Pawan Jury BhilwaraRj

विभिन्न वाद, वादियों, विचारको और उनके अनुयायियों के बारे में :
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वाद क्या है ?

विचारो को खूब घोटने से वे वाद की शक्ल ले लेते है।
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कोई भी ऐसा विचार जिसकी मोटी परिभाषा हो किन्तु परिभाषा स्पष्ट न हो, जिसे समझा न जा सके, पर समझा देने का दावा किया जा सके, जिसमे इतने झोल हो कि जिसकी व्याख्या हर व्यक्ति अपने हिसाब और सुविधा से कर सके, जिसमे कोई स्पष्ट प्रक्रिया न दी गयी हो अतः उन्हें लागू न किया जा सके। कुल मिलाकर एक अबूझ पहेली जिसके असली अर्थ को समझने और समझाने में घंटो, महीनो और सालो खपाये जा सके, जिनके नारे लगाए और चिपकाये जा सके, और फिर भी अंत में कुछ भी निर्विवाद रूप से निकल कर न आये तो ऐसा विचार "वाद" या "पंथ" की श्रेणी में लिया जा सकता है।
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पूँजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, गांधीवाद, हिन्दुवाद, दक्षिणपंथी, वामपंथी, उदारवाद, नव उदारवाद, नारीवाद, निरंकुश वाद, मार्क्सवाद, उग्र राष्ट्रवाद (नया), उग्र हिन्दुवाद (नया), उग्र राष्ट्रवादी तानाशाही वाद (बिलकुल नया), आदि कुछ वाद है जिन्हें भारतीय राजनीति में बरसो से जनता द्वारा नारो की शक्ल में और बुद्धिजीवियों द्वारा सिद्धांतो के रूप में घोटा जा रहा है। असल में विचार ही घुटते घुटते वाद जाते है। मार्क्स ने कहा था कि, "धर्म एक अफीम है, जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दल अवाम को गाफिल बनाये रखने में करते है"। लेकिन मेरे विचार में सबसे बड़ी अफीम "वाद" है। और मार्क्स राजनैतिक क्षेत्र का सबसे बड़ा अफीमची था।
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वाद और वादियों की कुछ विडम्बनाएं देखिये :
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कन्हैया कुमार वामपंथी है, सीताराम येचुरी वामपंथी है, पुतिन भी वामपंथी है, स्टॅलिन और माओ भी वामपंथी थे, और महात्मा भगत सिंह जी भी वामपंथी थे। लेकिन महात्मा भगत सिंह के वामपंथ में "राईट टू रिकॉल" प्रक्रियाएं शामिल थी, स्टालिन राईट टू रिकॉल के मौखिक यानि फर्जी समर्थक थे, वामपंथी चीन में निचले स्तर पर कमजोर राइट टू रिकॉल प्रक्रियाए है, जबकि भारत की सभी वामपंथी पार्टियां और नेता राईट टू रिकॉल युक्त प्रक्रियाओ वाले वामपंथ के कट्टर विरोधी है !!! मतलब वामपंथ एक खिचड़ी है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने स्वाद के अनुसार पका सकता है, और यह भी कह सकता है कि मेरी खिचड़ी में ही असली वामपंथ है।
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संघ और बीजेपी दक्षिणपंथी, हिंदूवादी है। लेकिन संघ और बीजेपी दोनों ही उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिन कानूनों की सहायता से 2 करोड़ बांग्लादेशियों को देश खदेड़ा जा सके, राम मंदिर का निर्माण किया जा सके, गौ हत्या में कमी लायी जा सके, बिगड़ते धार्मिक असन्तुलन को ठीक किया जा सके, मंदिरो के प्रशासन को सुधारा जा सके आदि। तो ये सभी हिंदूवादी संगठन इन सभी कानूनों का विरोध करते है किन्तु ये सभी "हिंदूवादी" है !!! और ये सभी ये भी चाहते है कि, पूरे देश के हिन्दू भी इनकी तरह "हिंदूवादी" हो जाए और उन सभी कानूनों का विरोध करे जिससे हिन्दू धर्म मजबूत हो !!!
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बीजेपी व् संघ परिवार स्वदेशी वादी भी है और राष्ट्रवादी भी है। किन्तु इनके स्वदेशी वाद में देश के सभी क्षेत्रो को विदेशी कंपनियों के हवाले किया जाता है। मतलब इनके हिसाब से महात्मा राजिव भाई दीक्षित भी स्वदेशी वादी थे और ये भी स्वदेशी वादी है ! बताइये !!! बल्कि इनके हिसाब से तो असली स्वदेशी और राष्ट्रवादी ये ही है !!
