Pawan Jury BhilwaraRj

"भ्रष्ट" नेताओं का दौर बीत चुका है ; हम ऐसे युग में प्रवेश कर गए है, जिसमे हमारे नेता या तो "प्रायोजित" है या फिर "कठपुतलियाँ" !!! समाधान के लिए अंतिम पैराग्राफ देखें।
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अंततोगत्वा हम "भ्रष्ट" नेताओं से निजात पा रहे है। अब ज्यादातर नेता उतने भ्रष्ट नहीं है। वे या तो "प्रायोजित" है या फिर "कठपुतलियाँ"।
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पुराने दौर में नेताओं का कार्यकर्ताओ और/या जनता में और कार्यकर्ताओ का जनता में आधार मजबूत हुआ करता था। ये नेता अपने बूते चुनाव जीत कर आते थे, तथा अन्य नेताओं को भी चुनाव जीतने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। और चुन लिए जाने के बाद ये निर्वाचित नेता कारोबारियों और व्यवसायियों के हित में कानून बनाने और उनके काम निकलवाने के लिए उनसे घूस के रूप में नकदी लेते थे।
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लेकिन अब इस चलन में तेजी से बदलाव आ रहा है।
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मौजूदा दौर के "नेताओं" का कार्यकर्ताओ और जनता में आधार बेहद कमजोर हो चुका है। वे जनाधार के लिए पेड मीडिया पर बुरी तरह से निर्भर है। लेकिन नेताओं के पास मीडिया कर्मियों को चुकाने के लिए पैसा नहीं है। पेड मीडिया पूरी तरह से देशी/विदेशी धनिको पर निर्भर है, अत: मीडिया के ये प्रायोजक किसी नेता को उठाने या गिराने के लिए पैसा चुकाते है। बदले में मीडिया जनित ये नेता अपने प्रायोजकों के प्रति वफादार बने रहते है। इस तरह मीडिया के प्रायोजक नेताओं का जनाधार रचते है और बदले में नेता पैसा मांगने की जगह इनके इशारों पर काम करते है।
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जैसे जैसे भारत में पेड़ मीडिया की पहुंच बढ़ती जा रही है, वैसे वैसे इनके द्वारा प्रायोजित नेता ताकतवर होते जा रहे है।
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50 से कम उम्र के नेताओं की पौध में ज्यादातर नेता इसी श्रेणी से आते है। अरविंद गांधी 100% प्रायोजित/कठपुतली है, और साथ ही "ईमानदार" भी है। इसी तरह देश की राष्ट्रीय बहु उर्फ स्मृति जुबिन ईरानी भी इसी वर्ग से आती है। 100% कठपुतली और 100% ईमानदार।
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और मोदी साहेब ?
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2001 तक मोदी साहेब का संघ के कार्यकर्ताओ में और संघ के कार्यकर्ताओ का जनता में वास्तविक जनाधार था। इस जनाधार की वजह थी -- उनके द्वारा संचालित की जाने वाली सामाजिक सेवाएं और पेड़ मीडिया। वजह जो भी हो यह निर्विवाद है कि खुद के बूते इनका वास्तविक जनाधार मौजूद था। लेकिन जैसे जैसे पेड मीडिया की पहुंच बढ़ने लगी संघ का जनाधार तुलनात्मक रूप से कमजोर होने लगा। और इस तरह मोदी साहेब टिके रहने के लिए प्रायोजकों पर निर्भर होते चले गए। पेड मीडिया के प्रायोजकों ने पैड राजदीप पेड देसाई और पेड बुरखा पेड दत्त को आदेश दिया कि वे मोदी को "एंटी-मुस्लिम" होने के लिए लगातार कोसे, ताकि हिन्दूओ में मोदी साहेब की लोकप्रियता बढ़े !!! और साथ ही उन्होंने पेड मीडिया कर्मियों को यह भी आदेश दिया कि वे मोदी साहेब की भयंकर असफलताओं --जैसे कि सरकारी स्कूलों को सुधारने में असफल रहना-- पर चर्चा नहीं करे।
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लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हालात और भी बदतर थे। पूरे देश में संघ और बीजेपी का वास्तविक जनाधार 20% के आसपास ही है। शेष मतदाता या तो अन्य पार्टियों के साथ है या फिर उन्हें पेड मीडिया नियंत्रित करता है।
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तो ऐसी स्थिति में मोदी साहेब के पास पेड मीडिया के प्रायोजकों से समझौता करके उनकी कठपुतलियों को बीजेपी में नेताओ के तौर पर स्वीकार करने के सिवा अन्य कोई रास्ता नहीं बचा था। स्मृति जुबिन ईरानी इसी तरह की कठपुतली है। स्मृति का जनाधार हमेशा से शून्य रहा है। लेकिन धनिक वर्ग से आदेश मिलने के बाद पेड मीडिया ने स्मृति को देश के पटल पर इस ढंग से स्थापित किया जैसे वे भारत की एक बेहद लोकप्रिय वोट खींचू "नेत्री" है। पेड मीडिया के प्रायोजक इसी तर्ज के कई कठपुतली नेताओ को आज बीजेपी में सेट करके बीजेपी में अपनी स्थिति मजबूत बना चुके है।
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इसके अतिरिक्त पेड मीडिया के प्रायोाजक खुद मोदी साहेब को भी अच्छा खासा सकारात्मक कवरेज देते है।
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तो इन हालात में मोदी साहेब वास्तविक नेता है या वे महज एक कठपुतली है ? देखिए, मोदी साहेब को 2014 के आम चुनावों में लगभग 40% वोट प्राप्त हुए। लेकिन इनमें संघ और बीजेपी के कार्यकर्ताओ का हिस्सा सिर्फ 20% ही है। 10% वोट पासवान जैसे अन्य क्षेत्रीय नेताओं के खाते से आते है, और शेष 10% उन्हें सिर्फ पेड मीडिया की वजह से मिले।
