Pawan Jury BhilwaraRj
मोदी-शासन में भारतीयों की सहिष्णुता बढ़ी है, न कि असहिष्णुता। असहिष्णुता बढ़ने के आरोप तथ्यों से परे है।
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सहिष्णुता - सहनशीलता, टॉलरेंस, सहने की शक्ति।
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कुछ तथ्यों का अवलोकन करने से मालूम होता है कि बहुसंख्य नागरिको में सहने की शक्ति यानी कि सहिष्णुता चमत्कारिक रूप से बढ़ गयी है।
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1. मांस, मटन, बकरे, बीफ
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देश में आग लगी हुयी थी। लोग मुट्ठियाँ भींचते और सरकार को कोसते नजर आते थे। पिंक रिवोल्यूशन के कारण देश में लोग खासे असहनशील हो गए थे। मोदी साहेब भी इस मांस के कारोबार से क्षुब्द थे। वे इतने असहनशील हो गए कि उन्होंने दर्जनो बार अपनी रैलियों में पिंक रिवोल्यूशन को 'शर्मनाक' बताया। भारत के ज्यादातर सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी इस विषय पर असहिष्णु हो गए थे। असहिष्णुता बढ़ती जा रही थी।
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सरकार पलटी, मोदी साहेब सत्ता में आये और सत्ता में आने के एक वर्ष के भीतर ही भारत द्वारा किये जाने वाले मांस के निर्यात में 60% की बढ़ोत्तरी हो चुकी है। लेकिन मोदी साहेब में और भारत के सनातनी कार्यकर्ताओ में सहिष्णुता की वृद्धि हुयी और उन्होंने इसे स्वीकार ही नहीं किया बल्कि सहर्ष सह भी लिया है।
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सहिष्णुता बढ़ी। असहिष्णुता घटी।
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2. गाय, गोबर, मंदिर, मठ
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रोज गाये कट रही थी, क़त्ल खानो को सब्सिडी दी जा रही थी, गायों के पंजीयन की व्यवस्था न होने और गौ-तस्करी के कारण लोग गुस्से में थे। राम मंदिर के लटकने के कारण लोगो में रोष था। मंदिरो को सरकारों द्वारा कब्जे में लिया जा रहा था। संतो और महंतो को बेतुके आरोप लगा कर जेलों में भेजा जा रहा था, और उन पर मिडिया ट्रायल की जा रही थी। ओह माय गॉड जैसी फिल्मे हिन्दू धर्म का मखौल उड़ा रही थी। हिन्दू वादी कार्यकर्ताओ से बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मोदी साहेब से भी नहीं हो रहा था। जनता और साहेब दोनों असहिष्णु हो गए थे।
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सब कुछ बदस्तूर जारी है। बल्कि बढ़ गया है। मोदी साहेब ने सत्ता में आकर कत्लखानों को दी जा रही सब्सिड़ी जारी रखी और कटवाई में काम आने वाली मशीनो पर से आयात शुल्क घटा दिया। मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं किया वहाँ तक तो ठीक है, लेकिन वे उससे भी आगे गए। उन्होंने तिरुपति के मंदिर में श्रधालुओ द्वारा चढ़ाया गया 2 टन सोना मंदिर से उठाकर सरकार के नियंत्रण में पहुंचा दिया और बाकि मंदिरो के स्वर्ण कोष कब्जाने के लिए 'गोल्ड बॉन्ड स्कीम' ले आये। राम मंदिर को राज्य सभा बहुमत से और धारा 370 को 370 सीटों से जोड़ दिया। ओह माय गॉड जैसी फिल्मो की कसर उन्होंने 'पीके' और 'सिंघम रिटर्न' फिल्मो के प्रमोशन से पूरी की।
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लेकिन सभी हिन्दू वादी सहिष्णु और कट्टर हिंदूवादी बेहद सहिष्णु बने रहे।
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3. टीवी, नंगई, लियोनी, एआइबी
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छोटे परदे पर बढ़ती अश्लीलता और मुख्य धारा में सन्नी की नंगई को परम्परावादी बिलकुल भी सहने को तैयार नहीं थे। मोदी साहेब तो खैर संघ की सांस्कृतिक परम्परा से आते है, अत: उनके लिए तो इस विषय पर असहिष्णु होना स्वाभाविक था।
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पिछले एक वर्ष में सन्नी प्राइम टाइम पर भी अपनी उत्तेजक मुद्राओ में निरोध बेचती नज़र आने लगी। टीवी पर अश्लीलता भी बढ़ी। लेकिन मोदी साहेब इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने अपने सहिष्णु दर्शको को 'ऑल इण्डिया बक##' भी उपलब्ध करवाया और प्रमुख समाचार पत्र/पत्रिका को लगातार इसके उस शीर्षक को प्रकाशित करने की अनुमति दी जिसे यहाँ नहीं लिखा गया है।
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इसे भी कट्टर परंपरा वादियों ने 'अब चलता है' के सिद्धांत पर सहिष्णुता से सहा।
