Pawan Jury BhilwaraRj
क्या भारतीय स्वदेशी कम्पनियां वास्तविक अर्थो में स्वदेशी है ? नहीं। यदि वे विदेशी मशीनों का इस्तेमाल कर रही है , तो वे स्वदेशी नहीं है।
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एक बिस्किट कम्पनी पर विचार कीजिए जो कि पूर्ण रूप से भारतीय स्वामियों के नियंत्रण में है। क्या यह कम्पनी 100% स्वदेशी है ? जरूरी नहीं है कि ऐसा हो। मान लीजिए कि बिस्किट बनाने के लिए यह कम्पनी 100% चीनी मशीनों का इस्तेमाल कर रही है। ऐसी स्थिति में इन मशीनों के आयात से भारत पर विदेशी मुद्रा चुकाने का भार बढ़ेगा। और इन मशीनों के स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस के लिए भी भारत को हर वर्ष डॉलर चुकाने होंगे। ऐसे में यदि अमुक निर्यातक कम्पनी स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस की कीमतें बढ़ा दे स्थिति और भी बुरी हो जाएगी। और इस मामले का सबसे बदतरीन पहलू यह है कि इन उन्नत मशीनों में जिन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल होता है, उन्हें इन मशीनों की निर्माता कम्पनियों द्वारा कभी भी बंद किया जा सकता है !!!
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मैं यहां किसी 'स्वदेशी' कम्पनी या ट्रस्ट का नाम नहीं लूंगा। लेकिन आज कई स्वदेशी कम्पनियां जो स्वदेशी नजर आती है, ऊपर से 100% स्वदेशी है और अंदर से 20%-90% विदेशी है !!!
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उदाहरण के लिए एफएमसीजी यानी तेल-साबुन-बिस्किट के कारोबार को लीजिए। एक समय इस कारोबार में मानव श्रम का खासा इस्तेमाल होता था। आज मजदूरों का प्रतिस्थापन मशीनों ने कर दिया है। अब कुल उत्पादन लागत में मशीनों के मेंटेनेंस का लागत श्रम से भी अधिक है। और कभी कभी मशीनों और उनके अनुरक्षण की लागत मानव श्रम से भी 5-10 गुना अधिक तक पहुंच जाती है !! जल्दी ही भारत में रोबोटिक मशीने चलन में आ जाएगी, जिससे बड़े पैमाने पर मानव श्रम का प्रतिस्थापन होगा।
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तो यहां पर मशीने आयातित होने से हमे डॉलर चुकाने होते है। इतना अवश्य है कि, विदेशी कम्पनियो की तुलना में विदेशी मशीनों पर चलने वाली स्वदेशी कम्पनियां हम पर डॉलर का कम भार डालती है। लेकिन डॉलर का यह भार भी बहुत ज्यादा है।
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समाधान ?
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अल्पकालिक समाधान यह है कि उन स्वदेशी कम्पनियो से वस्तुए खरीदी जाए जो कम्पनिया आयातित मशींनो की जगह मानव श्रम का इस्तेमाल करती हो। लेकिन यह समाधान सिर्फ अल्पकालीन है। हमें मशीनीकरण की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। सिर्फ मानव श्रम की वकालत करना और मशीनीकरण का विरोध करना दीर्घकाल में व्यवहारिक नहीं है।
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लेकिन हमें इस बात को समझना बेहद जरूरी है कि, हमें ऐसी कम्पनियो या ट्रस्ट को इस आधार पर ही स्वदेशी नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उनका पंजीयन भारत में हुआ है और ऐसे ट्रस्ट भारत में बिस्किट बना रहे है !! क्योंकि ऐसा ट्रस्ट या कम्पनी यदि बिस्किट बनाने में जर्मन या चीनी मशीनों का इस्तेमाल कर रही है तो प्रत्येक 10 रू बिस्किट पैकेट की खरीद के बदले भारत सरकार को 1 रुपये के बराबर मूल्य के डॉलर चुकाने होते है, ताकि अमुक ट्रस्ट या कम्पनी मशीनों, स्पेयर पार्ट्स का आयात और इन मशीनों का अनुरक्षण कर सके।
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भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के सभी कार्यकर्ता नागरिकों को समझा रहे है कि, "पतंजलि के तेल और बिस्किट खरीदने से भारत में स्वदेशी क्रांति आ जाएगी" !!! लेकिन मैंने कई लोगों का कहना है कि पतंजलि की ज्यादातर मशीने आयातित है !!! हालांकि आयातित मशीनों के बारे में यह जानकारी गलत भी हो सकती है। अत: मैं इसकी पुष्टि नहीं करता। लेकिन यदि पतञ्जलि की मशीने आयातित है, तो इनके उत्पाद स्वदेशी की परिभाषा के दायरे में नहीं आते।
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समाधान ?
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उपाय यह है कि हमे आधुनिक मशीनों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी। कैसे ? ऐसे कानूनों को लागू करके जिससे भारत की स्थानीय इकाइयों में निर्माण का स्तर सुधरे। कौनसे कानून ? मेरे विचार में राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, टीसीपी, एमआरसीएम, वेल्थ टैक्स आदि कानूनों को लागू करने से भारतीय कारखानों की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और और हम भारत में 100% आधुनिक स्वदेशी मशीनों का उत्पादन करने में सक्षम हो जाएंगे।
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इसीलिए मेरे विचार में राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, टीसीपी, एमआरसीएम, वेल्थ टैक्स आदि कानूनों को लागू करने के सिवा भारत को स्वदेशी भारत बनाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। लेकिन भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ताओ का मानना है कि "इन कानूनो को लागू करके देश भर के स्थानीय कारखानों को सुधारने की कोई जरूरत नहीं है, सिर्फ पतञ्जलि के उत्पादों को खरीदने से ही स्वदेशी भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा !!! मेरे हिसाब से पतंजलि के कार्यकर्ताओ की ये धारणा बिल्कुल गलत है और इनके टोटको से कोई बदलाव नहीं आएगा। अत: सभी कार्यकर्ताओ से मेरा आग्रह है कि उन्हें भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ताओ से किनारा कर लेना चाहिए और राइट टू रिकॉल पार्टी के साथ कार्य करना चाहिए। क्योंकि देश में राईट टू रिकॉल पार्टी ही एक मात्र पार्टी है जिसके कार्यकर्ता देश में राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, टीसीपी, एमआरसीएम, वेल्थ टैक्स आदि कानूनों को लागू करने का प्रयास कर रहे है, ताकि स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण हो सके।
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