Pawan Jury BhilwaraRj
हिंदू धर्म में व्याप्त अस्पृश्यता और ऊंच नीच से आजिज आकर डॉ भीम राव अम्बेडकर 1936 में 6 करोड़ दलितों के साथ सिक्ख धर्म अपनाने को तैयार थे, लेकिन मास्टर तारा सिंह और अन्य तात्कालिक सिक्ख नेताओ द्वारा प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया गया। स्थिति आज भी बदली नहीं है, और जातिय भेदभाव आज भी हिंदू धर्म को लगातार कमजोर कर रहा है।
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इस घटना के सन्दर्भ में दो प्रश्न उठते है -- १) क्यों वे हिंदू धर्म का परित्याग करना चाहते थे ? २) क्यों आंबेडकर ने इस्लाम, ईसाई और अन्य धर्मो को दरकिनार करते हुए सिक्ख धर्म को चुना था ?
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इन प्रश्नों का उत्तर किसी धर्म के अच्छे या बुरे होने में निहित नहीं है। बल्कि मामला धर्म के प्रशासन से जुड़ा हुआ है।
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हमें यह बात समझना जरुरी है कि किसी धर्म का कमजोर प्रशासन धर्म को कमजोर तथा मजबूत प्रशासन धर्म को मजबूत बनाता है और धर्म का प्रशासन ही किसी धर्म के धर्मावलम्बियों को धर्म को छोड़ने या उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करने में मुख्य भूमिका निभाता है।
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धर्म के दो आयाम है :
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1) मीमांसा -- किसी धर्म की आस्थाएं, मान्यताएं, परम्पराएं, उपदेश, दर्शन और आध्यात्मिक पहलू धर्म की मीमांसा से सम्बंधित है। और धर्म की मीमांसा व व्याख्या करने का दायित्व सम्बंधित धर्म के धर्म उपदेशको, संतो, महन्तो आदि के ऊपर छोड़ देना चाहिए। इसीलिए मैं इसके विवरण में नहीं जाऊँगा।
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2) प्रशासन -- धर्म के प्रशासन से आशय उन नियमों विनियमों से है जिनके तहत किसी धर्म के धार्मिक संस्थानों जैसे पूजा स्थल, संगठन, ट्रस्ट, निकाय आदि का प्रबंधन किया जाता है। किसी भी धर्म के टिके रहने की संभावना अमुक धर्म के प्रशासन द्वारा तय होती है। यदि धर्म का प्रशासन मजबूत है तो धर्म मजबूती से टिका रहेगा, जबकि कमजोर प्रशासन से धर्म निरंतर कमजोर होगा और धर्म की क्षति होगी।
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हिंदू धर्म के प्रशासन का जातिय भेदभाव से क्या सम्बन्ध है, जिसके कारण डॉ आंबेडकर 1936 में 6 करोड़ दलितों के साथ हिंदू धर्म का त्याग करने को उद्यत थे और, अंततोगत्वा उन्होंने 1956 में 3 लाख 65 हजार दलितों के साथ सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म अपनाया ?
