Pawan Jury BhilwaraRj

दीपावली के उपलक्ष्य में हम हर साल लाखो लीटर तेल घी व्यर्थ जला देते है। जबकि श्री राम चन्द्र के किसी समय मौजूद होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलता। एक बारगी भक्तो का दिल रखने के लिए यह मान भी लिया जाए कि राजा राम मौजूद थे, और अमावस को उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया था, तब भी उसके उपलक्ष्य में आधुनिक काल में दीप जलाने का कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि उस समय बिजली नहीं थी, लेकिन आज तो प्रकाश रात में भी मौजूद है। एक गरीब देश को ऐसे अवैज्ञानिक कुरीतियों पर इतना धन नही फूंकना चाहिए। और फिर आतिशबाजी भी तो है। शोर शराबे और वायु प्रदुषण के अलावा उनकी अन्य कोई उपयोगिता नहीं।
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कोई भी व्यक्ति जलते अग्नि-कुण्ड में बैठ कर जीवित कैसे रह सकता है। प्रहलाद से सम्बंधित विवरण वैज्ञानिक नहीं है। हम किस दिशा की और बढ़ रहे है ? ये अवैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि दिमागी दिवालियापन भी है। और व्यसन आदि करके होली पर चेहरे लाल पीले करके घूमने का क्या औचित्य है ? क्या कोई इसका वैज्ञानिक आधार मुझे बताएगा ?
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ईश्वर चेतन स्वरुप है, अत: जड़ में निवास नहीं कर सकता। फिर भी पढ़े लिखे विवेकवान पुरुष मंदिरो में सुसज्जित पत्थर की मूर्तियों के आगे लौटते नजर आते है। घोर अवैज्ञानिक।
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रूद्राक्ष शिव के आंसू है !!! है कोई वैज्ञानिक आधार ? शिवलिंग पर दूध चढाने से दूध मलिन होकर नष्ट हो जाता है। यह बात कोई बच्चा भी बता सकता है।
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'तर्पण करने से पूर्वजो को मोक्ष मिलता है, और पञ्चग्रास कव्वे को खिलाने से पितरो को इस अन्न की प्राप्ति होती है'। जिस देश में ऐसी अवैज्ञानिक सोच वाले अंधविश्वासी निवास करते है, उस देश का कोई भविष्य नहीं। और गंडे-ताबीज, माला, मुहूर्त आदि बलाएँ लोग अलग से देह पर धारण करके डोलते है।
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आधी से ज्यादा आबादी को घी सूंघने को नहीं मिल रहा, और कुछ अंध-श्रद्धालु इसे हवन के नाम पर अग्नि में जला दे रहे है। देखा नहीं जाता।
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मैं नहीं। भागवत उवाच
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संघ के सरसंघ संचालक मोहन जी भागवत द्वारा 'हिन्दू धर्म में व्याप्त अवैज्ञानिक परम्पराओ को त्यागने की सलाह'
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सभी संघ के सेवक (जो कि खुद को स्वयं सेवक कहते है) ने इन सभी अवैज्ञानिक परम्पराओ को त्यागने का संकल्प लिया है। तथा वे अन्य हिन्दू धर्मावलम्बियों को भी कन्विंस कर रहे है कि वे उपरोक्त कुरूतियों को त्याग दे।
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संघ को और अच्छे से समझने और इस बारे में अधिक जानकारी के लिए शाखा जाए।
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