Pawan Jury BhilwaraRj
चीन में जज अपने पदों से त्याग पत्र क्यों दे रहे है, जबकि भारत में आप किसी मजिस्ट्रेट या वरिष्ठ जज को कभी इस्तीफा देते नहीं देखेंगे ?
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इकोनॉमिक ऑबजर्वर की रिपोर्ट के अनुसार बीजिंग में 2008-2012 के बीच नियुक्त 2000 से ज्यादा निचली अदालतों के जज अपने पदों को छोड़ चुके है। अनुभवी जज भी अपने पदों से त्यागपत्र दे रहे है और ज्यांग्सू व हेनन प्रोविंस में 40 से कम उम्र के जजों में पद छोड़ने के प्रवृति लगातार बढ़ रही है।
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चीन में लगभग 2 लाख जज है। इनमे से लगभग 1 लाख 80 हजार निचली अदालतों में फैसले देते है तथा शेष उच्च अदालतों में सुनवाई करते है। इस हिसाब से चीन में घूस खाने की प्रतियोगिता भारत की तुलना में 20 गुना ज्यादा है।
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इसके अलावा चीन में सभी जमीनों पर सरकार का स्वामित्व है, अत: भूमि विवाद अदालतों में नहीं आते। कराधान प्रणाली सरल होने से टैक्स के मामले भी अदालतों में बेहद कम आते है। हालांकि अब चीन में जीएसटी के कारण टैक्स विवाद बढ़ रहे है। इस तरह से चीन में जजों के पास भारतीय जजों की तुलना में घूस खाने के अवसर सिकुड़ गए है।
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चीन में न्याय प्रणाली में 'परामर्शदाय व्यवस्था' (एसेसर सिस्टम) है और अब वहाँ पर ज्यूरी प्रक्रियाएं भी लागू हो रही है। जज दो परामर्शदाताओं (एसेसर) की उपस्थिति में सुनवाई करता है और फैसला बहुमत से सुनाया जाता है। ये परामर्शदाता सरकारी कर्मचारी या पूर्व सरकारी कर्मचारी हो सकते है ( अपवाद : वे ऐसे सैनिक भी हो सकते है, जिन्हे सेवानिवृत हुए 10 वर्ष से अधिक हो गया हो )। ये परामर्शदाता किसी राजनैतिक दल के उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति भी हो सकते है। इनका सेवाकाल 1 वर्ष होता है और इन्हे कभी भी दोहराया नहीं जाता। तो इस प्रकार चीन में 1 लाख 80 हजार जजों के अलावा प्रत्येक जज के साथ 2 परामर्शदाता भी है। तो न्यायिक प्रक्रिया में जब हर वर्ष 3 लाख 60 हजार नए परामर्शदाता जुड़ते और हटते रहते है तो बड़े पैमाने पर गठजोड़ बनाना काफी मुश्किल हो जाता है।
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चूंकि परामर्शदाताओं का गठजोड़ वकीलों, धनिको से नहीं होता अत: वे अपेक्षाकृत कम भ्र्ष्ट और भाई भतीजावादी होते है।
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तो जब कोई वकील जिसका गठजोड़ जज के साथ है, यह देखता है कि वह दो परामर्शदाताओं को घूस नहीं दे सकता तो वह जज को घूस देने का विचार भी त्याग देता है !!!
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दूसरे शब्दों में एसेसर सिस्टम ने चीन की अदालतों में भ्र्ष्टाचार के अवसरों को कम किया और इस कारण से जज अपने पदों को छोड़ रहे है।
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जजों की तुलना में चूंकि चीन के पुलिस विभाग, अन्य सरकारी क्षेत्रो और कम्युनिस्ट पार्टी में इस तरह की कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया मौजूद नहीं है अत: इन विभागों में भ्रस्टाचार ऊँचे स्तर पर है और इसीलिए इन संगठनों से स्वैछिक रूप से बाहर होने वाले लोगो का अनुपात काफी कम है।
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तो इन जजों का वेतन क्यों नहीं बढ़ा दिया जाता ? देखिये, इन जजों को वेतन भत्ते आदि इसी श्रेणी के अन्य अफसरों के समान ही मिल रहे है, लेकिन अन्य विभागों के अधिकारियों के पास घूस खाने के अच्छे अवसर मौजूद है। लेकिन इस तथ्य को अधिकृत रूप से नहीं दिखाया जा सकता कि घूस खाने के कम अवसरों के कारण जज अपने पदों को छोड़ रहे है। और अब चीन की सरकार इस दबाव में जजों के वेतन में वृद्धि करने पर विचार कर सकती है।
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कुल मिलाकर सार यह है की, 12 से 1500 ज्यूरी सदस्यों की तो बात ही छोड़ दीजिये, सुनवाई में सिर्फ 2 परामर्शदाताओं की भूमिका भी न्याय प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार में इतनी कमी ला सकती है कि 2000 से 2008 के बीच नियुक्त जजों में से 15% जजों को स्वैच्छिक त्यागपत्र देने के लिए बाध्य कर सके !!!
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तो भारत की अदालतों में व्याप्त भ्रस्टाचार, भाई-भतीजावाद और फैसलों में सुस्ती जैसी समस्याओं के समाधान का तरीका बेहद आसान है -- सभी मौजूदा जजों को नौकरी से निकाला जाए, नए जजों की भर्ती सिर्फ लिखित परीक्षा द्वारा की जाए, उच्च न्यायलयों के शीर्ष जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिकों के पास हो तथा निचली अदालतों के जजों पर ज्यूरी का नियंत्रण रहे। ज्यूरी मंडल का आकार मुकदमे की प्रकृति के अनुसार 12-1500 के बीच रखा जाए।
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और इतने वर्षो तक निरन्तर प्रचार करने के बावजूद भारत में अब तक ज्यूरी सिस्टम क्यों लागू नहीं हो सका है ? क्योंकि हमारे पास पर्याप्त संख्या में कार्यकर्ता नहीं है। और हमारे पास बेहद कम कार्यकर्ता होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस-बीजेपी-आम पार्टी के कार्यकर्ता देश के अन्य कार्यकर्ताओ को बहला फुसलाकर उनकी पार्टियों में जोड़ देते है सोनिया-मोदी-केजरीवाल की अंध भक्ति करने और राईट टू रिकॉल कानूनों का विरोध करने का ज्ञान देते है। पर जैसे जैसे समय बीतेगा इन नेताओ की अंध भक्ति का मुलम्मा उतरता जाएगा और हमें उम्मीद है कि ज्यूरी समर्थक कार्यकर्ताओ की संख्या बढ़ने से भारत में ज्यूरी सिस्टम लागू होने की सम्भावनाएं बढ़ती जायेगी।
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