिन जब कानूनी एक्शन की बात आती है तो ये लोग खामोश हो जाते है।
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जबकि हम राइट टू रिकॉल पार्टी वाले बतकुट्टी की जगह कानूनी एक्शन में विश्वास रखते है, और इसीलिए हमने "टू चाइल्ड पालिसी", जनमत संग्रह और बांग्लादेशी घुसपैठियों को खदेड़ने के कानूनी ड्राफ्ट दिए है।
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