Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

Pawan Jury BhilwaraRj:

1) भारत में ज्यूरी प्रथा को नानावटी मामले के कारण समाप्त नही किया गया था --- १९५९ में जवाहर लाल ग़ाज़ी ने इसे इसीलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि वे धनिक भू स्वामियों के हितो को संरक्षित करना चाहते थे । असल में, उस दौरान पूरे देश में ज्यूरी मंडलो का झुकाव भूमिहीनो की और था, अतः भू स्वामियों की रक्षा करने के लिए ज्यूरी प्रथा को निरसित किया जाना ही एक मात्र विकल्प रह गया था !!! और इसीलिए जवाहर लाल ग़ाज़ी ने ज्यूरी प्रथा को समाप्त करने के लिए नानावटी मामले को बहाना बनाया ।
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(2) जब ज्यूरी सदस्यों ने नानावटी को निर्दोष क़रार दिया तो वे मीडिया के प्रभाव में नही थे । ज्यूरी मंडल ने नानावटी को इसीलिए रिहा करने का फ़ैसला किया, क्योंकि उनके पास सज़ा तय करने का कोई विकल्प नही था । उनके पास सिर्फ़ दो विकल्प थे -- १) या तो वे नानावटी को निर्दोष क़रार दे सकते थे अथवा २) उम्रक़ैद या फाँसी दे सकते थे । और उन्होंने नानावटी को "निर्दोष" ठहराया । क्योंकि ज्यूरी सदस्य आहूजा को "पितृत्व धोखाधड़ी" का दोषी जबकि केप्टन नानावटी को "पेतृत्व जालसाज़ी" या "पितृत्व अनिश्चितता" का शिकार मानते थे ।
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(3) हालिया रिलीज़ फ़िल्म "रुस्तम" इस बारे में दर्शकों को ग़लत संदेश दे रही है । इस फ़िल्म में फिर से इस भ्रम को पुष्ट करने की कोशिश की गयी है कि "भारत में ज्यूरी प्रथा का अंत नानावटी मामले के कारण किया गया"। जबकि सच्चाई यह है कि, जवाहर लाल ने ज्यूरी प्रथा का अंत सिर्फ़ इसीलिए किया था, क्योंकि वे धनिक भू संग्राहकर्ताओ को लाभ पहुँचाना चाहते थे ।
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यह स्तम्भ दो भिन्न बिंदुओं का स्पष्टिकरण करता है । १) नानावटी मामला २) क्यों जवाहर लाल ने भारत में ज्यूरी प्रथा का अंत कर दिया ।
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(1) ज्यूरी सिस्टम को भारत में इसीलिए निरसित कर दिया गया क्योंकि तब देश भर में ज्यूरी मंडल भू माफ़ियाओ के ख़िलाफ़ फ़ैसले दे रहे थे । और ऐसा करने के लिए नानावटी मामले को बहाने की तरह इस्तेमाल किया गया ।
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जवाहर लाल ने १९५९ में ज्यूरी सिस्टम को समाप्त करने के सम्बंध में एक राजपत्र अधिसूचना जारी की थी, जो कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो द्वारा हस्ताक्षरित होने पर पूरे भारतवर्ष पर लागू हुयी ।
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जवाहर लाल का कहना था कि इस अधिसूचना को लाए जाने का कारण नानावटी मामला था !!! क्या जवाहर लाल हमेशा सच ही बोलते थे ? और क्या उन्होंने अपने कृत्यों और फ़ैसलों के पीछे मौजूद कारणों के बारे में हमेशा सही और सच्चे बयान दिए ? और यदि जवाहर लाल का मानना था कि नानावटी को रिहा करके जूरी ने ग़लत किया था तो बाद में ख़ुद जवाहर लाल ने अपनी बहन और महाराष्ट्र की गवर्नर विजय लक्ष्मी पंडित को नानावटी को माफ़ी देकर रिहा करने के आदेश क्यों दिए ?