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देखिये, हिंदू समाज जातियों में बंटा हुआ है यह एक सच्चाई है, लेकिन यह भी सच है कि जाति व्यवस्था के कारण हिंदू समाज में जातिय अलगाव पैदा नहीं हुआ। तीव्र जातीय अलगाव का कारण धार्मिक संस्थानों का कमजोर प्रशासन था। जातियों में भिन्नता होना और जातिय आधार पर भेदभाव होने में फर्क है। इसे इस तरह समझिए कि, कोई ब्राह्मण अपनी आस्थाओ और कुल-वंश परम्पराओ के चलते वैवाहिक संस्कार अपनी जाति में ही करता है या अपने घर में निर्मित पूजा गृह में दलित को प्रवेश नहीं देता तो कोई दलित उसके कुल से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने या उसके निजी पूजा गृह में प्रवेश करने का दुराग्रह नहीं करेगा। लेकिन जब दलितों के सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है, और सामुदायिक स्तर पर इसे खुले रूप से जायज ठहराया जाता है, तो यह अपमानजनक प्रतीत होता है और बात बिगड़ जाती है।
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आदि काल में हिंदू धर्म में इस अस्पृश्यता और ऊंच नीच का व्यवहार नहीं था, इसका उदाहरण रामायण और महाभारत में मिलता है। रामायण में श्री राम ने शबरी के बैर खाये और निषाद का आतिथ्य स्वीकार किया, जबकि महाभारत में कर्ण के कुलीन न होने के बावजूद युवराज दुर्योधन ने उसे बराबर का स्थान दिया था। तब कर्म आधारित व्यवस्था मौजूद थी लेकिन वर्गो का आधार जातिय नहीं था। मध्य काल काल में इसका स्थान वर्ण ने ले लिया।
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आदि काल में मंदिरों का चलन नहीं था और मंदिरों की जगह आश्रम आधारित व्यवस्था थी। इन आश्रमों में सभी वर्गों के छात्रों को शिक्षा दी जाती थी। धीरे धीरे आश्रमों का स्थान मंदिरों ने ले लिया, तथा इन मंदिरों का स्वामित्व जिन 'कुछ' महन्तो के पास था उन्होंने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव को धार्मिक-सामुदायिक संस्थानों में बढ़ावा दिया।
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100 साल पहले भी हिंदू धर्म के अनुयायियों का बहुमत सामुदायिक अस्पृश्यता के खिलाफ था और आज भी खिलाफ है। लेकिन फिर भी दलितों का उत्पीड़न जारी रहा। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि हिंदू श्रद्धालुओं के पास अपने धार्मिक संस्थानों और मंदिर प्रमुखों को चुनने और हटाने का अधिकार नहीं था। मंदिरों के स्वामित्व का हस्तांतरण उत्तराधिकार परम्परा द्वारा होता था और वे आजीवन अपने पद पर बने रहते थे। इससे मंदिर प्रमुखों ने मंदिरों को अपनी निजी संपत्ति की तरह बरता। उन पर हिंदू समुदाय का कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। अत: उन्होंने दलितों के मंदिरो में प्रवेश को लेकर बाधाएं उत्पन्न की। ऊँची नीची जातियों समेत समुदाय के ज्यादातर श्रद्धालु इसे अनुचित मानते थे, लेकिन उनके पास महन्तो को नियंत्रित करने की कोई प्रक्रिया नहीं थी।
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उत्तराधिकार परम्परा और आजीवन कार्यकाल का दूसरा नुकसान यह हुआ कि मंदिर दान से आई संपत्ति का संग्रहण करने लगे और धार्मिक संस्थानों द्वारा धर्म के उत्थान एवं वंचित तबके के लिए किये जाने वाले आवश्यक परोपकारी कार्यों में कमी आई। तब लोकतांत्रिक रूप से सरकारे नहीं चुनी जाती थी। राजाओ का शासन होता था। राजा अच्छे भी होते थे और बुरे भी। धर्म निष्ठ भी होते थे और उदासीन भी। ऐसी स्थिति में धर्म को संवर्धित करने के लिए कोई सतत और निर्णायक संस्था का अभाव हो गया और धर्म की क्षति हुयी। राजा की सेना व शासन के आधार पर राज्य मजबूत या कमजोर हो रहा था लेकिन धर्म लगातार टूटता गया।
