Pawan Jury BhilwaraRj

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जिस भी देश में जाती है वहां गणित और विज्ञान का आधारभूत ढांचा तोड़ने के प्रयास करती है। साथ ही मंत्रियो को घूस देकर ऐसे कानून लागू करवाती है जिससे सरकारी स्कूलों की स्थिति बदतर हो जाए।
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8 क्लास तक फ़ैल न करने की नीति से छात्र गणित-विज्ञान स्वत: ही नहीं पढता और एक बड़ा तबका इस तकनिकी शिक्षा से वंचित हो जाता है, और अमुक देश तकनीक के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर निर्भर बना रहता है। सरकारी स्कूलों के बदतर होने से अभिभावकों को निजी स्कूलों की और रूख करना पड़ता है, जिससे गरीबी बढ़ती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मिशनरीज से गठजोड़ होने के कारण मिशनरीज को इनसे सीएसआर के माध्यम से अनुदान प्राप्त होते है और वे पिछड़े हुए इलाको में स्कूल और अस्पतालो की माध्यम से धर्मांतरण करते है। इस तरह किसी विकासशील देश के सरकारी स्कूलों का आधार तोडना बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज का साझा एजेंडा है।
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दक्षिण कोरिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने 70 के दशक में प्रवेश किया था और वहां पर 8 वीं क्लास तक फ़ैल न करने के क़ानून लागू किये गए। इससे उनका गणित और विज्ञान का आधार टूट गया और बड़े पैमाने पर गरीबी फैली। आज यह देश तकनिक के क्षेत्र में पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर निर्भर है और जहां साउथ कोरिया में 70 के दशक में 5% ईसाइयत थी, आज कुल आबादी के 30% लोग ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो चुके है, और 40% किसी धर्म में नहीं मानते। ।
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भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1991 में प्रवेश किया और साथ ही सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा अनुदान दिए। यदि 2002 में आठवीं तक फ़ैल न करने का क़ानून लागू कर दिया जाता तो शहरी मध्य वर्ग विकल्प के अभाव में आंदोलन कर सकता था। अत: पहले निजी स्कूलों के लिए नीतियों को आसान बनाया गया। अब परचून का व्यापारी भी दो कमरों के घर में सरकारी अनुदान से स्कूल खोल सकता था, और बीएड की डिग्री लेना 10 वी क्लास पास करने से भी आसान बना दिया दिया गया।
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और जब निजी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये तो 2008 में 8 वीं तक फ़ैल न करने के कानून को पास किया गया। गाँवों और कस्बों के सरकारी स्कूल भोट हो गए और शहरी मध्य वर्ग ने सरकारी स्कूलों को सुधारने के कानूनों को सुधारने की जगह निजी स्कूलों में शरण ली। अब सरकारी स्कूल धर्मशालाओं से भी बुरी हालत में है और अभिभावक निजी स्कूल संचालकों के शिकंजे में पूरी तरह से फंस चुके है।
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समस्या - बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तो अलग कर दीजिये। आज शिक्षा सुधार में सबसे बड़ी बाधा निजी स्कूलों के संचालक है। वे जानते है कि यदि सरकारी स्कूलों का स्तर सुधर गया तो उनके ग्राहकों की संख्या घट जायेगी। अत: ये शिक्षा माफिया शिक्षा अधिकारी को घूस देता है ताकि शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाये रखें। और जहां तक जन प्रतिनिधियों और मंत्रियों की बात है, वे शिक्षा अधिकारी, स्कूल माफिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तीनो से घूस खाते है और उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिससे सरकारी स्कूलों का स्तर बेहतर हो और निजी स्कूलों की लूट पर लगाम लगे।
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समाधान ?
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उच्च माध्यमिक तक की शिक्षा को सुचारु बनाए रखने के लिये जिला शिक्षा अधिकारी जिम्मेदार है। अत: शिक्षा अधिकारी और शिक्षा मंत्री को खुश करने या काबू में करने के दो विकल्प है :
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1. सभी जिले के अभिभावक एक समूह बनाये और नियमित रूप से हर महीने जिला शिक्षा अधिकारी, विधायक, मंत्री आदि को हफ्ता पहुंचाए। यदि अभिभावकों द्वारा दी गयी घूस की राशि निजी स्कूल माफिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा दी जा रही घूस और चन्दो से अधिक होगी तो शिक्षा अधिकारी, मंत्री आदि स्वत: ही अभिभावकों के हित के लिए काम करने लगेंगे।
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2. अभिभावक अपने विधायक से यह मांग करे कि जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार अभिभावकों को दिया जाए। यदि जिले के अभिभावकों को शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया मिल जाती है तो अभिभावक शिक्षा अधिकारी को नियंत्रित कर सकेंगे। यदि तब शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों में सुधार लाकर उन्हें निजी स्कूलों से बेहतर बना देता है और निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाता है तो ठीक है, वरना अभिभावक शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकाल देंगे।
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कैसे किसी जिले के अभिभावक शिक्षा अधिकारी को चुनेंगे और किस तरह से हटा सकेंगे, इसकी प्रक्रिया का कानूनी ड्राफ्ट निचे दिए गए लिंक पर दिया गया है। यदि आप इस कानूनी ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो अपने विधायक को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इस क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट :
https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/533843000127232
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टिपण्णी : सोनिया-मोदी और केजरीवाल राईट टू रिकॉल क़ानून प्रकिया का विरोध कर रहे है। उनका मानना है कि अभिभावकों के पास किसी भी सूरत में जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंध भगत और आरएसएस के सभी स्वयं सेवक भी इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे है। वे कह रहे है कि मौजूदा व्यवस्था ही जारी रहनी चाहिए। और यदि अभिभावकों को ज्यादा तकलीफ हो तो वे झुण्ड बनाकर कलेक्ट्री में जाकर जिला शिक्षा अधिकारी के खिलाफ ज्ञापन दे सकते है या प्रदर्शन कर सकते है। लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार सिर्फ उनके नेताओ के पास ही रहेगा।
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