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हम सभी जानते है कि, जवाहर लाल ग़ाज़ी एक झूठा व्यक्ति था और उन्होंने कई अवसरों पर झूठ बोलकर भारत के नागरिकों को गुमराह किया था । इसीलिए इस बात की पूरे से भी ज़्यादा सम्भावना थी कि जवाहर लाल इस मामले पर भी झूठ ही बोल रहे थे --- और ज्यूरी सिस्टम को ख़त्म करने के पीछे उनकी मंशा कुछ और ही थी । लेकिन नागरिकों को बुत्ता देने के लिए उन्होंने नानावटी मामले का इस्तेमाल किया ।
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तो ज्यूरी सिस्टम ख़त्म करने के पीछे जवाहर लाल की मंशा क्या थी, इसका सबसे बड़ा साक्ष्य ख़ुद इस बारे में दिया गया उनका बयान है । और हम सभी इस बात से वाक़िफ़ है कि जवाहर लाल ने विभिन्न विषयों को लेकर सैंकड़ों बार झूठ बोला था । हालाँकि कोई व्यक्ति चाहे तो बेशक यह दावा कर सकता है कि --- हाँ, जवाहर लाल आदतन मिथ्यावादी थे लेकिन इस विषय में उन्होंने जो भी कहा वह पूरी तरह सत्य था कि, "उन्होंने ज्यूरी सिस्टम को नानावटी मामले के कारण ही रद्द किया था" । अतः इस विषय में वे सच ही बोल रहे थे । लेकिन कई लोगों का मानना है कि तब जवाहर लाल झूठ बोल रहे थे, और ज्यूरी सिस्टम ख़त्म करने के पीछे उनकी मंशा कुछ और ही थी । ऐसे क्या कारण रहे होंगे ?
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कुछ आँकड़ो पर नज़र दौड़ाइए । आज भारत की १८००० अदालतो में लगभग ३ करोड़ मुक़दमे लम्बित है । सैंकड़ों ट्रिब्यूनल्स को शामिल करते हुए आज प्रति वर्ष लगभग ५-१० लाख नए मुक़दमे दर्ज हो रहे है । और १९५९ में लगभग १ लाख मुक़दमे प्रति वर्ष दर्ज हो रहे थे ।
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तो १९५९ में हमारे समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि, "लम्बित इन लाखों और नए दर्ज होने वाले हज़ारों मुक़दमों को निपटाने के लिए हमें ज्यूरी सिस्टम का आश्रय लेना चाहिए या जज सिस्टम का " ?
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मेरे विचार में, इस प्रश्न का उत्तर नानावटी मामले के सिर्फ़ एक मुक़दमे में आने वाले फ़ैसले के आधार पर नही किया जा सकता ।
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यह पूरा बयान ही शुरू से लेकर आख़िर तक ग़लत है कि, "भारत की अदालतों में लम्बित लाखों मुक़दमों का फ़ैसला जजों द्वारा किया जाए या ज्यूरी द्वारा, इसका निर्धारण सिर्फ़ नानावटी मामले में दिए गए फ़ैसले के आधार पर किया गया" । सामान्य समझ और स्वस्थ मस्तिष्क वाला कोई भी व्यक्ति यही कहेगा कि, सिर्फ़ एक मामले में दिए गए फ़ैसले के आधार पर यह तय नही किया जा सकता कि लाखों मुक़दमों की सुनवाई जजों द्वारा की जानी चाहिए या ज्यूरी मंडल द्वारा । लेकिन जवाहर लाल की "बौद्धिक चालाकी" का स्तर काफ़ी ऊँचा और "गणितीय बौद्धिकता" का स्तर काफ़ी नीचा था । अतः जवाहर लाल बौद्धिक रूप से चालाक तो थे किंतु अपनी फ़ितरत के चलते इस विषय के गणितीय विश्लेषण को समझने में नाकाम रहे । लेकिन उनकी कमज़ोर गणितीय क्षमता को स्वीकारने के बावजूद इस बात को गले उतारना मुश्किल है कि जवाहर लाल यह समझने में नाकाम रहे कि, सिर्फ़ नानावटी जैसे सिर्फ़ एक मुक़दमे में दिए गए फ़ैसले के आधार पर लाखों मुक़दमों के निस्तारण की प्रक्रिया का फ़ैसला किया जा सकता है ।
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तो, यदि नानावटी मामला भारत में ज्यूरी सिस्टम को ख़त्म करने का असली कारण नही था तब किन वजहों के चलते जवाहर लाल ने इसे निरस्त कर दिया ?