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इस तरह से अरविदं गांधी और स्मृति जुबिन ईरानी जैसे 100% प्रायोजित नेताओं के उलट मोदी साहेब का नेतापन 50% सच्चा है, 25% वे अन्य नेताओं पर निर्भर है, और 25% वे कठपुतली है। और जैसे जैसे समय बीत रहा है, वास्तविक मुद्दों जैसे -- बढ़ती खाद्य महंगाई, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी आदि के चलते मोदी साहेब का जनाधार टूट रहा है और मीडिया के प्रायोजकों पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है। और यही चलन रहा तो यह तय है कि 2019 के चुनावों के बाद पीएम की शपथ लेने वाला व्यक्ति 50% कठपुतली होगा, और इससे बदतर स्थिति यह हो सकती है कि पेड मीडिया के प्रायोजक अरविन्द गांधी जैसे 100% कठपुतली नेता को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्थापित कर दे।
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क्योंकि सभी छोटे-मोटे और क्षेत्रीय नेताओं का कार्यकर्ताओ और नागरिकों में आधार होता है अत: तब तक कोई हानि नहीं है, जब तक कि कोई शीर्ष नेता अन्य नेताओं पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए मोदी साहेब पासवान पर निर्भर है, किन्तु पासवान का कार्यकर्ताओ और नागरिकों में वास्तविक जनाधार है। अत: मोदी साहेब की पासवान पर निर्भरता देश को नुकसान नहीं पहुंचाएगी। लेकिन मोदी साहेब अब उन मुट्ठी भर धनिको पर निर्भर हो गए है, जो पेड मीडिया को नियंत्रित करते है, और ये विशिष्ट वर्ग मोदी साहेब को आदेश दे रहा है कि वे उनकी कठपुतली स्मृति जुबिन ईरानी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करे। मोदी साहेब स्मृति ईरानी पर निर्भर नहीं है, लेकिन वे धनिको पर निर्भर है। और इस धनिक वर्ग का कोई जनाधार नहीं है --- उनकी ताकत उस पेड मीडिया से आती है, जिनका काम सिर्फ जनता का मनोरंजन करना है। ऐसी निर्भरता देश के लिए हानिकर ही नहीं है, बल्कि यह खतरनाक भी है।
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लेकिन सिर्फ भारत ही नहीं, यहां तक कि अमेरिका के नेता भी धनिक वर्गो की कठपुतलियां है। तो भारत को अपने नेताओं के कठपुतली बन जाने की चिंता क्यों करनी चाहिए ?
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फिक्र की बात यह है कि अमेरिकी नेता अमेरिका के धनिको की कठपुतलियां है, लेकिन भारत के नेता भारतीय धनिको के नहीं बल्कि अमेरिकी धनिको की कठपुतलियां बन रही है !!! दूसरे शब्दों में, अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको का अपने कठपुतली नेताओं के माध्यम से भारत पर बढ़ता "अदृश्य" प्रभाव हमारे लिए चिंता का विषय है। यदि अमेरिकी-ब्रिटिश भारत पर अपने वायसरॉय के माध्यम से खुले आम शासन कर रहे होते तो भारत के कार्यकर्ताओ के लिए यह बेहद आसान बन जाता है कि वे भारत को विदेशी सत्ता से मुक्त करवा दे। लेकिन जब हालात इस तरह के रच दिए जाए जिसमे देश के कार्यकर्ताओ को भारत के नेता 100% भारतीय, 200% आत्मनिर्भर और 400% बहादुर नजर आने लगे तो कार्यकर्ताओ के लिए नागरिकों को यह समझाना बेहद मुश्किल हो जाता है कि हालात बदतर हुए जा रहे है, और उपाय के लिए इन नेताओं के खिलाफ आवश्यक कदम उठाने की तत्काल जरूरत है। और सबसे विकट स्थिति यह है कि, ये नेता 100% ईमानदार है !! यहां तक कि नकद घूस के रूप में ये 1 रुपया भी नहीं लेते !!
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समाधान ?
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कार्यकर्ताओ को चाहिए कि वे समाधान के लिए देश में राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टैक्स, टीसीपी आदि कानूनों को लागू करवाने का प्रयास करे ताकि भारत की निर्माण इकाइयों में सुधार करके हम अमेरिका-ब्रिटेन के मुकाबले में प्रद्योगिकी जुटा कर "मेड इन इंडिया, मेड बॉय इंडियन" आधुनिक हथियारों का उत्पादन कर सके। इससे क्या बदलाव आएगा ? जब कार्यकर्ता इन कानूनों को लागू करने की मांग करेंगे तो ये सभी कठपुतली नेता अपने प्रायोजकों के आदेशानुसार एक सुर में देशहित के इन कानूनों का विरोध करेंगे। इससे कार्यकर्ताओ और नागरिकों के सामने यह बात खुल जाएगी कि ये खोखले नेता अपने पद पर बने रहने और ख्याति लाभ के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको की बीन पर नाच रहे है।
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दूसरे शब्दों में -- समाधान यह है कि हम देश में उन कानूनों को लागू करने का प्रयास करें जिससे सामरिक-आर्थिक क्षेत्र में भारत की ताकत अमेरिका के समान हो जाए।
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