Pawan Jury BhilwaraRj

तिरुपति के 1.8 टन के बाद अब गोल्ड मोडेटाइजेशन स्किम के तहत डेढ़ टन सोना और सरकार के नियंत्रण में जा चुका है। बदले में मंदिरों को गोल्ड बांड मिले है !!
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खबर का लिंक यहाँ देखें -- http://goo.gl/E8kM1K
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कल्हण ने 'राजतरंगिणी में लिखा है कि 12 शताब्दी में कश्मीर के राजा ने 'मंदिर विध्वंस एवं लूट' नाम से एक विभाग बनाया था। विभाग के मुखिया का काम मंदिरों पर हमला करके उनका सोना लूटना था। विभाग बनाने वाला राजा कोई मुग़ल या अफगानी नहीं था। इस हिन्दू राजा का नाम था -- हर्ष।
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सतयुग से लेकर कलयुग तक सोना हमेशा से स्थायी खजाना रहा है। श्रद्धालुओ के दान से मंदिरों में सोने की आवक होती थी और मंदिर प्रमुख इस सोने का 'निरन्तर संग्रहण' करते जाते थे। आदि काल में मंदिरों की जगह आश्रमों का चलन था जिनमे दान से प्राप्त सम्पदा का उपयोग परोपकार के कार्य करने और नागरिकों को हथियार आदि का प्रशिक्षण देने में किया जाता था। इससे समुदाय द्वारा दिया गया दान फिर से समुदाय में लौट जाता था और समाज एवं धर्म का संवर्धन होता था।
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तो आदि काल में आश्रमों का संचालन करने वाले ऋषि मुनि आश्रम सम्पदा का उपयोग समाज और धर्म के उत्कर्ष पर क्यों करते थे ?
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असल में तब आश्रम प्रमुख आश्रमों में स्थायी रूप से निवास नहीं करते थे और एक जगह से दूसरी जगह विचरण करते रहते थे। आश्रम प्रमुख की अस्थायी नियुक्ति होने के कारण उनका आश्रम और उनकी संपत्ति से मोह नहीं होता था, अत: वे स्वाभाविक रूप से दान का उपयोग धर्मोपयोगी कार्यो में कर देते थे। मध्य काल में आश्रम की जगह मंदिरों ने ले ली। लेकिन इससे भी कोई समस्या नहीं थी। समस्या का कारण दूसरा था। असल में मध्यकाल में मंदिर प्रमुखों ने विचरण करना छोड़ दिया और अपने अपने ठिकानों पर जम गए। इससे उनमे अपने मंदिरों को विराट बनाने और अपने स्थान को शक्तिशाली बनाने की प्रेरणा हुयी। अत: उन्होंने प्राप्त दान का संग्रहण करना शुरू कर दिया। "आजीवन कार्यकाल और उत्तराधिकार व्यवस्था" के चलन में आने से समाज की संपत्ति मंदिरों में जमा होने लगी और मंदिर धन संग्रह के ठिकाने बन गए।
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इस प्रवृति पर मध्यकाल के कवि कबीरदास जी ने कुछ इस तरह से टिपण्णी की थी :

बहता जल ही निर्मला बांधा गंदा होय
साधुजन चलता भला दाग न लागे कोय।
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दूसरा महत्त्वपूर्ण बदलाव यह आया कि मंदिरों ने परोपकारी कार्यों के साथ साथ नागरिकों को हथियारो का प्रशिक्षण देना भी छोड़ दिया था जिससे हिन्दुओ की सैन्य शक्ति कमजोर हुयी और वे सुरक्षा के लिए राजाओ पर आश्रित हो गए। जबकि सिक्ख धर्म में गुरुद्वारों द्वारा अनुनायियों को सैन्य प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होने से सिक्ख सैन्य रूप से संगठित होकर युद्धों में आवश्यक प्रतिरोध कर सके। असल में मंदिर खजाना इकट्ठा कर रहे थे लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य गतिविधियों का संचालन नहीं कर रहे थे। अत: न तो मंदिरों के पास कोई सेना थी न ही नागरिकों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया गया था और न ही आम नागरिकों के पास हथियार थे। नतीजा यह हुआ कि वे लूट के सबसे आसान शिकार बन गए।
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तो काश्मीर के राजा हर्ष तथा अन्य आतताइयों के लिए मंदिरों पर हमला करने के अन्य कारणों के अलावा एक महत्त्वपूर्ण कारण मंदिरों में जमा खजाना था। चूंकि तब राजा सैन्य बल से मंदिरों का सोना लूटते थे और मंदिर और नागरिक हथियार विहीन थे अत: उन्हें बदले में कोई गोल्ड बांड देने की जरुरत नहीं थी।
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समस्या
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समस्या जस की तस बनी हुयी है। भारत में मंदिरों का प्रशासन बिगड़ा हुआ है, क्योंकि आज भी मंदिर, मठ, आश्रम आदि सामुदायिक धार्मिक संस्थानों के प्रमुखों पर समुदाय का नियंत्रण नहीं है। मंदिर समुदाय की संपत्ति है और मंदिरों के ट्रस्टों पर हिन्दू समाज के नागरिकों का नियंत्रण होना चाहिए। इस नियंत्रण के अभाव में आज भी मंदिरों द्वारा खजानों का संग्रहण किया जाता है जिससे एक तरफ परोपकार के कार्यों में कमी आती है वहीँ दूसरी तरफ सरकारों द्वारा इन पदाधिकारियों को प्रभाव लेकर मंदिरों को नियंत्रण में ले लिया जाता है। हिन्दू श्रद्धालु मंदिरों में दान देते है और मंदिर प्रमुख और सरकार इस संपत्ति का उपयोग अपने 'विवेक' से करते है। आप चर्च में जाएंगे तो आपको ऐसा कोई खजाना नहीं मिलेगा। चर्च के पदाधिकारी (पादरी, कार्डिनल, पोप ट्रस्टी आदि) दान से प्राप्त संपत्तियों का उपयोग स्कूल और अस्पतालों का संचालन करने में करते है जिससे उनके धर्म का प्रसार होता है। वे ऐसा इसीलिए करते है क्योंकि चर्च में पदाधिकारियों का कार्यकाल आजीवन नहीं होता और न ही उनकी नियुक्ति उत्तराधिकार परंपरा द्वारा होती है। यही कारण है कि सिर्फ 2000 वर्ष पुराना ईसाई धर्म पूरी दुनिया में फ़ैल रहा है जबकि हिन्दू धर्म लगाता सिकुड़ रहा है।
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समाधान ?