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वजह "भूमि सुधार" थे । १९५०-१९८० के दौर में और आज भी, राजनीति का केंद्रिय मुद्दा भूमि सुधार रहे है ।
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१९५० में लगभग ८५ से ९० प्रतिशत नागरिक गाँवों में निवास करते थे । यहाँ गाँव से आशय उन गाँवों से है जहाँ बिजली नही थी, सड़कें नही थी, पानी की लाइनें नही थी और चिकित्सा आदि सुविधाएँ भी नही थी । उस दौर में पंजाब, हरियाणा, केरल और गुजरात को छोड़कर शेष भारत की ९०% भूमि पर ३% लोगों का आधिपत्य था ।
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यूपी, बिहार जैसे राज्यों में मुट्ठी भर धनिक भू स्वामियों के पास मीलों की मीलों ज़मीन थी और भूमिहीन वास्तविक अर्थों में ग़रीब थे --- सच्चे अर्थों में ग़रीब --- भूखों मरते ग़रीब । ऐसी ग़रीबी जो अब भारत में कहीं नही पायी जाती ।
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उस समय भू स्वामी भूमिहीन श्रमिको को श्रम के रूप में कौड़िया देते थे और इसके अलावा उनके साथ मारपीट करना, बंधक बनाकर रखना व उनका उत्पीडन करना अलिखित नियम थे। कई भू संग्रहकर्ता खुद मुख्तार थे। वे खुद की अदालते चलाते थे और उनके पास स्वयं का पुलिस बल था।
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तब देश के अन्य कार्यकर्ताओ के साथ साथ जनसंघ, आरएसएस, सीपीएम तथा कोंग्रेस के कार्यकर्ता भी खेतिहरों की गरीबी व शोषण को समाप्त करने और बेलगाम भू स्वामियों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक कानूनों की मांग कर रहे थे। यहाँ तक कि सीपीएम के कुछ मझौले स्तर के कार्यकर्ताओ ने भी भूमि सुधार की मांग शुरू कर दी थी। उनकी मांग थी कि, पूर्व राजाओ व भू स्वामी सामन्तों से जमीन अधिगृहित करके भूमिहीनों को दी जानी चाहिए। लेकिन कोंग्रेस और जनसंघ के सभी शीर्ष नेता और सीपीएम के ज्यादातर शीर्ष नेता इन मांगो का विरोध कर रहे थे। लेकिन ये मांगे पूरे देश में लोकप्रिय हो चुकी थी।
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सार रूप में --- यह सिद्धांत कि, "सरकार भू संग्रहकर्ताओ की जमीनों का अधिग्रहण करे और इन जमीनों का वितरण भूमिहीनों में किया जाए" --- अर्थात भूमि सुधार --- की मांग पूरे देश और जनसंघ, आरएसएस के कार्यकर्ताओ में लोकप्रिय हो रही थी।
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नतीजे में जवाहर लाल और अन्य सांसदों को तब ऐसा क़ानून गेजेट में प्रकाशित करने के लिए बाध्य होना पड़ा जो कहता था कि, "यदि किसी भू स्वामी के पास १५० एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है तो वह सिर्फ़ १५० एकड़ भूमि ही अपने स्वामित्व में रख सकेगा । शेष भूमि उसे खेतिहरों को देनी होगी" !!
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अपना दावा जताने और इस क़ानून के अनुपालन के लिए भूमिहीनो और ख़ेतिहरो ने अदालतों का आश्रय लेना शुरू कर दिया था । अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भू स्वामी अपने गुर्गों द्वारा भूमिहीनो को पिटवाने और उनका उत्पीड़न करने लगे । लेकिन उन्हें सफलता नही मिली । क्योंकि देश में ज्यूरी सिस्टम होने से ज्यूरी सदस्यों का झुकाव भूमिहीनो व ख़ेतिहरो की और था । जब पूरे देश में ज्यूरी मंडल उत्पीड़न करने वाले अपराधियों को कारावास की सजाएँ देने लगे तो भू स्वामियों के गुण्डों ने भूमिहीनो पर हमले करने से किनारा कर लिया ।
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ऐसी स्थिति में यह निहायत ही ज़रूरी हो गया था कि, देश में ज्यूरी सिस्टम समाप्त किया जाए । ताकि भू स्वामियों के गुर्गे यदि भूमिहीनो को पीटते है तब भी भूमिहीन और खेतिहर श्रमिक अदालतो का आश्रय न ले सके । अस्तु, जवाहर लाल ग़ाज़ी ने भारत में ज्यूरी सिस्टम का अंत करने का फ़ैसला किया ।
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अब सवाल यह है कि, तब के ज़्यादातर सांसदों ने इस कृत्य में जवाहर लाल का साथ क्यों दिया था ? असल में, तब के ज़्यादातर सांसद ख़ुद भू स्वामी थे और वे यह क़तई नही चाहते थे कि, भूमिहीनो का सशक्तिकरण हो । अतः वे भी ज्यूरी सिस्टम के ख़िलाफ़ थे और उन्होंने इस विषय पर जवाहर लाल ग़ाज़ी का समर्थन किया ।
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(2) ज्यूरी सदस्यों ने नानावटी को निर्दोष क्यों ठहराया ?
