Pawan Jury BhilwaraRj
कैसे पेड भीलवाड़ा भास्कर जैसे समाचार पत्र कार्यकर्ताओ की मेहनत का श्रेय हडप लेते है !
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भीलवाड़ा शहर में सिर्फ वाट्स एप पर ही लगभग 2000 नागरिक राईट टू रिकॉल ग्रुप से सीधे जुड़े हए है, तथा लगभग 5000 नागरिको तक समूह की पहुँच है। फेसबुक समुदाय की संख्या अतिरिक्त है। भीलवाड़ा के ज्यादातर राजनैतिक कार्यकर्ताओ व पत्रकारो आदि भी इन समूहों से जुड़े हुए है और उन तक भी राईट टू रिकॉल ग्रुप की न्यूज फीड जाती है।
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1) 28 अगस्त को राईट टू रिकॉल ग्रुप ने इस विषय को उठाया था कि -- "शहर और राज्य कि सडको पर हर तरफ गायें पसरी हुयी है तथा इस वजह से नागरिको को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। स्तम्भ देखने के लिए यह लिंक देखें -- https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1016187698499466
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2) जब यह विषय भीलवाड़ा शहर में स्थानीय सोशल मिडिया पर चर्चा में आ गया तो, 4 सितम्बर को पेड भास्कर ने इस मुद्दे को भीलवाड़ा भास्कर में उठाया। भास्कर द्वारा प्रकाशित खबर यहाँ देखें --- http://goo.gl/D64MgM
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3) 5 सितंबर को पेड भास्कर ने फिर से यह खबर प्रकाशित की कि --- "गौ वंश की समस्या को सबसे पहले भास्कर ने उठाया था, और भास्कर द्वारा खबर प्रकाशित करने का यह असर हुआ कि, प्रशासन ने अगले दिन ही इस समस्या का समाधान खोजना शुरू कर दिया है"। प्रकाशित खबर यहाँ देखें -- http://www.bhaskar.com/news/RAJ-BHIL-MAT-latest-bhilwara-news-042002-905282-NOR.html
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पहली बात तो यह है कि, यह समस्या पिछले कई महीनो से बनी हुयी है, और ऐसा भी नहीं है कि भीलवाड़ा भास्कर के पत्रकार और सम्पादक परिवहन के लिए सिर्फ वायु मार्ग का ही इस्तेमाल करते है। लेकिन वे इस पर खामोश रहे। क्योंकि इसे उठाने से सभापति का कुप्रबंधन सामने आता था। दूसरी बात यह है कि, यह समस्या सिर्फ किसी शहर के एक कोइन हाउस की मरम्मत से जुडी हुयी नहीं है बल्कि राष्ट्रव्यापी है। लेकिन जब राईट टू रिकॉल ग्रुप ने यह मुद्दा उठाया और 7 दिनों में यह मुद्दा स्थानीय चर्चा में आ गया तो पेड भीलवाड़ा भास्कर ने मजबूरी में पहले इसे उठाया, और फिर अगले ही दिन प्रशासन को क्लीन चिट भी दे दी और खुद ही खुद की पीठ भी थपथपा ली !!!
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भास्कर खुश है कि, उसने इस समस्या को उठाया। भास्कर और प्रशासन इस बात से और भी ज्यादा खुश है कि, 4 तारीख को समस्या सामने आई और हमने 5 को इसे निपटा दिया। दोनों ही खुश है। सिर्फ जनता और गायें दुखी है, क्योंकि सड़के अब भी गायों से पटी पड़ी है। क्योंकि पेड भास्कर ने इस समस्या का समाधान नही सुझाया है। उनके हिसाब से समाधान यह है कि --- "प्रशासन नयी गौ शालाएं ढूंढ रहा है" !!!
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जबकि राईट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित समाधान यह है कि, राईट टू रिकॉल सभापति, राईट टू रिकॉल पशु कल्याण अधिकारी और ज्यूरी सिस्टम क़ानूनो को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। इस तरह पूरे राज्य व देश में क़ानून लागू होने से इस राष्ट्र व्यापी समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा।
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