Pawan Jury BhilwaraRj

मैंने अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजा है कि, सलमान खान को रिहा करने वाले और जल्लीकट्टू खेल पर बेन लगाने वाले जजो पर महाभियोग लगाया जाए। अयप्पा मंदिर में महिलाओ के प्रवेश को लेकर अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया है , अत: मैं इस विषय पर अभी इन्तजार करूँगा। लेकिन यदि जज महिलाओ के प्रवेश की अनुमति दे देते है तो मैं अमुक जज पर भी महाअभियोग लगाने की मांग करूँगा।
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इसके अलावा मैंने अपने सांसद को यह भी आदेश भेजे है कि भारत की निचली अदालतों समेत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाऐं लागू की जाए।
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कृपया इस तथ्य पर ध्यान दें कि, मोदी साहेब, सुब्रह्मनियम स्वामी, मोहन भागवत, बीजेपी-नेता, इनका प्रत्येक अंधभगत, प्रत्येक बीजेपी कार्यकर्ता, बीजेपी समर्थक, संघ का अंधसेवक और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का प्रत्येक कार्यकर्ता इन दोनों जजो पर महाअभियोग लगाने का विरोध कर रहा है। इनमे से एक भी व्यक्ति ने अब तक अपने सांसद को एसएमएस द्वारा यह आदेश नहीं भेजा है कि इन दोनों जजो पर महाअभियोग लगाकर इन्हें नौकरी से निकाल दिया जाए। इनकी फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर भी आप देख सकते है, वहाँ आपको ये इस तरह की कोई मांग करते दिखाई नहीं देंगे।
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असल में ये सभी उस तरह के 'कट्टर सेकुलर' है जिस तरह के कथित सेकुलर होने का आरोप ये अन्य पर लगाते है, एवं जो नागरिको को भ्रमित करके वोट खींचने के लिए हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़े घूम रहे है। यूं तो ये लोग 24 में से 26 घंटे ये हिन्दूत्व के नारे लगाते है, लेकिन जब कोई जज हिन्दू परम्परा वादी खेलो पर प्रतिबन्ध लगाता है, ताकी बैलो की कटवाई को प्रोत्साहन मिले तो ये ऐसे फैसले का समर्थन करने लगते है।
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इसलिए मेरे विचार में, सभी कार्यकर्ताओ को इस बात को समझना चाहिए कि, मोदी साहेब, उनके अंधभगत, बीजेपी नेता, उनके कार्यकर्ता, संघ और उनके अंधसेवक सिर्फ कागजी हिन्दू है। जब भी जल्लीकट्टू या सलमान खान जैसा कोई मामला सामने आता है तो ये फट जाते है।
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जल्लीकट्टू के मामले में तो यह साफ़ ही दिख रहा है कि मोदी साहेब ने जानबूझकर इस मामले को लटकाये रखा। सुप्रीम कोर्ट ने मई-2014 में जल्लीकट्टू को बेन कर दिया था, लेकिन मोदी साहेब ने इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने से साफ़ इंकार कर दिया। इस प्रकार वे इस मुद्दे को महीनो तक लटकाये बैठे रहे। और उत्सव नजदीक आने पर इस सम्बन्ध में सरकारी आदेश जारी कर दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट के जज ने अगले ही दिन रद्द कर दिया। कोई उनसे पूछे कि क्यों वे इस मामले को महीनो तक दबाये बैठे रहे। और अब मोदी भक्त दलील दे रहे है कि, वे अंतराष्ट्रीय राजनीति को साधने में व्यस्त है, और ऐसे विषयो के लिए उनके पास समय का अभाव है !!!
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मोदी साहेब को तमाम दुनिया में घूमने के बावजूद इतना अवकाश अवश्य रहा था कि वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबन्ध लगाने के आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए संसद से क़ानून पास कर सकते थे।
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लेकिन मोदी साहेब ने इसे लटकाये रखना मुनासिब समझा।
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मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाया जाना गलत था। लेकिन इस संभावना के मद्देनजर उनके फैसले पर संतोष किया जा सकता है कि ---जज को यह फैसला देने के लिए मिशनरीज़ द्वारा मोटी घूस देने के अलावा रिटायरमेंट के बाद मानवाधिकार आयोगों वगेरह में अच्छे पद पर नियुक्ति का आश्वासन भी दिया गया था। अत: इतने अच्छे ऑफर को इंकार करना किसी भी भ्रस्ट व्यक्ति के लिए सहज नही होता।
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लेकिन मोदी साहेब ने इस फैसले को रद्द करने के लिए क़ानून लाने से जो इंकार किया, वह गलत बात है। और भी ज्यादा गलत तुरत फुरत में वह सरकारी आदेश निकालना था, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया। सरकारी आदेश निकालने का वक्त चुनना चालाकी का द्योतक है। क्योंकि अंतिम क्षणों में डाले गए ऐसे सरकारी आदेश अनुपयुक्त है, और इनका खारिज हो जाना उचित प्रक्रिया के तहत माना जा सकता है।
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ये सब तो ठीक है, लेकिन इससे पहले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के मामले में भी मोदी साहेब सुप्रीम कोर्ट के जजो के सामने "पूरी तरह समर्पण" करके देश के करोडो नागरिको को शर्मिंदा कर चुके है। जब सुप्रीम कोर्ट के जजो ने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को रद्द कर दिया था तो , मोदी साहेब कॉलजियम के तहत जजो की नियुक्ति को यह कहकर इंकार कर सकते थे कि संसद ने कॉलजियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। तब जजो को पीछे हटना पड़ता, क्योंकि --- "प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति न्यायिक अवमानना से मुक्त है"। जजो के पास मोदी साहेब के खिलाफ करने को कानूनी तौर पर कुछ नहीं था। लेकिन मोदी साहेब जजो के सामने घुटनो पर आ गए।
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मोदी-अंधभगतो और संघ-अंधसेवको की रीढ़ भी चुइंगम से बनी हुयी है। क्योंकि जब मोदी साहेब ने संविधान में संशोधन करके कॉलिजियम लागू किया तो उनके अंधभक्त कॉलिजियम प्रणाली का विरोध और मोदी साहेब के न्यायिक आयोग का समर्थन कर रहे थे, लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को रद्द किया और मोदी साहेब सुप्रीम कोर्ट के जजो के आगे सरेंडर हो गए तो मोदी-अंधभगत और संघ-अंधसेवक फिर से कोलिजियम का समर्थन और न्यायिक आयोग का विरोध करने लगे। भगतो की स्थिति तो जो भी है, लेकिन देश के प्रधानमन्त्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को भ्रष्ट जजो से भयाक्रांत होकर इस प्रकार रेंगते देखना दुःखद है।
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कुल मिलाकर मेरा पॉइंट यह है कि --- कार्यकर्ताओ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि मोदी साहेब और परम पूज्य श्री मोहन भागवत टाइम वेस्ट करने की भारी भरकम मशीने है, जो देश और कार्यकर्ताओ का समय इफरात में व्यर्थ करती है। अत: कार्यकर्ताओ को इन भारी भरकम नेताओ का आँख मूंदकर समर्थन करने की जगह राईट टू रिकॉल जज, राईट टू रिकॉल पीएम, सीएम तथा ज्यूरी सिस्टम जैसे कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करवाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
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