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नेहरू समाजवादी थे, लोहिया भी समाजवादी थे, मुलायम भी समाजवादी है, और अमर सिंह भी पार्ट टाइम समाजवादी है !!! आजम खान भी समाजवादी है। अब इनका समाजवाद क्या है और कैसा है, बताने की जरूरत नहीं है। और असली समाजवाद क्या है, ये शायद किसी को नहीं मालूम पर सबको मालूम भी है। जिसके जो समझ आये वो समाजवाद के नाम पर कुछ भी एलान दे सकता है। और वही समाजवाद हो गया। मतलब कुछ भी !! पूरा समाजवाद है।
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और भारतीय राजनीति में सभी लोकतंत्र वादी तो है ही । लेकिन सभी अनिवार्य रूप से लोक यानि जनता को अधिकार देने वाले कानूनों का विरोध करते है। आप किसी भी लोकतंत्र वादी को पूछिये कि, "क्या जनता को अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार होना चाहिए ? वे कहेंगे कि, हाँ अवश्य होना चाहिए। किन्तु फिर आप उनसे पूछिये कि, "क्या जनता के पास अपने प्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार होना चाहिए ? बस इस सवाल के साथ ही सभी लोकतंत्र वादी सुन्न हो जाते है। फिर या तो ये लोग आपको जवाब नहीं देंगे या फिर उल जलूल दर्शन पढ़ाएंगे। लेकिन जनता को अपने प्रतिनिधियों को नौकरी से निकालने के अधिकार का समर्थन कभी नहीं करेंगे। मतलब लोकतंत्र की व्याख्या करने का अधिकार ये अपनी जेब में ही रखना चाहते है, जनता को नहीं देना चाहते !! और इनकी लोकतंत्र की प्रक्रिया में जनता को दंड देने की शक्ति नहीं दी जाती, उन्हें अपने प्रतिनिधियों को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं दिया जाता तथा जनमत संग्रह की प्रक्रियाओ का भी विरोध किया जाता है !!
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और पूंजीवाद ? बीजेपी, कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी तथा संघ परिवार भी, देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को एफडीआई के माध्यम से भारत सौंप देना चाहते है। किन्तु उनके अनुसार वे पूंजीवादी नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि उनके हिसाब से बहुराष्ट्रीय कंपनियो के मालिक पूंजीपति नहीं है, बल्कि वे बेहद गरीब लोग है। अच्छा तमाशा है।
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कुल मिलाकर सार यह है कि, प्रक्रिया विहीन वाद धोखा है, छल-प्रपंच है, चालाकी है, चापलूसी है, जनता की आँखों में धूल झोंककर अपनी राजनीती चमकाने का पैंतरा है , समस्याओ को बढ़ाने की तरकीब है, ये एक प्रकार की तुकबंदी भी है, दर्शन तो खैर यह है ही, बौद्धिक आतंक भी है, ये एक धुंआ है, तमाशा है, और भी सब प्रकार से यह एक कबाड़ है, मलबा है, और इसका नारा लगाने वाले इस धंधे के कबाड़ी है।
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तो आइंदा से यदि आपका साबका किसी वाद के अनुयायी से हो तो सबसे पहले उनसे पूछिये कि, आपके वाद की "प्रक्रिया" क्या है ? मतलब उनसे पूछे कि आप हमें वह कागज़ या लिखित विवरण दिखाइए जिन्हें गेजेट में प्रकाशित करने से आपका वाद देश में लागू हो जाएगा। और यदि आपको अपने वाद को देश में लागू ही नहीं करना है तो फिर नाहक जनता को क्यों परेशान करके रखा है !!
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उदाहरण के लिए, यदि वे कहे कि हम हिंदूवादी है, या उग्र हिंदूवादी है, या राष्ट्रवादी है तो उनसे इस वाद का लिखित ड्राफ्ट यानि स्पष्ट खाका देने को कहे। उनसे पूछे कि देश को क़ानून चलाते है, तथा देश में वही लागू होता है जो गेजेट में प्रकाशित किया जाता है, तो आपके राष्ट्रवाद या हिन्दुवाद के एजेंडे को लागू करने के लिए आपने क्या प्रक्रिया दी है, जिसे गेजेट में प्रकाशित करके अमुक वाद को देश में लागू किया जा सके ? सिर्फ यही एक मात्र तरीका है जिससे आप बिना अपना समय नष्ट किये यह जान सकते है कि, आखिर ये लोग चाह क्या रहे है।
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और तब आप देखेंगे कि इस विचारको और वादियो में से ज्यादातर से भी ज्यादा के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है, जिसे स्पष्ट रूप से समझा जा सके और उन्हें लागू किया जा सके। होना तो यह चाहिए कि, किसी विचार के परिपक्व होने या विचार प्रक्रिया के पूर्ण होने पर अमुक विचार का निचोड़ "प्रक्रिया" या "ड्राफ्ट" के रूप में सामने आना चाहिए, लेकिन आप पाएंगे कि दशको और शताब्दियों के बीत जाने पर भी उनके पास सिर्फ एकल शब्दीय नारा और कुछ लाइनों का दर्शन है, जिसकी जुगाली करके वे खुद का टाइम पास और अन्य नागरिको का टाइम बर्बाद कर रहे है।
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