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सिक्ख धर्म का प्रशासन शुरू से ही सुगठित रहा, तथा 10 वें गुरु गोविन्द सिंह जी ने इसके प्रशासन को और भी सुस्पष्ट करके बेहतर बनाया। सिक्खो में गुरुद्वारों के प्रमुखों को चुनने का अधिकार स्थानीय सिक्ख नागरिकों को था, जिससे उन पर समुदाय का अंकुश बना रहा। इससे एक और गुरुद्वारा प्रमुख सभी अनुयायियों के साथ बिना भेदभाव के समानता का व्यवहार करने को प्रोत्साहित हुए वहीँ दूसरी और उत्तराधिकार परम्परा न होने की वजह से गुरुद्वारा प्रमुख दान से प्राप्त राशि का संग्रह करने की जगह इसका उपयोग परोपकारी कार्यों में करते थे। यही वजह रही कि सिक्ख एक धर्म के रूप में ज्यादा मजबूत होकर उभरे और संख्या में सिर्फ 1.5% होने के बावजूद उन्होंने ब्रिटिश सरकार को एसजीपीसी एक्ट लागू कराने और कृपाण रखने का अधिकार देने के लिए विवश कर दिया था।
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1926 में गुरुद्वारा एक्ट पास हो चुका था, अत: डॉ आंबेडकर और भी आश्वश्त हो गए थे कि यदि दलित सिक्ख धर्म में धर्मांतरित हो जाते है तो उन्हें उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा। ईसाई व इस्लाम धर्म का प्रशासन भी हिंदू धर्म से बेहतर रहा है तथा इसी कारण इन धर्मो में भी जातिय आधार पर भेदभाव नहीं पनप सका। किन्तु डॉ आंबेडकर राष्ट्रवादी व्यक्ति थे और इन दोनों धर्मो को विदेशी धर्म मानते थे। वे जानते थे कि यदि वे अपने अनुयायियों के साथ इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो जाते है तो हिंदू धर्म और हिन्दुस्तान को अपूरणीय क्षति होगी। इसीलिए बेहद दबाव होने के बावजूद उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म को खारिज कर दिया।
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कुल मिलाकर यह ऐसी घटना थी जो यदि घट जाती तो 1936 से अब तक का भारत का पूरा इतिहास ही बदल जाता। दीगर कारणों के अलावा एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि तब सिक्खो की आबादी 50 से 60 लाख थी, और सिक्ख नेता नहीं चाहते थे कि 6 करोड़ लोगो के साथ उनके नेता आंबेडकर सिक्ख धर्म में प्रवेश करे। डॉ आंबेडकर ने आजीवन दलितों को अधिकार दिलवाने के लिए संघर्ष किया, और अपने अंतिम क्षणों में 3 लाख 65 हजार हिन्दुओ के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इससे मालूम होता है कि वे हिन्दू धर्म छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन हिन्दू धर्म में व्याप्त जातिय भेदभाव ने उन्हें धर्म छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया था।
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स्थिति आज भी बदली नहीं है। मंदिर प्रमुखों और ट्रस्टियों पर समुदाय के नागरिकों का कोई नियंत्रण नहीं है, जिससे वे धन का संग्रह कर रहे है और इस सामुदायिक खजाने को परोपकार के कार्यों में खर्च करने की जगह सरकार के खजाने में जमा करवा रहे है। आज भी कई मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर अघोषित प्रतिबन्ध लगे हुए है, और मिशनरीज पिछड़े हुए इलाकों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कर रही है। समाधान के लिए हमें एक ऐसे कानून की जरूरत है जिससे हिँदू नागरिकों का मंदिर के ट्रस्टों और अन्य धार्मिक निकायों पर नियंत्रण रहे।
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समाधान ?
