Pawan Jury BhilwaraRj

कैसे पेड मिडिया जेएनयू जैसे मुद्दो से मोदी साहेब को भारी नुकसान पहुंचा सकता है, और कैसे कार्यकर्ता अपने स्तर पर इस समस्या का समाधान कर सकते है ?
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कन्हैया को पेड मिडिया हाथों हाथ ले रहा है, अत: जेएनयू बीजेपी पर काउंटर कर सकता है।
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अरविन्द केजरीवाल के बाद हार्दिक पटेल, और अब पेड मिडिया कन्हैया का कद तेजी से बढ़ा रहा है। बीजेपी ने कन्हैया के मामले को बेवजह तूल दिया, जबकि मामले को संक्षेप में निपटाया जा सकता था। लेकिन राष्ट्रवादी दिखने के चक्कर में बीजेपी नेताओ ने मामूली मामले पर कई बयान दिए, बीजेपी समर्थित पेड मिडिया(*) ने राष्ट्रीय स्तर पर इसे निरंतर उठाया, और देश में राष्ट्रवाद की 'लहर' चला दी। बची हुयी कसर बीजेपी की आई टी सेल ने सोशल मिडिया पर पूरी कर दी। लेकिन अब पेड मिडिया ने इस मुद्दे को लपक लिया है और कन्हैया को मोदी साहेब के बरअक्स खड़ा किया जा रहा है। मोदी साहेब पर इस तरह से अब तक इतना भस्मक व्यंग्यात्मक हमला किसी ने नही किया था। और पेड मिडिया लगातार ये फुटेज राष्ट्रीय चैनल्स पर दिखा रहा है। मोदी साहेब के लोकसभा चुनावी अभियान के बाद कन्हैया दूसरा व्यक्ति है, जिसके इतने साक्षात्कार पेड मिडिया पर प्रसारित हो रहे है।
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(*) भारत का मिडिया मिशनरीज और बहुराष्ट्रीय कम्पनियो द्वारा संचालित है, बीजेपी द्वारा नही। अत: इन्हें अंतिम आदेश मिशनरीज/बहुराष्ट्रीय कंपनियों से ही आते है।
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पहले दौर में पेड जी न्यूज, पेड इण्डिया टीवी, पेड टाइम्स नाउ आदि चैनल कन्हैया के खिलाफ मुहीम चला रहे थे और अब दूसरे दौर में पेड सीएनएन, पेड आजतक, पेड इंडिया टुडे, पेड एनडीटीवी, पेड एबीपी आदि कन्हैया को प्रोत्साहित कर रहे है। लेकिन तीसरे दौर में ये सभी चैनल कन्हैया को प्रमोट करेंगे, क्योंकि सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और मिशनरीज द्वारा संचालित है या उन पर बुरी तरह से निर्भर है। प्रमोशन नेगेटिव या पॉजिटिव हो सकता है। पर उससे प्रसार में कोई फ़र्क़ नही आता, क्योंकि इससे कन्हैया को प्रचार मिलेगा।
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सवाल यह उठता है कि जब चुनाव से पहले ही मोदी साहेब और मिशनरीज में समझौता हो चुका था , और समझौते के अनुसार मिशनरीज ने महात्मा अरविन्द गांधी की लगाम खींच ली ताकि मोदी साहेब पीएम बन सके, और मोदी साहेब ने भी पीएम बनने के बाद अब तक समझौते की किसी शर्त को भंग नही किया है, और लगातार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज के एजेंडे पर ही कार्य कर रहे है, मिशनरीज मोदी साहेब को कमजोर बनाने की तैयारी क्यों कर रही है ?
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मेरा अनुमान है कि, समर्थन देने के बावजूद मिशनरीज मोदी साहेब के 272+ से खुश नही है। उन्हें मोदी साहेब से कोई दिक्कत नही है। लेकिन उन्हें काबू में बनाये रखना जरुरी है। इसीलिए उनके पर कतरे जा रहे है। मिशनरीज कभी नही चाहेंगी कि 2019 में मोदी साहेब फिर से 272+ सीटें लेकर आये। हालांकी मोदी साहेब ने पीएम बनने के बाद से अपने वोट घटाएं ही है, बढाए नही है। लेकिन मिशनरीज उन्हें 200 से 220 सीटों तक ही सीमित रखना चाहेंगी। ताकि मोदी साहेब पूरी तरह उनके पंजे में रहे।
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इसी सिलसिले में आरक्षण, दलित, अगड़े, पिछड़े मुद्दो को उठाया जा रहा है। मोदी साहेब का मुख्य वोट बैंक हिन्दू है। और इस वोट बैंक बनाये रखने व बढ़ाने के लिए वे 'हिन्दुओ का राजनैतिक करण' और ध्रुवीकरण की रणनीति का इस्तेमाल करते है। लेकिन आरक्षण के मुद्दे में 'हिन्दू वोट बैंक' में गहरी दरार डालने की ताकत है। गुजरात में हार्दिक पटेल पनप चुके है, हरियाणा में जाट उठ गये है और राजस्थान में गुर्जरो के अलावा अब राजपूत भी आरक्षण की मांग कर रहे है। तीनो राज्यों में राज्य सरकारे बीजेपी की है, और तीनो राज्यों में आरक्षण को बीजेपी सरकारों ने बुरी तरह से संभाला है, तथा केंद्र में मोदी साहेब के होने से वे भी दोषी है। रोहित वेमुल्ला का मुद्दा भी दलितो से जुड़ा हुआ है, और कन्हैया ने रिहा होने के बाद नया एलान यह किया है कि, 'तुम कितने रोहित मारोगे, हर घर से रोहित निकलेगा'।
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दरअसल, यह सब कांग्रेस का वोट बैंक है जो अब अलग अलग समूहों में लामबंद हो रहा है, क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व के संकट से जूझ रही है, और राहुल के नेतृत्व में उसके फिर से उभरने की कोई संभावना नही है। लेकिन बीजेपी का विपक्ष तेजी से मजबूत हो रहा है। दिल्ली और बिहार मोदी साहेब गवां चुके है, और पंजाब का भी हाथ से जाना तय है। बीजेपी के लिए आखिरी उम्मीद यूपी बची है। लेकिन तब भी 2019 तक आते आते मोदी साहेब अपने सबसे मजबूत 'हिन्दू' वोट बैंक और सबसे ताकतवर 'उत्तरी हिन्दी पट्टी' पर अपनी पकड़ खो चुके होंगे।
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वैसे मेरे अनुमान में मोदी साहेब यदि चतुर राजनेता है (और निश्चित रूप से वे है) तो वो खुद भी चाहेंगे कि 2019 में प्रधानमन्त्री तो वे ही रहे लेकिन उनकी सीटें घटकर 220-230 के आस पास आ जाएँ !!! क्यों ?