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मोदी साहेब ने इसके लिए कुछ इस तरह के समाधान सुझाएँ है :
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बीजेपी के 2009 के मेनिफेस्टो में बीजेपी ने यह वादा किया था कि यदि वे सत्ता में आये तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर देंगे। लेकिन मोदी साहेब ने 2014 के मेनिफेस्टो में से इसे हटा दिया ! साथ ही चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने यह एलान भी किया कि 'देवालयो से पहले शौचालयो का निर्माण किया जाना चाहिए' !
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फिर उन्होंने मंदिरों को दान न देने और मूर्तियों को तोड़ने का सन्देश देने वाली 'ओह माय गॉड' जैसी गलीज़ फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले परेश रावल को सासंद का टिकट दिया, और परेश रावल ने सांसद बनने पर मंदिरों पर टिपण्णी की कि 'हिन्दू मंदिर दुनिया के सबसे "गंदे" पूजा स्थल है' !!
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फिर उन्होंने गुजरात की मुख्य्मंत्री आनंदी बेन पटेल को यह बयान देने को कहा कि, 'हिन्दुओ को मंदिरों की जगह स्कूलों में खाना वितरित कर रहे एनजीओ को दान देना चाहिए' !!
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फिर उन्होंने मंदिरों और संतो की छवि को धूमिल करने वाली फिल्म 'पीके' का प्रमोशन किया और अपने कार्यकर्ताओ को इस फिल्म का विरोध न करने को कहा !!
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फिर मोदी साहेब ने संतो और धर्म उपदेशको को चोर उचक्का की तरह दिखाने वाली अजय देवगन की फिल्म 'सिंघम-2' का प्रमोशन किया और उन्हें पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया !!
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फिर उन्होंने तिरुपति के मंदिर से 1.8 टन सोना उठाकर सरकारी खजाने में पहुंचा दिया। और अन्य मंदिरों को भी अपने स्वर्ण भंडारों को सरकारी खजाने में जमा करने के लिए प्रेरित किया !!
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दूसरे शब्दों में मोदी साहेब के पास इस समस्या का समाधान यह है कि मंदिरगामी श्रद्धालुओं को मंदिरो में न जाने और और दान न देने की लिए प्रेरित किया जाए। इससे स्वत: ही मंदिर दिवालिये हो जाएंगे और मंदिरों प्रशासन को सुधारने की समस्या हल हो जायेगी !!! और जिन मंदिरों में पर्याप्त स्वर्ण कोष मौजूद है उन्हें सरकारी नियंत्रण में लेकर बदले में गोल्ड बांड थमा दिये जाए !!!
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सोनिया घांडी और अरविन्द गांधी से इस सम्बन्ध में कोई उम्मीद रखना भी उनसे ज्यादती करना होगा। उनका मानना है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष मतलब सेकुलर देश है, अत: मंदिर हो न हो या न हो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। और जहां तक मंदिरों के खजाने की बात है, गोल्ड बांड स्किम कांग्रेस द्वारा ही लागू करने का प्रयास था, लेकिन नागरिकों के विरोध के चलते मनमोहन और चिदमंबरम मंदिरों का सोना खींचने में सफल नहीं हो सके।
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राईट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित समाधान :
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हमें इस बात को समझना जरुरी है कि सत्ता परिवर्तन या प्रधानमंत्री को बदलने से इस समस्या का हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें ऐसे क़ानून को लागू करने की मांग करनी चाहिए जिससे मंदिरों के प्रशासन को बेहतर बनाया जा सके। इस सम्बन्ध में हमारा प्रस्ताव है कि मंदिरों के पदाधिकारियों को चुनने और निष्काषित करने की प्रक्रिया हिन्दू नागरिकों के पास होनी चाहिए। इसके लिए तय प्रक्रिया के लिए हमने 'राष्ट्रीय देवालय ट्रस्ट अधिनियम' का कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। कैसे हिन्दू नागरिक मंदिरों के प्रमुखों की नियुक्ति करेंगे और कैसे वे निष्कासित किये जा सकेंगे, इसका विधिवत विवरण पढ़ने के लिए निचे दिए गए लिंक को क्लिक करे।
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407
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उपरोक्त लिंक को क्लिक करें और कमेंट में बॉक्स में 'I support' लिखकर अपना समर्थन दर्ज करें तथा अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इस कानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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जब करोड़ो नागरिक अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजेंगे तो प्रधानमन्त्री जनमत का सम्मान करते हुए इस क़ानून को गैजेट में प्रकाशित कर देंगे।
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