Pawan Jury BhilwaraRj
ब्रिटेन 2019 में भारत को कोहिनूर 'दे' सकता है।
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कोई किसी को कुछ तब देता है जब कोई किसी से खुश हो जाता है, या बदले में कुछ लेता है या फिर देने की सिवा कोई अन्य विकल्प शेष नहीं रहता।
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द्वितीय विश्व युद्ध के चलते ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य शक्ति कमजोर हो गयी थी, और सैन्य बल से भारत पर नियंत्रण बनाये रखना मुश्किल हो गया था। नवम्बर 1946 में नौसेना ने ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह किया और जवाहर लाल गाज़ी व महादुरात्मा गांधी द्वारा जारी की गयी अपीलों के बावजूद क्रांतिकारी पलटने को तैयार नहीं थे। जब ब्रिटिश राज ने देखा कि मोहन और जवाहर का जादू जनता से उतर रहा है, यदि ऐसे में क्रांतिकारियों ने एक और विद्रोह कर दिया तो भारत में मौजूद ब्रिटिश गाजर मूली की तरह काट दिए जाएंगे। इसीलिए उन्होंने कम बुरा विकल्प चुना। उन्होंने भारत को आजादी 'दी' और अपनी कठपुतली जवाहर को सत्ता सौंप गए। यदि अंग्रेज ऐसा नहीं करते तो अगले एक आध साल में क्रांतिकारी अंग्रेजो को खदेड़ कर आजादी छीन लेते और जवाहर लाल गाजी नेपथ्य में चले जाते। और भारत की सत्ता तब क्रांतिकारियों/असली सैनानियों के हाथ में आ जाती तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता।
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क्या आज भारत की सैन्य/आर्थिक शक्ति इतनी मजबूत है कि वह ब्रिटिश राज से कोहिनूर वापिस 'ले' सके ? जवाब सबको पता है।
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तब भी ब्रिटेन भारत को कोहिनूर दे सकता है !! क्यों ?
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विदेशी निवेश की निति पर एनडीए सरकार यूपीए से दोगुनी गति से कार्य कर रही है। और जिस गति से मोदी साहेब 'मेक इन इण्डिया' के नाम पर भारत के विभिन्न आर्थिक सैन्य प्रतिष्ठानों को अमेरिका-ब्रिटेन के हवाले कर कर रहे है इसके एवज में, मोदी साहेब की 2019 में फिर से सत्ता में वापसी सुनिश्चित करने के लिए ब्रिटेन भारत को कोहिनूर 'दे' सकता है।
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आम चुनावों से एन पहले इस तरह की घटना से मोदी साहेब का कद तेजी से बढ़ेगा और वे फिर से सत्ता में वापसी कर सकेंगे।
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यदि कोहिनूर भारत में लौट आता है तो प्रत्येक भारतीय को ख़ुशी होगी। लेकिन इस प्रतीकात्मक विजय के बदले हम बड़ी कीमत चुकाएंगे। इस तरह कोहिनूर की वापसी भारत को महंगी पड़ सकती है। अपनी अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश-अमेरिकी धनिको को हवाले किये बिना यदि कोहिनूर भारत में आता है तो ही इसके मायने होंगे।
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