Pawan Jury BhilwaraRj
सवाल : "जब से राइट टू रिकॉल का प्रचार शुरू हुआ है तब से लेकर आज तक 20 से 30 हजार फॉलोवर हुए है शायद। 1 या 2 साल में या 3 साल में 10 हजार की एवरेज आ रही है शायद। आप यह बताये कि, साल में 10 हजार की एवरेज आ रही हो तो 10 साल में 1 लाख फॉलोवर हो पाएंगे। तो इसे पूरे हिंदुस्तान के सामने लाने में 200 साल लग जाएंगे"।
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जवाब : ऐसा नहीं है कि 200 साल में भारत के सभी नागरिको तक ये जानकारी पहुँच ही जायेगी। बीच में कभी भी जीरो भी हो सकता है। जैसे, महात्मा भगत सिंह जी ने 1925 में ही इन कानूनों की मांग कर दी थी। लेकिन कुछ वर्षो में मांग गायब हो गयी। फिर 1977 में जेपी आंदोलन में यह मांग उठी, लेकिन फिर से जीरो हो गयी। राजिव भाई की हत्या के बाद इसके फैलने की गति भी फिर से धीमी हो गयी। अभी फिर से बढ़ने लगी है। फिर से जीरो हो सकती है।
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लेकिन ऐसा भी नहीं है कि, राईट टू रिकॉल कानूनों के समर्थको की संख्या इसी गति से बढ़ेगी। जैसे जैसे कार्यकर्ता बढ़ेंगे इनके समर्थको के बढ़ने की "गति" भी उत्तरोत्तर रूप से बढती जायेगी। उदाहरण के लिए यदि किसी क़ानून के समर्थक 100 व्यक्ति है और इन्हें दस गुना होकर 1000 होने में 2 माह लगते है तो दो माह में कुल वृद्धि 900 की हुयी। किन्तु अगले चरण में चूंकि समर्थको की संख्या 1000 है अत: अगले 2 माह में वृद्धि यदि 5 गुना भी रहती है तो समर्थको की संख्या में वृद्धि 1000*5 = 5000 होगी। इसी तरह से अगले चरण यानि तृतीय चरण में समर्थको को संख्या दो माह में बढ़कर 5000*5 = 25000, और चतुर्थ चरण में यह संख्या बढकर 25000*5 = लगभग 1 लाख हो जायेगी। इस प्रकार समर्थको की संख्या एक निश्चित सीमा तक पहुँचने के बाद इसमें विस्फोटक वृद्धि होगी। इस विस्फोट के लिए हमें जो आधार चाहिए वह सबसे मुश्किल चरण है। और अभी हम उसी चरण पर काम कर रहे है। जितना हम इस चरण को तेजी से पूरा करेंगे उतना ही तेजी से हम अगले चरणों में प्रवेश करेंगे।
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कुल मिलाकर कोई दस वर्ष आंदोलन चल जाता है तो ये धीमा हो सकता है किन्तु जीरो नहीं होगा। इसका कारण यह है कि हम लिखित ड्राफ्ट का प्रचार कर रहे है और दूसरा इंटरनेट युग के कारण इन ड्राफ्ट्स के संगृहीत रहने की संभावनाएं काफी ऊँची है।
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यदि हम देश में 3 लाख कार्यकर्ताओं को यह समझाने में कामयाब हो जाते है कि राईट टू रिकॉल कानूनों को लागू करके भारत को सैन्य, आर्थिक दृष्टी से अमेरिका जितना मजबूत देश बनाया जा सकता है तो सिर्फ 2 से 3 वर्ष में ही ये 3 लाख कार्यकर्ता देश के 60 करोड़ नागरिको तक यह जानकारी पहुंचा सकेंगे। तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम 60 करोड़ नागरिको तक यह जानकारी कैसे पहुंचाएंगे, बल्कि यह सोचना चाहिए कि हम देश के 3 लाख कार्यकर्ताओ तक यह जानकारी कैसे पहुंचा सकते है।
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मान लीजिये अभी राईट टू रिकॉल के यदि 1000 कार्यकर्ता है तो इन्ही 1000 कार्यकर्ताओ पर यह दायित्व है कि वे देश के 3 लाख कार्यकर्ताओ तक यह जानकारी पहुंचाए। कैसे 1000 राईट टू रिकॉल के कार्यकर्ता जल्दी से जल्दी देश के 3 लाख कार्यकर्ताओ तक यह जानकारी पहुंचा सकते है --- इसकी चर्चा राईट टू रिकॉल ग्रुप के कई अन्य स्तंभों में की गयी है।
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सवाल : आपने कहा , "ऐसा क्या किया जाए जिससे ये सब जल्दी से जल्दी हो जाए" ?
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हम साधारण व्यक्तियों का समूह है। हमारे पास संगठन चलाने और प्रचार करने के लिए मंच और संसाधन नहीं है। इसीलिए हम वही कर सकते है जो करना हमारी क्षमता के भीतर है। इसके लिए हम ऑनलाइन और ऑफलाइन गतिविधियाँ संचालित कर सकते है। ऑनलाइन में फेसबुक, वहट्स एप आदि और ऑफलाइन श्रेणी में पर्चे वितरित करना, छोटी सभाएं करना, प्रदर्शन करना, बैनर लगाना आदि करने से हम कार्यकर्ताओं तक अपनी पहुँच बना सकते है।
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यदि हमें तेजी से यह जानकारी नागरिको तक पहुंचानी है तो सबसे बेहतर और तेज रास्ता समाचार पत्रों का इस्तेमाल करना और चुनाव लड़ना है। पेड मिडिया राईट टू रिकॉल कानूनों को कभी सकारात्मक कवरेज नहीं देगा यह बात तय है। अत: हमें बड़े पैमाने पर बड़े अखबारों में बड़े विज्ञापन देने की क्षमता जुटानी होगी। यदि हम ऐसा कर पाए तो 4-5 वर्ष में इन कानूनों की जानकारी लाखों कार्यकर्ताओ और करोडो नागरिको तक पहुँच सकती है। मेरी नजर में "बड़े पैमाने पर बड़े अखबारों में बड़े विज्ञापन देने" के सिवा कोई शोर्ट कट नहीं है। अन्य सभी तरीके घोंघे के रफ़्तार से सरकने वाले है, अत: विज्ञापनों का प्रयोग किये बिना ये जानकरी पहुँचाने में वाकयी कई दशक लग जायेंगे।
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कैसे हम साधारण नागरिक "बड़े पैमाने पर बड़े अखबारों में बड़े विज्ञापन देने की क्षमता" जुटा सकते है इसकी जानकारी अन्य स्तम्भ में दी गयी है।
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