Pawan Jury BhilwaraRj

कैसे विजय माल्या जैसे लोग करोड़ो रूपये के कर्जे ले लेते है, फिर कर्जे खा जाते है और आसानी से बच भी निकलते है ? और कैसे इसे काबू किया जा सकता है ?
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भारत के सरकारी बैंको के कुल डूब खाते का 40% डूबत सिर्फ 30 लोगो पर बकाया है। और यह राशि 1 लाख 21 लाख करोड़ है। असल में डूब खाते में 73% योगदान बेहद अमीर और अमीर लोगो का है, मध्य वर्ग और किसानो का नही।
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माल्या ने सरकारी बैंको को लगभग 7,500 करोड़ रूपये का चूना लगाया है, लेकिन पूरी व्यवस्था में पैसा बांटने के बाद उनके हिस्से में लगभग 50% के आस पास ही आया होगा। शेष 50% कहाँ गया ?
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१. सरकारी बैंक

सरकारी बैंको को नोट छापने की भी जरुरत नही होती। वे किसी के भी खाते में नंबर लिखकर उन्हें कर्ज दे सकते है, और बाद में घूस खाकर कर्जो को एनपीए में दिखा देते है। इसीलिए जब पैसे हड़पने हो तो माल्या साहेब या उनके अन्य बंधु सिर्फ सरकारी बैंको से ही कर्जा लेते है। क्योंकि सरकारी बैंको का कोई मालिक नही। वे 2009 में ही डिफाल्टर हो गए थे, पर आईडीबीआई बैंक में पैसे खिलाकर उन्होंने फिर से 900 करोड़ का कर्ज ले लिया। और माल्या साहेब ने अपनी मूल कंपनी यूनाइटेड ब्रुअरीज की गारंटी भी नही दी, और बैंको ने भी नही ली।
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तो बैंको के संचालक घूस खाते है और बिना किसी जमानत के मोटे कर्जे देते है।
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समस्या -- इन बैंको के संचालको और अध्यक्षों को नौकरी से निकालने का अधिकार भारत के नागरिको के पास नही है।
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स्टेट बैंक अॉफ इंडिया – Rs 1,600 crore

पंजाब नेशनल बैंक – Rs 800 crore

आईडीबीआई – Rs 800 crore

बैंक ऑफ़ इंडिया – Rs 650 crore

बैंक ऑफ़ बड़ौदा – Rs 550 crore

यूनाइटेड बैंक ऑफ़ इंडिया – Rs 430 crore

सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया – Rs 410 crore

यूको बैंक – Rs 320 crore

कॉर्पोरेशन बैंक – Rs 310 crore

स्टेट बैंक ऑफ़ मैसूर – Rs 150 crore

इंडियन ओवरसीज़ बैंक – Rs 140 crore

पंजाब एंड सिंध बैंक – Rs 60 crore

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२. रिजर्व बैंक

कर्जे खाने के बाद अगली बाधा रिजर्व बैंक है, क्योंकि इन घपलो की जांच करवाने का अधिकार रिजर्व बैंक गवर्नर के पास है। अत: खाए गए इन कर्जो में से एक हिस्सा इन्हें देना होता है।

समस्या -- भारत के नागरिको के पास आरबीआई गवर्नर को भी नौकरी से निकालने का अधिकार भी नही है।
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३. जांच एजेंसियां

प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई आदि जांच करके आपको अंदर पहुंचा सकती है, क्योंकि नियमों के तहत मामला तो दर्ज होगा ही। इसीलिए एक हिस्सा इन एजेंसियों के चीफ को भेजना होता है, ताकी वे मामले को सालों तक लटकाये रखें और आपको बचने का मौका दें।
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समस्या - प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई चीफ को भी नौकरी से निकालने की कोई प्रक्रिया नागरिको के पास नही है।
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४. प्रधानमंत्री
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इन सभी बैंको के अध्यक्षों और संचालको को नौकरी से निकालने का अधिकार प्रधानमंत्री के पास है, आरबीआई गवर्नर को नौकरी से निकालने का अधिकार भी प्रधानमंत्री के पास है, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुख की नौकरी भी प्रधानमंत्री की इच्छा पर चलती है। और वित्त मंत्री को भी प्रधानमंत्री किसी भी दिन केबिनेट या मंत्रालय से बाहर निकाल सकते है।

