Pawan Jury BhilwaraRj
चौकीदार महोदय हमारे बैंको की हिस्सेदारी बेच रहे है।
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पहले बैंकिंग में विदेशी निवेश की सीमा को 100% तक बढ़ाओ, फिर सरकारी बैंको में जारी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए आवश्यक कानूनो का विरोध करो ताकि बैंको में घोटाले हो सके, और जब बैंक औद्योगिक समूहों के साथ मिली भगत करके लाखों करोड़ रूपये हजम कर जाए तो सरकारी बैंको को भी विदेशीयों को हवाले कर दो। और भारत के नागरिको को इस बारे पता न चले कि उनके बैंक बेचे जा रहे है, अत: इस खबर से ध्यान हटाने के लिए मिडिया कर्मियों को जेएनयू विवाद का 24 घंटे प्रसारण करो, और फिर भी यदि कुछ नागरिको तक यह जानकारी पहुँच जाए तो उन्हें कहो कि, 'ये बैंको की नीलामी नही बैंकिंग सुधार है' !!!
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http://indianexpress.com/article/business/banking-and-finance/govt-to-lower-stake-in-psu-banks-to-51/
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मोदी साहेब ने सरकारी बैंको में सरकारी हिस्सेदारी को 51% तक घटाने का फैसला किया है।
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प्राइवेट बैंक मुनाफ़ा कमाते है जबकि सरकारी बैंक घाटा दिखा रहे है। क्यों ? क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में अगर अधिकारी घपले करते है तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है जबकि सरकारी क्षेत्र में मिली भगत से रूपया खाया जाता है। बैंको की भी यही स्थिति है। भारत के बैंको के अध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर को नौकरी से निकालने का अधिकार बैंको के मालिको यानी भारत के नागरिको के पास नहीं है। अत: रिजर्व बैंक और बैंको के संचालक आदि औद्योगिक समूहों को मिली भगत से कर्जो/लोन की रेवड़ियां बांटते है। बड़े औद्योगिक समूहों को दिए गए बिना किसी जमानत के ये भारी भरकम लोन डूब जाते है, क्योंकि इनमे इन सभी का हिस्सा होता है। कुछ सालो बाद इन कर्जो को एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) अर्थात बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। न डिफाल्टरों पर कोई कार्यवाही न ही वसूली के कोई प्रयास।
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समाधान यह है कि रिजर्व बैंक गवर्नर और बैंको के अध्यक्षों को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया नागरिको को दी जाए। राईट टू रिकॉल और ज्यूरी सिस्टम कानूनो को लागू करके इस समस्या को हल किया जा सकता है। लेकिन इन कानूनो के आने से सरकारी बैंको की दशा सुधर जायेगी और सरकारों को इन्हे बेचने का मौका नहीं मिलेगा। रेल, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, परिवहन आदि सभी क्षेत्रो में इसी नीति का इस्तेमाल किया जाता है। पहले उन सभी कानूनो को लागू करने से इंकार करो जिससे सरकारी कम्पनियो में भ्रष्टाचार कम और कार्यकुशलता बढे। और बाद में जब इनकी कमर टूट जाए तो इन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के हवाले कर दो। साथ में यह भी कह दो कि हम 'सुधार' कर रहे है।
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इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियो को भारी मुनाफा होता है , और बदले में वे फैसले लेने वालो को मिडिया में सकारात्मक कवरेज दे देते है।
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पिछले 25 साल से सभी सरकार इसी नीति पर कार्य कर रही है , और मोदी साहेब भी उनसे अलग नही है। मनमोहन सिंह भी देश की सम्पत्तियो को सुधार के नाम पर बेच रहे थे, और अब मोदी साहेब भी वही कर रहे है। और केजरीवाल तो खुद ही चलती फिरती एफडीआई है।
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दरअसल सत्ता में 'शहजादा' हो या 'चौकीदार' या फिर 'महात्मा अरविन्द गांधी', सभी की मूल नीति एक ही है -- एफडीआई, एफडीआई और एफडीआई। और इनके अंध भगत अपनी पार्टियों की भक्ति से उसी तरह से बंधे हुए है जिस तरह से भीष्म पितामह हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधे हुए थे। तभी ये सभी अंध भगत सरकारी बैंको को बेच देने के फैसले का समर्थन कर रहे है।
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समाधान ?
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मेरा प्रस्ताव है कि -- बैंकिंग, रेल, रक्षा, संचार, ऊर्जा आदि महत्त्वपूर्ण विषयो में विदेशी निवेश की अनुमति नही दी जाए। तथा बैंको को घाटे से उबारने के लिए रिजर्व बैंक गवर्नर और बैंको के अध्यक्ष आदि पदो पर राइट टू रिकॉल क़ानून प्रक्रियाएं लागू की जाए। प्रस्तावित कानूनो के ड्राफ्ट निचे दिए गए लिंक पर देखे जा सकते है। यदि आप इन कानूनो को समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि, इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित किया जाए :
https://web.facebook.com/notes/809761655808739
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