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4. बांग्लादेशी घुसपैठ
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2 करोड़ मुस्लिम बांग्लादेशियों के अवैध रूप से भारत में आकर अड्डा बनाने से हमारी आंतरिक सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है, और ये हथियारशुदा घुसपैठिये पूर्वोत्तर को आंतरिक गृह युद्ध में धकेल सकते है, जिसकी हमें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है ---- ऐसा सभी राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का मानना था। मोदी साहेब भी इन घुसपैठियों को सह नहीं पाये और उन्होंने पूर्वोत्तर की रैलियों में लगभग दर्जन बार यह एलान किया कि '16 मई को घुसपैठियों को भारत छोड़ना होगा'
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अगले साल की 16 मई निकले 4 महीने निकल गए लेकिन घुसपैठिये नहीं गए। मोदी साहेब ने उनको भारत में रहने देने को सह लिया। भारत के उन तमाम असहिष्णु कार्यकर्ताओं ने भी इसे सह लिया और सहिष्णु हो गए। घुसपैठ जारी है।
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ज्यादातर राष्ट्रवादी कार्यकर्ता और मोदी साहेब इन मुस्लिम घुसपेठियों को पूरे संयम से सह रहे है।
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5. बलात्कार
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निर्भया काण्ड पर पूरा देश असहिष्णु हो कर सड़कों पर आ गया था, स्त्री सुरक्षा को लेकर जनता कोई भी समझौता करने को राजी नहीं थी। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर असहिष्णुता बिलकुल जायज है। एक साक्षात्कार में स्त्री सुरक्षा पर पूछे गए सवाल के जवाब में मोदी साहेब ने कहा था कि 'हमारे गुजरात में रात को 12 बजे महिलायें पूरे आभूषण पहन कर अकेली कहीं भी आ जा सकती है। बस इतने में समझ लीजिये कि क्या नहीं हो सकता'
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मोदी साहेब के कार्यकाल में निर्भया के बाद मीनाक्षी के साथ वही हादसा दोहराया गया, और पूरे देश में भी बलात्कार की घटनाएं उसी दर से जारी रही। पुलिस प्रशासन राज्यों के अधीन होने के बावजूद स्त्री सुरक्षा को लेकर संवेदनशील लोग मोदी साहेब के बयान के सन्दर्भ में यह उम्मीद कर रहे थे कि मोदी साहेब वाकई कुछ कर देंगे। लेकिन मोदी साहेब ने निर्भया काण्ड के मुख्य आरोपी (नाम जानने के लिए गूगल करें) को अगले महीने रिहा होने से रोकने के लिए अब तक कोई कानूनी कदम नहीं उठाया। जुवेनाइल एक्ट को '2012 से प्रभावी' बना कर ऐसा किया जा सकता था। नवम्बर आ चुका है, दिसंबर में बाल सुधार गृह से वह रिहा कर दिया जाएगा।
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मोदी साहेब और स्त्री सुरक्षा के एलान चलाने वाले सभी कार्यकर्ता सहिष्णु बने हुए है।
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6. पाकिस्तान
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असहिष्णुता इतनी बढ़ गयी थी कि मोदी साहेब को बेहद कठोर और निर्णायक लहजे में यह कहना पड़ा कि 'यह लव लेटर लिखना बंद होना चाहिए, पाकिस्तान से उस भाषा में बात करो जो भाषा उसे समझ आती है'। लोग और मोदी साहेब दोनों हैरान थे कि पाकिस्तान से बातचीत कैसे की जा रही है जबकि वह हमारे सैनिको के सिर काट कर लिए जा रहा है ? सभी असहिष्णु हो गए थे।
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मोदी साहेब ने शुरुआत ही नवाज को बुलाकर की। लेकिन पाकिस्तान ने सीमा पर गोलीबारी जारी रखी। तब मोदी साहेब ने नवाज साहेब को आमों की टोकरी भिजवा दी। गोलीबारी और बातचीत जारी रही। शायद मोदी साहेब के कार्यकाल में पाकिस्तान द्वारा की गयी गोलीबारी में मनमोहन के कार्यकाल के अंतिम वर्ष से ज्यादा सैनिक मारे गए है।
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लेकिन मोदी साहेब और ज्यादातर कार्यकर्ता सहिष्णु बने रहे।
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7. स्वदेशी
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विडिओ में साहेब एफडीआई के जो दुष्प्रभाव बता रहे है, उन्हें सुन कर कोई भी वाकई घबरा जाएगा। मोदी साहेब अपनी रैलियों में यह बताते घूम रहे थे कि 'एफडीआई आने से भारत की छोटी इकाइयां नष्ट हो जायेगी, लाखों लोगों का धंधा बंद हो जाएगा, करोडो बेरोजगार हो जाएंगे, विदेशी कम्पनियाँ हमारे छोटे उद्योगो को निगल जायेगी और इसे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। स्वदेशी उन्मुख कार्यकर्ता भी विदेशी कम्पनियो के बढ़ते प्रभाव से विचलित थे और इसे सह नहीं पा रहे थे।
