Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Pawan Jury BhilwaraRj:
सिक्ख मुग़लो और अफगानों को इसी लिए पराजित कर सके क्योंकि सिक्ख समुदाय के पास गुरुद्वारों के प्रमुख को चुनने की प्रक्रिया थी।
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इस प्रक्रिया को विधिवत रूप से एसजीपीसी एक्ट में दर्ज किया गया है। लेकिन अब यह प्रक्रिया लगातार कमजोर हो रही है !!! क्यों ?
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इसका एक कारण यह है कि ----- स्थानीय गुरुद्वारों के प्रमुख स्वर्ण मंदिर के प्रमुख को चुनते है। चुनाव की यह अप्रत्यक्ष प्रणाली गुरुद्वारा प्रमुखों के बीच भ्रष्टाचार और गठजोड़ को पोषित करती है। और इसी गठजोड़ का इस्तेमाल एसजीपीसी की राजनीति को साधने में किया जाता है। इस समस्या का उपाय यह है कि, स्वर्ण मंदिर के प्रमुख की नियुक्ति प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा की जानी चाहिए। स्थानीय गुरुद्वारों के प्रमुख और स्वर्ण मंदिर का प्रमुख, दोनों ही आम सिक्ख नागरिको द्वारा सीधे चुनकर आने चाहिए।
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(एक सुझाव यह है कि --- स्वर्ण मंदिर की मतदाता सूची को फ्रिज कर दिया जाना चाहिए। ऐसा होने से स्वर्ण मंदिर प्रमुख के चुनाव में सिर्फ पहले से दर्ज सिक्ख ही वोट कर सकेंगे, नवागुन्तक सिक्ख नहीं। यह रवैया अलगाववादी प्रतीत हो सकता है, किन्तु सिक्ख धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने और इसके विस्तार के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है। क्योंकि यदि नए सिक्खो को स्वर्ण मंदिर प्रमुख के चुनाव में मताधिकार दिया गया तो इससे मौजूदा और नवागुन्तक सिक्खों में टकराव बढ़ सकता है)
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इसके अलावा, पूर्वकाल में गाँव के सिक्ख धर्मावलम्बियों के पास भ्रष्ट गरुद्वारा प्रमुख को नौकरी से निकालने की अनौपचारिक प्रक्रिया थी।
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लेकिन अब एसजीपीसी एक्ट में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है !!! अत: आज एसजीपीसी एक्ट आम सिक्ख धर्मावलम्बियों को भ्रष्ट गुरुद्वारा प्रमुखों को रिकॉल करने या नौकरी से निकालने की कोई प्रक्रिया उपलब्ध नहीं कराता है।
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इससे मंदिरो (गरुद्वारो) के प्रमुख नियंत्रण से बाहर होते जा रहे है और यह सिक्खो को कमजोर बना रहा है। समाधान ? सिक्खो और सभी भारतीयों को एसजीपीसी एक्ट में रिकॉल प्रक्रिया जोड़ने के लिए प्रयास करने चाहिए।
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महात्मा भगत सिंह के गुरु महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल ने 1925 में कहा था की "रिकॉल प्रक्रियाओं के अभाव में चुनावी प्रक्रियाएं एक मज़ाक बन कर रह जायेगी"। यह उन्होंने भारत के सन्दर्भ में कहा था, लेकिन यह शर्त एसजीपीसी पर भी लागू होती है।
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