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दरअसल अब तक मोदी भक्तो को इस बात का ही सहारा है कि 'बीजेपी को राज्य सभा में बहुमत नही है'। लेकिन तब भी कई कार्यकर्ता इस तथ्य से वाकिफ है कि यह बीजेपी द्वारा गढ़ा गया एक झूठा बहाना है, और संयुक्त अधिवेशन बुलाकर मोदी साहेब जिन भी कानूनो को पास करना चाहते है, उन्हें पास कर सकते है। बीजेपी द्वारा किये गए वादो को पूरा नही करने के बचाव में राज्य सभा में बहुमत न होने का हवाला देने के सिवा मोदी साहेब के पास बचने का अन्य कोई बहाना नही है। यह साफ़ है कि चाहे मोदी मोदी साहेब को राज्य सभा में बहुमत मिल जाए, तब भी वे उन वादो को कभी भी पूरा नही कर सकेंगे जो वादे बीजेपी पिछले 20 सालो से करती आयी है। क्योंकि देश की व्यवस्था को सुधारने के सभी क़ानून मिशनरीज/बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंडे के खिलाफ पड़ते है। जाहिर है मोदी साहेब मिशनरीज के खिलाफ जाने का साहस कभी नही दिखा सकेंगे या नही दिखाना चाहेंगे।
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इस लिहाज से वाजपेयी फायदे में रहे, और गठबंधन सरकार चलाने का हवाला देकर क्लीन चिट ले निकले। मोदी साहेब का चेहरा अब तक 'राज्य सभा में बहुमत नही होने के बहाने' ने ही बचाये रखा है। यदि उनके पास राज्य सभा में पूर्ण बहुमत होता तो अब तक मुलम्मा उतर चुका होता।
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तो मोदी साहेब भी अगले कार्यकाल में गठबंधन सरकार ही चलाना चाहेंगे, ताकि उनका आभामंडल धूमिल नही पड़े। और मिशनरीज को भी उस स्थिति में अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहयोग कर रहे पीएम को किसी प्रकार के 'प्रतीकात्मक प्रतिरोध' का सामना नही करना पड़ेगा।
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समाधान ?
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१) हमें आरक्षण को गंभीरता से लेने से जरुरत है, लेकिन सभी पार्टियों ने इस मुद्दे पर ढुलमुल/दोहरे/अस्पष्ट मापदंड अपनाएँ हुए है । गंभीरता से मायने यह है कि राजनैतिक पार्टियों को आरक्षण पर अपना 'कानूनी' रूख स्पष्ट करना चाहिए। क़ानून ऐसा हो जिस पर दलित, अगड़े, पिछड़े आदि सभी सहमत हो। हमने ऐसा कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है जिसकी सहायता से दलितों की सहमति से आरक्षण को घटाकर 10% तक किया जा सकता है। खेद का विषय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां इस क़ानून का विरोध कर रही है। प्रस्तावित क़ानून का ड्राफ्ट निचे दिए गए लिंक में देखा जास सकता है।
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२) भारत का मिडिया बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर बुरी तरह से निर्भर है और पूरी तरह से उनके नियंत्रण में है। सभी राजनैतिक पार्टियों का संगठनात्मक ढांचा टूट चुका है, और सभी पार्टियां/नेता अपनी छवि बनाये रखने के लिए पेड मिडिया पर बुरी तरह से निर्भर है। अत: यह पेड मिडिया ही है जो नेताओ को को उठाता और गिराता है। यदि हमें आत्मनिर्भर पार्टियां और आजाद नेता चाहिए तो हमें इन्हें पेड मिडिया की निर्भरता से मुक्त करना होगा।
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भारत में स्वतंत्र मिडिया की स्थापना करने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण को कम करने के लिए हमने राईट टू रिकॉल दूरदर्शन का क़ानून प्रस्तावित किया है। इस क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने से दूरदर्शन सच्ची ख़बरें दिखायेगा और उसके प्रसारण के स्तर में सुधार होगा। ऐसा होने से निजी चैनलों को भी अपनी विश्वसनीयता बचाये रखने के लिए सच्ची ख़बरें दिखानी होगी वरना वे एक्सपोज़ होकर अपनी दर्शक संख्या खो देंगे। इन क़ानून ड्राफ्ट्स के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें --- https://web.facebook.com/notes/809761655808739
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यदि आप इन क़ानूनो का समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा अादेश भेजे कि इन्हें गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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