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(2a) हमें इस बात को समझना ज़रूरी है कि, आज से दशकों पहले "पितृत्व निर्धारण" की प्रक्रिया क्या थी ---
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मेरे विचार में, "पितृत्व निर्धारण की अनिश्चितता" की समस्या को समझे बिना हम नानावटी मामले और ऐसे ही हज़ारों उन मामलों की तह तक नही जा पाएँगे, जिनमें पक्षकार पितृत्व-वारिस के निर्धारण की अनिश्चितता से जूझ रहे थे, तथा क्यों आज के दौर में अनिर्दिष्ट गर्भ स्थापन को उतना जघन्य अपराध नही माना जाता जबकि उस दौर में इसे बेहद जघन्य माना जाता था ।
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आज विज्ञान, प्रोदयोगिकी और दवाइयों ने उन समस्याओं को उन्मूलित कर दिया है जिनसे मानव जाति पिछले १०,००० वर्षों से जूझ रही थी --- पितृत्व अनिश्चितता/धोखाधड़ी, और अवांछित गर्भ धारण !!! आज रक्त और डीएनए जाँच की विधियों ने पितृत्व-वारिस के निर्धारण की समस्या को पूरी तरह से हल कर दिया है । साथ ही गर्भ निरोधक औषधियाँ भी उपलब्ध है जिनके प्रयोग से अनचाहे गर्भ धारण से बचा जा सकता है ।
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आज अभिभावक अपनी पुत्रियों को, भाई अपनी बहनो को, और पति अपनी पत्नियों को अपेक्षाकृत अधिक आज़ादी देते है । और इसका मुख्य कारण कुछ नारी वादियों और समाज शास्त्रियों द्वारा लिखी गयी पुस्तकें और उपदेश नही है । आज स्त्रियों को कम प्रतिबंधो का सामना करना पड़ रहा है, तो इसके दो मुख्य कारण यह है कि --- वैज्ञानिकों और इंजीनियरो ने कठोर मेहनत करके यह सुनिश्चित किया है कि, अ) अनचाहे गर्भ धारण से बचा जा सके, तथा ब) रक्त और डीएनए जाँच से पितृत्व निर्धारण को तय किया जा सके ।
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तब के दौर में, पुरुष और स्त्रियाँ युवतियों पर इसीलिए ज़्यादा प्रतिबंध आरोपित करते थे क्योंकि उन्हें भय था कि --- "क्या होगा यदि युवती विवाह पूर्व शारीरिक संबंध क़ायम कर लेती है, और यदि ऐसे संबंधो की परिणिती अनचाहे गर्भ के रूप में होती है" ? क्योंकि ऐसी स्थिति में पति के पास यह जानने का कोई उपाय नही था कि, गर्भस्थ शिशु का असली पिता वह स्वयं है या कोई और !! और ऐसे हालात में पति को ताउम्र इस संशय में रहना होता था कि, "जिस संतान का वह पालन कर रहा है वह संतान उसकी है या किसी अन्य की" !! और ऐसी घटनाएँ दोषी व्यक्ति को एक प्रकार का विद्रुप आनंद लेने का भी अवसर देती थी । आज जब डीएनए टेस्ट और गर्भ निरोधक दवाइयाँ मौजूद है, इन सब बातों का कोई महत्त्व नही रह गया है । लेकिन मैं पाठकों से अनुरोध करूँगा कि, वे उस परिस्थिति की कल्पना करे जब ७० के दशक में रक्त जाँच के परिणाम प्रभावी नही हुआ करते थे, और डीएनए टेस्ट के बारे में तो सुना तक नही गया था --- यहाँ तक कि डीएनए टेस्ट की तो तब खोज भी नही हो पायी थी !! इस प्रकार कई अर्थों में बलात्कार हत्या से, उत्पीड़न बलात्कार से और पितृत्व जालसाज़ी उत्पीड़न से ज़्यादा जघन्य अपराध था । क्योंकि बहुधा पीड़ित इस तथ्य से अनभिज्ञ रहता था कि उसे पीड़ित किया गया है । निसंदेह, आज के इस दौर में इस तरह के अपराध नही किए जा सकते --- इसके लिए हमें विज्ञान का शुक्रगुज़ार होना चाहिए ।