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मोदी साहेब ने सत्ता में आकर खुलासा किया कि यदि इण्डिया को डवलप करना है तो एक मात्र रास्ता यही है कि विदेशी कम्पनियो को बुलाकर उन्हें भारत को डवलप करने को कहा जाए। विदेशी कंपनियों को ज़रा भी न सहने वाले कार्यकर्ताओ ने विदेशी कम्पनियो को आलिंगन करने के लिए अपनी बाहें फैला दी।
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अब मोदी साहेब और स्वदेशी कार्यकर्ता विदेशी निवेश के प्रति घोर सहिष्णु हो गए है।
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8. किसान
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गिरते भू जल स्तर, महंगा कर्ज, जीएम फसले, रासायनिक खाद, भुखमरी, मौसमी मार और महंगे शिक्षा चिकित्सा के बोझ से किसान आत्महत्या कर रहे थे, इससे कृषि कार्यकर्ता खासे असहिष्णु हो गए थे। मोदी साहेब ने भी कहा कि किसान देश का पालक है, और उसकी दुर्दशा बर्दाश्त नही की जा सकती।
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किसान उसी गति से झूल रहे है। मोदी साहेब ने 12 जीएम फसलो को फील्ड ट्रायल की अनुमति दी, कृषि में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया, 120 जीवन रक्षक दवाइयों को मूल्य नियंत्रित सूची से बाहर निकाला जिससे किसानो की दशा जस की तस बनी नहीं रहेगी बल्कि और भी बिगड़ेगी। अलबत्ता जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटकर 18% के आस पास रह गया है। मतलब भारत कृषि प्रधान देश नहीं रहा।
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सभी कृषि कार्यकर्ता इसे अनुशासन से सह रहे है।
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9. भ्रष्टाचार
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लोकपाल तो बहाना था, लोग तो भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर दिल्ली में इकट्ठे हुए थे। सभी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोग पीड़ित भी थे, और असहिष्णु होकर महात्मा अरविन्द गांधी और अन्ना के साथ हो लिए। ज्यादातर असहिष्णु लोगो ने केजरीवाल की जगह भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मोदी साहेब पर भरोसा दिखाया। मोदी साहेब भी लोगो में भ्रष्टाचार के प्रति बढ़ती असहिष्णुता से सहमत नजर आये।
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भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए अति आवश्यक राईट टू रिकॉल और ज्यूरी सिस्टम कानूनो को मोदी साहेब ने लागू करने से मना कर दिया। नतीजे में एमपी में व्यापम, राजस्थान में खनन घोटाले सामने आये और सभी विभागों में भ्रष्टाचार यथावत है।
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सरकार बदलते ही भ्रस्टाचार विरोधी कार्यकर्ता और मोदी साहेब भ्रष्टाचार के प्रति सहिष्णु हो गए।
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इसके अलावा ----
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रेल भाड़ा बढ़ा। साथ में कार्यकर्ताओ की सहिष्णुता भी बढ़ी।
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अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमते आधे से ज्यादा गिरी, लेकिन भारत में दाम 5% घटे। लोगो ने खामोशी से सहा।
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टमाटर, प्याज और दालें चढ़ गयी। लोग सह गए।
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पीडीपी से समझौता हो गया। लोग सहते गए।
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कोल इण्डिया, ओएनजीसी और एनएचपीसी के हिस्से बिक गए। इसे भी सहा।
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नेट न्युट्रिलिटी का दम घोट दिया गया। लोग घुट कर रह गए।
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सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों की हालत और खराब हुयी। लोगो ने बर्दाश्त किया।
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भारत ने बांग्लादेश के तट की 25 हजार वर्ग मील सीमा गवां दी। लोग चुप रहे।