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[1] हमने इसके लिए 'राष्ट्रिय देवालय ट्रस्ट अधिनियम' नामक क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। प्रस्तावित क़ानून के अनुसार भारत में राष्ट्रीय स्तर पर निम्न 4 ट्रस्टों की स्थापना की जायेगी :
१) अयोध्या में राम मंदिर*,
२) मथुरा में कृष्ण मंदिर,
३) काशी में विश्व्नाथ मंदिर, और
४) कश्मीर में अमरनाथ मंदिर
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(*) इस क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर और काशी में विश्व्नाथ मंदिर निर्माण के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी, और अयोध्या में राम व काशी में विश्व्नाथ मंदिर का निर्माण हो सकेगा।
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इन ट्रस्टों के प्रमुखों की नियुक्ति हिन्दुओ द्वारा मतदान से की जायेगी और हिन्दू नागरिक इन्हें कभी भी बहुमत का प्रयोग करके पद से निष्कासित कर सकेंगे। मतदान की प्रक्रिया के लिए सभी हिन्दू नागरिकों की अलग से मतदाता सूची बनाने की भी प्रक्रिया दी गयी है। इस प्रस्तावित क़ानून का ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है -- https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407
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[2] मौजूदा आरक्षण व्यवस्था भी अगड़ी और पिछड़ी जातियों में अलगाव को बढ़ा रही है। मैं जातिय आधार पर आरक्षण दिए जाने का समर्थन करता हूँ, लेकिन वर्तमान आरक्षण की व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है। हमें आरक्षण की ऐसी प्रक्रिया लागू करने की जरुरत है जिस पर अगड़े, पिछड़े और दलित सभी सहमत हो। वर्तमान व्यवस्था से आरक्षण का लाभ सिर्फ 5 से 10% दलितों तक ही पहुँच पा रहा है जिससे दलितों में भी अति पिछड़े वर्गों की हालत जस की तस बनी हुयी है और यही व्यवस्था जारी रही तो आगे भी इनकी स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी।
समाधान के लिए हमने जो प्रक्रिया दी है उसके लागू होने से "दलितों की सहमति" से आरक्षण को 50% से घटाकर 10% तक किया जा सकेगा। फिर से पढ़िए -- हमारा प्रस्ताव आरक्षण को 'दलितों की सहमति' से कम करने का है, उनकी असहमति से नहीं। इस क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने से दलितों के पिछड़े हुए वर्गों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा साथ ही सामान्य वर्ग का कोटा भी बढ़ जाएगा, अत: सामजिक समरसता की स्थापना होगी। प्रस्तावित प्रक्रिया का कानूनी ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है -- https://web.facebook.com/permalink.php?story_fbid=760514727400099&id=100003247365514&_rdr
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समस्या
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समस्या यह है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल तीनो संयुक्त रूप से हिंदू मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बनाने के इस क़ानून का विरोध कर रहे है। उनका कहना है कि भारत भले ही एक धर्म निरपेक्ष देश हो, लेकिन मंदिरों की संपत्ति और प्रंबंधन पर सरकारों का नियंत्रण रहना चाहिए। सोनिया-मोदी और केजरीवाल के अंध भगत भी इनकी इस निति समर्थन कर रहे है। आरक्षण को लेकर भी इनकी निति यही है कि मौजूदा स्थिति जारी रहनी चाहिए।
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जहां तक संघ की बात है संघ हमेशा से दलितों को अधिकार देने के खिलाफ रहा और यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। गोलवलकर ने तो संविधान की यह कहकर आलोचना की थी कि इसमें मनुस्मृति को स्थान क्यों नहीं दिया गया है !! संघ आज भी हिन्दू धर्म के प्रशासन को दुरुस्त बनाने और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के खिलाफ है। और संघ के सभी अंध सेवक भी संघ की इस निति का समर्थन करते है।
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समाधान के लिए नागरिकों को अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजने चाहिए कि उपरोक्त वर्णित क़ानून ड्राफ्ट्स को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। जब करोडो नागरिक अपने सांसदों को आदेश भेजकर ऐसी मांग करेंगे तो जनमत का सम्मान करते हुए प्रधानमंत्री इन कानूनों को गैजेट में प्रकाशित कर देंगे। यदि कार्यकर्ता सोनिया-मोदी-केजरीवाल और भागवत के भरोसे बैठे रहेंगे तो यह तय है कि मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आ सकेगा।
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