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उस समय में भी समाज अनचाहे गर्भ या अविवाहित महिला के गर्भ धारण करने को काफ़ी गंभीरता से लेता था । क्योंकि उस समय सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ इतनी सशक्त नही थी और इसी के चलते अवैवाहिक संबंधो से जनित संतानों के हिंसक अपराधी बनने की सम्भावनाएँ काफ़ी ऊँची थी । लेकिन मौजूदा दौर में समाज ऐसा कोई वास्तविक गम्भीर कारण नही देखता जिससे परिणय विहीन शारीरिक संबंधो को चिंतनीय समझा जाए । क्योंकि आज ऐसे ताल्लुक़ात का नतीजा अनचाहे गर्भ में नही निकलता, अतः ऐसी नाजायज़ संतानों के अपराधी बनने की सम्भावनाएँ लगभग नगण्य है ।
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इसके अलावा, चूँकि तब किसी संतान के पिता का निर्धारण करने का कोई प्रभावी तरीक़ा उपलब्ध नही था अतः समाज की सहानुभूति ऐसे व्यक्ति की और होती थी जो इस प्रकार की "पितृत्व जालसाज़ी" की पीड़ा भोग रहा होता था ।
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और इसीलिए अनिर्दिष्ट गर्भ धारण के ऐसे मामलों को पूरी दुनिया की सभ्यताओं में हत्या से भी बदतर अपराध माना जाता था । और ऐसा इसीलिए नही था क्योंकि स्त्री को पुरुष की सम्पत्ति समझा जाता था । "स्त्री पुरुष की सम्पत्ति है" जैसे कोरे सिद्धांत किसी उपन्यास के शीर्षक को रोचक बनाने के लिए तो उपयुक्त है लेकिन वास्तविक अर्थों में इनका कोई महत्त्व नही । पूरी दुनिया में महिलाएँ और पुरुष परिणय विहीन शारीरिक संबंधो को इसीलिए जघन्य अपराध की श्रेणी में रखते थे क्योंकि तब पितृत्व निर्धारण की कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया मौजूद नही थी और ऐसी किसी प्रक्रिया का अभाव लम्पट व्यक्तियों को "पितृत्व जालसाज़ी" का अवसर मुहैया कराता था । वक़्त के साथ पितृत्व निर्धारण की वैज्ञानिक विधियो का विकास हुआ और सामाजिक दृष्टि से यह अपराध नही रह गया ।
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इसीलिए मैं पाठकों से आग्रह करूँगा कि जब वे नानावटी मामले में ज्यूरी द्वारा दिए गए फ़ैसले की समीक्षा करे तो इस तथ्य को केंद्र में रखें कि, "तब पितृत्व निर्धारण की कोई प्रक्रिया मौजूद नही थी"। हो सकता है कि आज आप पाठकों में से कुछ पाठक पितृत्व अनिश्चितता को जघन्य अपराध की श्रेणी में रखते हो या न भी रखते हो, लेकिन इतना तय है कि उस दौर में भारत ही नही बल्कि पश्चिमी देशों के भी ९०% नागरिक पितृत्व जालसाज़ी को जघन्य अपराध की श्रेणी में रखते थे ।
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2b) जब दूसरे चरण का पीड़ित पहले चरण में जघन्य अपराध का दोषी हो, तथा दूसरे चरण का अपराधी पहले चरण में पीड़ित रहा हो !!!
