Pawan Jury BhilwaraRj

इस आशय की तथ्य पूर्ण ख़बरें व अफवाहे क्यों बनी हुयी है कि, 'भारत आज भी ब्रिटिश शासन के अधीन है' --- क्योंकि जवाहर लाल गाज़ी से लेकर देवी इंदिरा गांधी और मोदी साहेब तक प्रत्येक प्रधानमंत्री ने 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' ( TPA = Transfer of Power Agreement) को सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है। समाधान ? कार्यकर्ताओ को अपने सांसदों पर दबाव बनाना चाहिए कि 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक किया जाए।
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भारत को स्वतंत्रता TPA = 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के तहत दी गई थी, अत: भारत के शासन के लिए TPA प्रभावी दस्तावेज है। बाद में जवाहर लाल गाजी और वल्ल्भ भाई पटेल को मजबूर किया गया कि वे भारत के संविधान में यह प्रावधान जोड़े कि, "भारत के सुप्रीम कोर्ट को 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' की न्यायिक समीक्षा का कोई अधिकार नहीं होगा"। संविधान में यह प्रावधान जोड़ने से वह 'सत्ता हस्तांतरण समझौता' तथा इससे सम्बन्धित सभी विवाद सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार से बाहर हो गये जिसके आधार पर भारत के संविधान की रचना की गयी है !!!
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भारतीय संविधान का अनुच्छेद-363 (1) कहता है कि, "इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु अनुच्छेद 143 के अनुबंधो के अधीन रहते हुए, उच्च्तम न्यायालय या किसी अन्य न्यायलय को किसी ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबन्ध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत के किसी अनुबंध से, जो इस संविधान के प्रारम्भ के पहले किसी देशी राज्य के शासक द्वारा की गई थी, या निष्पादित की गयी थी और जिसमें भारत डोमिनियन की सरकार या उसकी पूर्ववर्ती कोई सरकार एक पक्षकार थी और जो ऐसे प्रारम्भ के पश्चात प्रवर्तन में है, या प्रवर्तन में बनी रही है, उत्पन्न किसी विवाद में या ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबन्ध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत से सम्बन्धित इस संविधान के किसी उपबंध के अधीन प्रोद्भूत किसी अधिकार या उससे उद्भूत किसी दायित्व या बाध्यता के सम्बन्ध में किसी विवाद में अधिकारित नहीं होगी"।
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अनुच्छेद-363 (2) कहता है, (क) "देशी राज्य" से ऐसा राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है जिसे हिज मेजेस्टी से या भारत डोमिनियन की सरकार से इस सरकार के प्रारम्भ होने से पहले ऐसे राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त थी ; और

(ख) "शासक" के अंतर्गत ऐसा राजा, प्रमुख या ऐसा व्यक्ति है जिसे हिज मेजेस्टी से या भारत डोमिनियन की सरकार से इस सरकार के प्रारम्भ होने से पहले ऐसे किसी देशी राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त थी
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तो इस तरह से ऐसे सभी समझौते जो संविधान के प्रवृत होने से पहले भारत डोमिनियन द्वारा किए गए थे, सुप्रीम कोर्ट न तो उन्हें रद्द कर सकता है और न ही ऐसे समझौते सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते है, चाहे ये समझौते भारत के संविधान के खिलाफ ही क्यों न हो !!!
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और भारत के प्रधानमंत्री ने 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है। उन्होंने यह बात स्पष्ट करने से भी मना कर दिया है कि अमुक 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक किया जा सकता है या इसे गोपनीय ही रखा जाएगा। 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के सिर्फ कुछ पृष्ठों को ही अब तक सार्वजनिक किया गया है।
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और जब तक प्रधानमंत्री 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को गोपनीय बनाए रखेंगे, निम्नलिखित तथ्य और अफवाहे जारी रहेगी :
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1) किसी भी भारतीय, और यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री को भी 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को पढ़ने का अधिकार नहीं है।
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2) 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' की सिर्फ एक कॉपी मौजूद है, और इसे सिर्फ भारत के राष्ट्रपति और राष्ट्रपति भवन के मुख्य अधिकारी ही पढ़ सकते है।
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3) जब भी भारत के प्रधानमंत्री कोई आदेश जारी कर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजते है तो राष्टपति भवन के अधिकारी इसकी जांच 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के संदर्भ में करते है। यदि आदेश का कोई हिस्सा 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के प्रावधानों के खिलाफ पड़ता है तो राष्टपति इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर देते है।
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4) इस प्रकार से, भारत में सर्वोच्च शक्ति का स्त्रोत 'सत्ता हस्तांतरण समझौता' है न कि संविधान !! क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसे किसी निर्णय की अवहेलना नहीं कर सकते हो 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के तहत हो। दूसरे शब्दों में भारत का संविधान स्वयं इस बात की स्वीकारोक्ति करता है कि 'सत्ता हस्तांतरण समझौता' संविधान से भी ऊपर है।
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इससे इतर 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के सम्बन्ध में कई व्यक्तियों का कहना है कि :
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1) भारत 99 वर्ष की लीज पर है।
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2) भारत सरकार के पास इंडिया का नाम बदलकर भारत रखने का अधिकार नहीं है।
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3) रिजर्व बैंक गवर्नर की नियुक्ति से पहले भारत सरकार को ब्रिटिश सम्राट/साम्राज्ञी की अनुमति लेना अनिवार्य है !!
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4) यदि किसी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दण्ड दिया गया है और राष्ट्रपति उसे माफी देने से इंकार कर देते है, किन्तु यदि ब्रिटिश सम्राट उसे माफी दे देते है तो भारत के राष्ट्रपति को ऐसे व्यक्ति की माफी को मंजूर करना होगा। ऐसा एक उदाहरण पीटर ब्लीच के मामले में देखने को मिलता है। इस व्यक्ति के माफीनामे को भारत के राष्टपति ने खारिज कर दिया था, लेकिन बाद में उसे माफ कर दिया गया। कई लोगो का कहना है कि पीटर ब्लीच को माफी देने के आदेश ब्रिटिश साम्राज्ञी ने जारी किए थे, और 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' के भारत पर बाध्यकारी होने से राष्ट्रपति को उसे माफी देनी पड़ी !!
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इन सभी प्रकार के तथ्यों/अफवाहों के बने रहने का मूल कारण यह है कि प्रधानमंत्री ने 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है।
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समाधान ?
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समाधान के लिए हमारा प्रस्ताव है कि, कार्यकर्ताओ को अपने सांसद को एसएमएस द्वारा ये आदेश भेजने चाहिए कि 'TPA = सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक किया जाए। यदि ज्यादा से ज्यादा नागरिक ऐसे आदेश अपने सांसदों को भेजेंगे तो सांसदों पर 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक करने का दबाव बनेगा। तब या तो वे इसे सार्वजनिक करेंगे या फिर यह बात सिद्ध हो जाएगी कि सांसदो और प्रधानमंत्री में 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' को सार्वजनिक करने का साहस नहीं है। और इस तरह से 'सत्ता हस्तांतरण समझौते' से सम्बन्धित इन तथ्यों/अफवाहों पर विराम लग जाएगा।
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