Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Pawan Jury BhilwaraRj:
हिन्दू धर्म के लगातार पिछड़ने का कारण दर्शन, उपदेश, ज्ञान, प्रवचन, मीमांसा, व्याख्या आदि के प्रसार का अभाव नहीं बल्कि धर्म को धारण करने वाले मंदिरो, आश्रमों, मठो आदि का कमजोर प्रशासन है।
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हर उस पद पर पाखण्ड और भ्रष्टाचार चला आएगा जिस पद को धारण करने वाले व्यक्ति के पास अधिकार एवं शक्तियां हो किन्तु उस पर अंकुश न हो। भारत के नेता, अधिकारी, जज आदि भ्रष्ट है क्योंकि उन पर उन नागरिको का अंकुश नहीं है, जिनकी सेवा करने के लिए उन्हें नियुक्त किया गया है। राईट टू रिकॉल इसी अंकुश की रचना करता है।
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भारत में संत/पुजारियों/पंडो ने बेहिसाब भ्रस्टाचार और परिवार वाद फैलाया, दान से प्राप्त जमीनो और सम्पत्तियों का संग्रहण कर उनका उपभोग किया, राजनीति से गठजोड़ बनाये और हिन्दू धर्म को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक कार्य पर्याप्त रूप से नहीं किये, क्योंकि हिन्दू मंदिरो, मठो, आश्रमों के प्रमुखों पर उन श्रधालुओ का कोई नियंत्रण नहीं रहा/है जिन श्रद्धालुओं ने उन्हें पोषित किया। इस प्रवृति के कारण अच्छे और निस्वार्थ संतो से हिन्दू धर्म वंचित होता चला गया और धर्म टूटा। यदि आप हिन्दू धर्म का उत्कर्ष चाहते है तो ग्रंथो की व्याख्या और मीमांसा पर शक्ति लगाने की जगह धर्म के आधारभूत स्तम्भो जैसे मंदिर, मठ, आश्रम आदि के प्रशासन को सुगठित करने के लिए आवश्यक कानूनो को लागू करने पर शक्ति लगाइये ताकि इन मंदिरो तथा इनके प्रमुखों द्वारा धारण की गयी संपत्ति का इस्तेमाल हिन्दू धर्म के सशक्तिकरण में किया जा सके।
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हिन्दू धर्म का आदर्श और दर्शन उत्क्रुष्ट है, किन्तु प्रशासकीय व्यवस्था में खोट है।
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उल्लेखनीय है कि सिक्ख धर्म सबसे मजबूती से इसीलिए टिका रहा क्योंकि उन्होंने गुरुद्वारा प्रमुखों और स्वर्ण मंदिर के ग्रंथियों को ईमानदार और धर्ममुखी बनाएँ रखने के लिए क़ानून प्रक्रियाएं लागू की। सिक्ख धर्मावलम्बियों द्वारा ही गुरुद्वारा प्रमुखों को चुना जाता था तथा भ्रष्ट आचरण करने पर साधारण सिक्ख नागरिको द्वारा मतदान करके नौकरी से निकाल दिया जाता था। आज भी सिक्ख धर्म एसजीपीसी अधिनियम 1925 द्वारा शासित है किन्तु अब यह कमजोर हो रहा है।
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ईसाई धर्म में पादरियों/बिशप आदि के कदाचार करने पर उन्हें दंड देने की शक्ति नागरिको के पास थी। इस ज्यूरी प्रणाली ने चर्च में पाखंड पनपने पर रोक लगाई। इस्लाम ने मस्जिदो के प्रबंधन के लिए 'नागरिको के एकत्रीकरण' द्वारा अपने इमामों और मौलवियो को नियंत्रित किया। इसके अलावा इस्लाम ने मौलवियों के लिए धर्म शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं आरम्भ की, इससे पोंगापंथ में कमी आयी। यही कारण है कि मस्जिदो, चर्चो और गुरुद्वारों ने प्राप्त किये गए दान का इस्तेमाल धर्म के प्रचार प्रसार में खर्च किया।
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किन्तु हिन्दू धर्म के मंदिरो/मठो आदि के प्रमुखों -- पण्डो, पुजारियों संतो आदि ने संपत्ति का संग्रहण किया और उसका उपयोग विलासिता में किया। क्योंकि उन पर हिन्दू धर्मावलम्बियों का कोई नियंत्रण नहीं था। न तो हिन्दू नागरिक उन्हें नियुक्त कर सकते थे न ही उन्हें पद से हटा सकते थे। इस तरह कपटी और पोंगे पंडितो ने धर्म क्षेत्र में अपनी जड़े जमा ली। नियुक्ति के लिए वंशवाद और गुरु प्रथा लागू होने के कारण योग्यता या चयन का आधार लुप्त हो गया और धार्मिक संस्थानों की क्षति हुयी।
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क्या हिन्दू धर्मावलम्बी किसी शंकराचार्य या किसी बड़े या छोटे मंदिर के महंत को मतदान की प्रक्रिया द्वारा नौकरी से निकाल सकते है, या उनके द्वारा किये गए कदाचार के बदले उन्हें दंड दे सकते है , या क्या उन्हें बहुमत द्वारा यह निर्देश दे सकते है कि अमुक दान का उपयोग धर्म के उत्कर्ष के लिए इस मद में किया जाए ???
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समाधान ?
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भारत के मंदिरो के प्रशासन को मजबूत बनाने और उनके प्रमुखों को नौकरी से निकालने का अधिकार हिन्दू धर्मावलम्बियों को देने के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट्स को भारत के राजपत्र में प्रकाशित करने का आदेश अपने सांसद को भेजे।
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट ----https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/834842886633949
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भारतीय संप्रदाय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट ----- https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/834846793300225
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