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यदि आप से पूछा जाता है कि, "आप एक हत्यारे को क्या सज़ा देना पसंद करेंगे" ? तो शायद आपका जवाब होगा कि, "१४ वर्ष या २० वर्ष या आजीवन कारावास, या फिर मृत्युदंड" ।
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ठीक है । अब कृपया निम्नलिखित प्रश्नो के जवाब दीजिए :
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(१) मान लीजिए कि, एक ६० वर्षीय वरिष्ठ नागरिक अपनी ज़िंदग्गी भर की जमा पूँजी ख़र्च करके एक करोड़ रुपए में २ फ़्लैट ख़रीदता है ---
मान लीजिये अमुक व्यक्ति की मंशा एक फ़्लैट को किराए पर देने की ओर एक में रहने की है ।
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(२) वह यह दोनो फ़्लैटस एक बिल्डर B से ख़रीदता है ।
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(३) बाद में , क्रेता X को यह जानकारी मिलती हे कि बिल्डर ने यह दोनो फ़्लैट पहले से ही किसी अन्य व्यक्ति को बेच रखे है । और इस प्रकार B ने उसके साथ छल किया, जिसके परिणामस्वरूप X को अपनी ज़िंदगी भर की जमा पूँजी खोनी पड़ी ।
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(४) X एक बंदूक़ लेता हे ओर B से अपना पैसा लौटने का आग्रह करता है । B पैसा लौटाने से इंकार कर देता है । X B की तरफ़ बंदूक़ तान देता है, और आपसी झगड़े के दौरान X B को गोली मार देता है ।
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(५) मान लीजिए बाद में जाँच के दौरान मालूम होता है कि B एक आदतन अपराधी था तथा B ने इसी तरह से कई लोगों के साथ छल किया था । साथ ही B के पास भविष्य में भी लोगों को इसी तरह ठगने की योजना थी ।
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इस मामले में X अपराधी है । लेकिन यह दूसरा चरण है । पहले चरण में बिल्डर B एक अपराधी था । ओर अपराधी ही नही बल्कि आदतन अपराधी था । साथ ही B की मंशा भविष्य में भी लोगों के साथ छल करने की थी । इस परिस्थिति के मद्देनज़र , X ने B पर गोली चला कर कई सम्भावित पीड़ितों को B के हाथो पीड़ित होने से बचा लिया था ।
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यह बात भी स्पष्ट है कि, यदि X के साथ छल नही किया जाता तो वह किसी भी स्थिति में B की हत्या नही करता । इसके अलावा X ने भूतकाल में भी किसी प्रकार का कोई अपराध नही किया था ।
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तो यह मामला इस तरह से है जहाँ, "दूसरे चरण में जो व्यक्ति अपराधी है वह व्यक्ति पहले चरण में पीड़ित रहा था, तथा दूसरे चरण का पीड़ित पहले चरण में अपराधी ही नही बल्कि आदतन अपराधी था" ।
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अब मान लीजिए कि हम १०,००० नागरिकों का रेंडमली चयन करते है और उनसे पूछते है कि, "B की हत्या के जुर्म में आप X को क्या दंड देने की अनुशंसा करेंगे" ? --- (a) ज़ीरो (b) ३ वर्ष का कारावास (c) १४ वर्ष का कारावास (d) २० वर्ष का कारावास (e) मृत्युदंड" ।
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मैं नही कह सकता कि १० हज़ार व्यक्तियों में से कौन क्या फ़ैसला देगा । लेकिन यदि मैं ज्यूरी मंडल में रहा तो मैं (a) व (b) में से किसी एक विकल्प को चुनूँगा । असल में ज़्यादातर सम्भावना है कि मैं (a) को ही चुनूँगा क्योंकि मेरे विचार में, "X ने B की हत्या करके भविष्य में कई नागरिकों को B के हाथो पीड़ित होने से बचा लिया था" ।
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दूसरे शब्दों में, यह देखने में आता है कि, जब दूसरे चरण का अपराधी यदि पहले चरण में पीड़ित रहा हो तो प्रकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत दोषी को अपराध के लिए कठोर दंड नही दिया जाता, बल्कि ऐसे आरोपी को "तय दंड में कुछ राहत दी जाती है"।
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और जब यह मालूम होता है कि, दूसरे चरण का पीड़ित पहले चरण में आदतन अपराधी रहा है तथा कई लोगों को ठग चुका है तो उसके प्रति नागरिकों की सहानुभूति और भी कम हो जाती है । और इस बात की भी सम्भावना रहती है कि, वे दोषी का शुक्रिया करने के लिए उसकी सज़ा माफ़ कर दे, क्योंकि ऐसा करके उसने कई सम्भावित पीड़ितों को पीड़ित होने से बचा लिया था ।