"अत: जब तक आपको प्रधानमन्त्री का आशीर्वाद हासिल न हो, आप कितने भी लोगों को खुश कर ले, कर्ज खाकर आप उलझ ही जाएंगे"
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इस आधार पर मेरा 'अनुमान' है कि माल्या साहेब के केस में सोनिया घांडी, मनमोहन, चिदंबरम आदि ने पैसा खाया होगा और माल्या को कर्जे खाने दिये होंगे। लेकिन सरकार बदलने के साथ ही माल्या मुश्किल में फंस जाएंगे ये बात माल्या जानते थे। अत: उन्हेोने बीजेपी को लोकसभा चुनावो के दौरान चंदे के रूप में कई सौ करोड़ रूपये चंदे के रूप में दिए होंगे या फिर चुनाव जीतने के बाद। अरुण जेटली, जयंत सिन्हा वगेरह ने नकदी ली होगी पर चूंकि मोदी साहेब भी केजरीवाल जी की तरह घूस के रूप में नकदी ग्रहण नही करते अत: उनके सकारात्मक कवरेज के लिए पैसा मिडिया समूहों को दिया गया होगा। जहां तक महात्मा अरविन्द गांधी का प्रश्न है, वैसे भी इन मामलो में वे कुछ करने की स्थिति में नही है, क्योंकि उनके प्रायोजक जिंदल जी खुद माल्या से 5 गुना ज्यादा एनपीए खड़ा कर चुके है।

माल्या तो नौकरशाहों, नेताओ, बैंकरों और जजो द्वारा जानबूझकर रची गयी इस व्यवस्था का एक प्रतीक मात्र है। पूरा परिदृश्य बेहद विशाल है और सभी (अधिकतर नही, सभी) राजनैतिक पार्टियां इन घपलो की लाभार्थी है। तेदेपा सांसद रायपट्टी समबिस्वा 434 करोड़ के डिफाल्टर है, कांग्रेस एमपी वेंकटरामी रेड्डी 4,000 करोड़ हजम कर चुके है तथा मौजूदा संसद के लगभग 100 सांसदों पर बैंको का बकाया है।
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समस्या - भारत के नागरिको के पास प्रधानमंत्री तथा सासंदों को भी 5 वर्ष से पहले नौकरी से निकालने का अधिकार नही है। अत: एक बार चुनाव जीतने के बाद इन्हें लूट चलाने का पट्टा मिल जाता है।
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5. अदालतें
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अंतिम दौर में यदि मामला अदालत में पहुँच जाता है तो जजों को पैसा खिलाना होता है, वरना सभी किये कराये पर पानी गिर जाएगा।
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समस्या - न तो भारत में नागरिको के पास जजो को नौकरी से निकालने का अधिकार है न ही भारत में ज्यूरी प्रथा है।
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समाधान ?
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१) फौरी समाधान यह है कि --- सरकारी बैंको को कर्जे सिर्फ 'व्यक्तियों' को ही देने चाहिए, कम्पनियों को नही, और इसे भी आवास, शिक्षा और चिकित्सा आदि व्ययों तक सिमित रखा जाए।
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२) इस गठजोड़ को सम्पूर्ण रूप से विकेन्द्रिकरण और जवाबदेही के निर्माण से ही तोडा जा सकता है। चुनाव जीतने के बाद यह पूरी व्यवस्था प्रधानमंत्री और सांसदों के अधीन आ जाती है, अत: वे अपने फायदे के लिए इसका उपयोग करते है, और नागरिको के पास अगले पांच वर्ष तक धरने, नारे, जुलुस, प्रदर्शन आदि करने के अलावा कुछ हाथ में नही रहता।
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इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए हमारा प्रस्ताव है कि प्रधानमंत्री, सांसद, आरबीआई गवर्नर, सीबीआई निदेशक आदि को चुनने और 'नौकरी से निकालने' का अधिकार 'सीधे' नागरिको को दिया जाए। ऐसा होने से इन अधिकारियों के मन में प्रत्येक गलत फैसला लेने के दौरान पद खोने का भय बना रहेगा, और वे ऐसे घोटाले करने से और दोषियों को बचाने से परहेज करेंगे।
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इन प्रक्रियाओ को लागू करने के लिए राईट टू रिकॉल ग्रुप ने क़ानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है, जिन्हें इस लिंक पर देखा जा सकता है --- https://web.facebook.com/notes/809761655808739
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विडंबना यह है कि :
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सोनिया घांडी-अरविन्द केजरीवाल-मोदी साहेब और इनके सभी अंधभगत इन प्रस्तावित कानूनो का विरोध कर रहे है, और उनका सम्मिलित रूप से मानना है कि मौजूदा व्यवस्था ही जारी रहनी चाहिए। वे सरकार का चेहरा और पार्टी बदलने का समर्थन करते है, लेकिन व्यवस्था के कानूनो में बदलाव के सख्त खिलाफ है। बारी बारी सबकी बारी।
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शेष नागरिको से आग्रह है कि, यदि आप इस प्रस्तावित कानूनो का समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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