Pawan Jury BhilwaraRj
सिर्फ संघ के स्वयं सेवको के लिए :
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राष्ट्रवादी हिंदूवादी मित्रो,
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हाल ही में सरसंघ संचालक परम पूज्य मोहन जी भागवत ने बयान दिया है कि 'हिन्दु धर्म में व्याप्त उन मान्यताओ और परम्पराओ का त्याग कर दिया जाना चाहिए, जो "वैज्ञानिक" नहीं है"।
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इस बयान में स्पष्टीकरण न होने के कारण कुछ असमंजस बना हुआ है, अत: संघ के सुधि स्वयं सेवक इस बारे में ऑफिसियलि स्टेण्ड प्रस्तुत करे।
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१. कुछ लोगो द्वारा इसका यह अर्थ बताया जा रहा है, कि भागवत ने चूँकि हिन्दू धर्म के अवैज्ञानिक होने पर चिंता जाहिर की है अत: भागवत जी यह बात मानते है कि इस्लाम और ईसाई धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक है।
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२. कुछ स्वयं सेवको का मानना है कि भागवत का इशारा शिवलिंग पर जल आदि बहाने जैसी अवैज्ञानिक परम्पराओ का त्याग करने से है।
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३. कुछ स्वयं सेवक कह रहे है कि, मूर्ती पूजा पूरी तरह से अवैज्ञानिक है, अत: हमें मानव सेवा का आश्रय लेना चाहिए और प्रतिमाओ की पूजा नहीं करनी चाहिए।
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४. कुछ स्वयं सेवक बता रहे है कि भागवत का मंतव्य मृतकों का तर्पण आदि करने वाली घोर अवैज्ञानिक क्रियाओ से है, जिनका त्याग कर दिया जाना चाहिए।
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भागवत साहेब के अमुक उपदेश के बाद इस प्रकार के कई अर्थ संघ के स्वयं सेवक निकाल भी रहे है, और लोगो को समझा भी रहे है। इससे धर्म की हानि हो रही है।
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५. कुछ राम मंदिर वादियों का मानना है कि भागवत कल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के एवज में अयोध्या में श्री राम के जन्म के वैज्ञानिक और भौतिक सबूत भी मांग सकते है। उसी सन्दर्भ में यह बयान दिया गया है।
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जैसा कि भागवत जी ने कहा, विज्ञान को आधार बनाने पर उपरोक्त सभी परम्पराए अवैज्ञानिक प्रतीत होती है। अत: क्या भागवत इस प्रकार की सभी परम्पराओ को त्याग देने का उपदेश दे रहे है जिनकी कोई उपयोगिता भौतिक तौर पर सत्यापित नहीं की जा सकती ?
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यहां मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भागवत ने हिन्दू धर्म से सम्बंधित कुरीतियों या अंध विश्वासो की और इशारा नहीं किया है बल्कि उन्होंने उन परम्पराओ का त्याग करने को कहा है जो कि भौतिक रूप से अवैज्ञानिक और अनुपयोगी है।
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'उदाहरण के लिए घृत से हवन करने से धूम्र की भेदक शक्ति बढ़ती है और वायु शुद्ध होकर जलवृष्टि की संभावना में वृद्धि हो जाती है। अत: हवन करने का वैज्ञानिक आधार भी है। इसी तरह ऋतु विशेष में दूध में विजातिय तत्वों का आधिक्य रहने से सावन में दूध अस्वास्थ्यकर माना गया है, अत: इसका सेवन न कर के भोलेनाथ को अर्पित करने का भौतिक और वैज्ञानिक आधार है। किन्तु शिवलिंग पर जल बहाना और यह धारण करना कि इससे शिव जी शीतल होकर वर दे देंगे, या जिनका अंतिम संस्कार हो गया हो उनके तर्पण के लिए गंगा आदि जा कर डुबकियां लगाना, आदि क्रियाए अवैज्ञानिक है और इनका तत्व से कोई सरोकार नहीं' ऐसा कई स्वयं सेवको का मत है।
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लेकिन ये सब अनाधिकृत प्रतिक्रियाए है, और भगवत भक्ति की जगह भागवत भक्ति के वश में होकर कही गयी प्रतीत होती है। अत: जागरूक स्वयं सेवको से अनुरोध है कि हिन्दू धर्म में व्याप्त उन अवैज्ञानिक मान्यताओ की सूची सौपें जो कि अवैज्ञानिक है। क्योंकि इतना तो तय है कि हिन्दू धर्म में काफी कुछ अवैज्ञानिक है, तब ही तो परम पूज्य भागवत ने इस प्रपंच पर बयान देना जरूरी समझा।
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मेरा रूख है कि विज्ञान को धर्म की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए। विज्ञान भौतिक है, धर्म आध्यात्मिक। विज्ञान लौकिक है, धर्म पारलौकिक। विज्ञान परिमित है, धर्म अनंत। सिर्फ धर्म की जानबूझकर निंदा करने, अवहेलना करने और खिल्ली उड़ाने के लिए ही विज्ञान का आश्रय लिया जाता है।
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