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और आज के ६० साल पहले चूँकि पिता के निर्धारण की कोई प्रक्रिया मौजूद नही थी अतः पितृत्व जालसाज़ी को ठगी की तुलना में बहुत ही गम्भीर अपराध माना जाता था ।
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ऐसी घटनाओं में दंड में छूट दिए जाने की प्रवृति ही अपराधियों पर अंकुश का काम करती है । क्योंकि यदि प्रत्येक अपराधी यह कहेगा कि, "आप कोई भी अपराध कर सकते है, और आपको दंड तभी भुगतना होगा जबकि अपराध सिद्ध हो जाता है । और चूँकि सामाजिक दायरे के अंतर्गत दंडित किए जाने का कोई ख़तरा नही है, अतः यदि आप इस तरह से अपराध करते है कि उसे भौतिक रूप से सिद्ध नही किया जा सके, तो आप रिहा हो जाएँगे", तो अपराध दर नाटकीय रूप से बढ़ जाएँगी । क्योंकि कई दफ़ा नागरिक यह चाहते है कि अपराधियों को कोर्ट के इतर भी सामाजिक/ग़ैर सरकारी बल द्वारा क़ाबू में रखा जाए । दूसरे शब्दों में, दूसरे चरण के दोषी को सज़ा में छूट देना एक तरह से अन्य सम्भावित पीड़ितों की रक्षा के एवज़ में आरोपी को शुक्रिया करने का एक तरीक़ा है ।
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तो मैं पाठकों से अनुरोध करूँगा कि, वे इस तथ्य को ध्यान में रखे कि, पूरी दुनिया की सभ्यताओं में नागरिको में यह प्रवृति पायी जाती है कि, "जब दूसरे चरण का अपराधी पहले चरण में पीड़ित और दूसरे चरण का पीड़ित पहले चरण में आदतन अपराधी रहा हो तो सामान्य रूप से सभ्य नागरिकों का झुकाव दंड में छूट दिए जाने की और हो जाता है" ।
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(2c) रिहाई या ३ साल अथवा उम्र क़ैद या मृत्युदंड ?
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जब ६० साल पहले ज्यूरी सदस्यों के सामने यह मामला आया तो उन्होंने इसे नीचे दिए गए नज़रिए से देखा :
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(2c.1) केप्टन नानावटी एक आदतन अपराधी नही था ।
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(2c.2) चूँकि उस दौर में वैश्यावृत्ति क़ानूनी रूप वैध थी अतः आहूजा के पास अपनी यौन इच्छा की पूर्ति के लिए वेश्याएँ उपलब्ध थी । लेकिन इसके बावजूद आहूजा ने परिणय विहीन अनैतिक सम्बन्ध बनाने का फ़ैसला किया । आहूजा इस तथ्य से अच्छी तरह से वाक़िफ़ था कि उसके कृत्य की परिणिती एक अनचाहे गर्भ के रूप में हो सकती है, तथा नतीजे में नानावटी और बच्चे को बेहद गम्भीर वेदना से गुज़रना पड़ सकता है । दूसरे शब्दों में आहूजा एक बेहद शातिर अपराधी था ।
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(2c.3) आहूजा पहले भी कई महिलाओं के साथ इस प्रकार के अनैतिक नाजायज़ संबंधो में लिप्त रहा था तथा उसने सोच समझकर निरन्तर ऐसा करना जारी रखा ।
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(2c.4) इसीलिए, नानावटी किसी भी दृष्टिकोण से उम्रक़ैद या मृत्युदंड का भागी नही था । हद से हद नानावटी को ३ से ४ वर्ष क़ैद की सज़ा दी जा सकती थी ।
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(2d) ज्यूरी सदस्यों के पास सिर्फ़ दो विकल्प थे --- निर्दोष या दोषी । यदि ज्यूरी सदस्य नानावटी को दोषी क़रार देते तो सज़ा तय करने का अधिकार जज के पास होता । ऐसी स्थिति में जज या तो नानावटी को उम्र क़ैद देता या मृत्यु दंड ।
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नानावटी मुक़दमे के दौरान ज्यूरी सदस्यों के पास इस तरह का विकल्प नही था कि वे "सज़ा की सीमा" तय कर सके । वे सिर्फ़ "दोषी" या "निर्दोष" ही कह सकते थे । और यदि वे नानावटी को दोषी क़रार देते तो हत्या के जुर्म का दोषी होने के कारण जज के पास सज़ा देने के दो विकल्प थे --- उम्र क़ैद या मृत्युदंड ।
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ज्यूरी सदस्यों को यह विकल्प नही दिया गया था कि वे नानावटी को ३ या ५ वर्ष की सज़ा दे सके ।