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शी जिनपिंग हाई स्पीड ट्रेनों के कॉन्ट्रेक्ट और सेज लेने आये तो भारत की सीमा में सेना भी ले आए। लोगो ने संयम रखा।
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दत्तू ने साफ़ कर दिया कि 340 सांसदों और करोड़ो नागरिको के नेता की मेरे सामने कोई हैसियत नहीं है। लोग जहर का घूँट पी गए।
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बीबीसी ने निर्भया केस पर वृतचित्र बनाकर भारत की छवि खराब की, जिसे मोदी साहेब ने बेन किया। लेकिन बीबीसी ने इसका प्रसारण करके देश को ठेंगा दिखा दिया। ये भी सहा।
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मोदी साहेब ने पोर्न बेन के नाम पर जाने/अनजाने पोर्न का खासा प्रचार कर दिया। इसे भी बर्दाश्त किया गया।
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राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, साउथ ब्लॉक, के साथ साथ मोदी साहेब ने गूगल को न्यूक्लियर प्लांट व तीनों सेनाओं के हेडक्वाटर्स के थ्री डी व्यू लेने की अनुमति भी दे दी। तब भी कार्यकर्ताओ ने आवाज नहीं की।
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चीन ने पीओके में से 12 लाईन का हाई वे निकालने की योजना से भारत घिर गया। कार्यकर्ता खामोश रहे।
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पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर टैक्टिकल (छोटे) परमाणु बम बनाने शुरू किये, जबकि भारत ने अपना परमाणु कार्यक्रम हमेशा के लिए बंद कर दिया। पाक विरोधी कार्यकर्ताओ ने सहिष्णुता का प्रदर्शन किया।
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5000 रू टन के बाजार भाव वाले कोयले की खान को जिंदल 108 रू प्रति टन में ले उड़े। कार्यकर्ताओ ने सहिष्णुता बरती।
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महाशिवरात्रि पर मोदी साहेब अपनी संसदीय सीट काशी पहुँचने की जगह बेंगलोर में पादरियों को सम्मानित करने और उनके द्वारा भारत में किये जा रहे 'धर्मं प्रचार' के कार्यो की प्रशंशा करने पहुँच गए। बर्दाश्त किया।
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प्रशासनिक सेवाओं में हिन्दीभाषी प्रतिभागियों की कमर तोड़ने वाले पर्चे सी-सेट को जारी रखा गया। सभी हिन्दी वादी कार्यकर्ता संयमित रहे।
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काले धन की जननी मॉरीशस रुट चालू रहा। बाबा रामदेव और उनके कार्यकर्ता इस मुद्दे पर सहिष्णु हो गए।
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मथुरा में कृष्ण और काशी में विश्वनाथ देवालय को सभी विहिप, संघ और बीजेपी कार्यकर्ता सहिष्णु होने के चक्कर में भूल ही गए। कई तो इस मामले में इतने सहिष्णु हो गए है कि यह पढ़कर भी उन्हें यह याद नहीं आएगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि 'आपके प्लान से तो गंगा साफ़ होने में 200 वर्ष लग जाएंगे'। सरकार नया प्लान बना रही है। गंगा कार्यकर्ता इतने सहिष्णु हो गए कि उन्होंने उम्मीद ही छोड़ दी है।
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पुनश्च : कांग्रेस ने देश को 60* सालोँ तक लूटा है यह एक तथ्य है। लेकिन मोदी सरकार को अभी सिर्फ 18 महीने ही हुए है, यह भी एक तथ्य है। (* वैसे कांग्रेस ने देश को 55 -16 = 37 साल तक ही लूटा है)
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सिर्फ उन्ही मुद्दो को दर्ज किया गया है जिन मुद्दो पर भारत के कार्यकर्ताओ ने असहिष्णु होकर श्री मनमोहन सिंह की सरकार को हटाकर मोदी साहेब में भरोसा दिखाया था। किन्तु मोदी-शासन में भी वे समस्यांए जस की तस बनी हुयी है। अत: यह विवरण मोदी साहेब के अब तक के कार्यकाल की समीक्षा नहीं करता बल्कि विभिन्न सीगो के कार्यकर्ताओ में बढ़ती सहिष्णुता को दर्शाता है।
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समाधान ?
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नेता बदलने से होता नहीं कुछ। व्यवस्था बदलने के लिए कानूनो में बदलाव करना जरुरी है। इन समस्याओं के समाधान के प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट्स यहां देखें -- https://web.facebook.com/notes/pawan-kumar-jury/809761655808739
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