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इस प्रकार ज्यूरी के पास सिर्फ़ दो रास्ते बचे थे --- (a) या तो वे नानावटी को रिहा कर दें, या (b) वे जज को उम्र क़ैद या मृत्युदंड का फ़ैसला करने दें ।
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और उन दशाओं में जबकि पहले चरण में आहूजा अपराधी और नानावटी पीड़ित था ज्यूरी सदस्यों के लिए यह बेहद मुश्किल था कि वे नानावटी को उम्र क़ैद या मृत्युदंड की सज़ा सुना दें ।
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कुल मिलाकर ज्यूरी सदय नानावटी को "उम्र क़ैद या मृत्युदंड" की सज़ा देने को तैयार नही थे । अतः उनके पास सिर्फ़ एक रास्ता बचा था --- कि वे नानावटी को "निर्दोष" क़रार दें ।
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दूसरे शब्दों में ज्यूरी सदस्यों ने दिए गए दो विकल्पों में से सबसे कम बुरे विकल्प को चुना । यदि उनके पास नानावटी को ३ वर्ष की सज़ा देने का विकल्प होता तो शायद वे इसी विकल्प को चुनते ।
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(2e) मेरा बिन्दु यह है कि, यदि ज्यूरी मंडल के पास ३ वर्ष की क़ैद देने का विकल्प होता तो शायद वे इसी विकल्प को चुनते, लेकिन उन्हें ऐसा कोई विकल्प नही दिया गया था । उनके पास दो ही विकल्प थे -- (a) रिहाई, अथवा (b) उम्रक़ैद या मृत्युदंड । और उस दौर में पितृत्व निर्धारण की कोई प्रक्रिया मौजूद न होने से वे पितृत्व जालसाज़ी को एक जघन्य अपराध मानते थे । अतः ज्यूरी सदस्यों ने विकल्प (b) को सिरे से ख़ारिज कर दिया । और विकल्प (b) को नकार दिए जाने के बाद उनके पास विकल्प के तौर पर सिर्फ़ (a) ही शेष रह गया था ।
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मौजूदा दौर में ज्यूरी सदस्यों द्वारा दिए गए फ़ैसले की समीक्षा करना आसान नही है । क्योंकि विज्ञान ने आज "पितृत्व निर्धारण" और "अनचाहे गर्भ" की समस्या को पूरी तरह से सुलझा दिया है । इसीलिए आज के हालात में कोई व्यक्ति ऐसी ग़लत धारणा रख सकता है कि, "नानावटी मामले में ज्यूरी सदस्यों द्वारा दिया गया फ़ैसला तार्किक न होकर भावनाओं में बहकर दिया गया था" । लेकिन मेरे विचार में ज्यूरी सदस्यों ने अपनी सूझ बूझ का बहुत अच्छे ढंग से इस्तेमाल किया और दिए गए दो विकल्पों में से सबसे कम बुरे विकल्प को चुना ।
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(3) फ़ीचर फ़िल्म "रुस्तम" ग़लत संदेश दे रही है ।
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वैसे, क्या बॉलीवुड की कोई फ़िल्म सही संदेश देती है ? फ़िल्म आख़िर फ़िल्म है --- इसे सही ग़लत होने से कोई सरोकार नही ।
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लेकिन रुस्तम फ़िल्म भी इसी भ्रम को पुष्ट कर रही है --- कि "जवाहर लाल ने नानावटी मामले के कारण ही ज्यूरी सिस्टम को निरस्त कर दिया था" । जबकि सच्चाई यह है कि भारत में ज्यूरी सिस्टम को ख़त्म करने के लिए नानावटी मामले को एक बहाने की तरह इस्तेमाल किया गया था । कोई भी सामान्य समझ का व्यक्ति यह बता देगा कि किसी एक मामले के आधार पर लाखों मुक़दमों का फ़ैसला नही किया जा सकता । असल में, तब पूरे देश में ज्यूरी मंडल भूमिहीनो के पक्ष में फ़ैसले दे रहे थे और जवाहर लाल ने ज्यूरी सिस्टम को इसीलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि वे धनिक भू संग्रहकर्ताओ के हितो की रक्षा करना चाहते थे ।
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ज्यूरी सिस्टम के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया राइट टू रिकॉल पार्टी के घोषणा पत्र के अध्याय २१ तथा २२ का अध्ययन करे ।
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अंग्रेजी संस्करण --- https://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152114637883103/

हिंदी संस्करण --- https://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152114645373103/
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