Pawan Jury BhilwaraRj
वन रेंक वन पेंशन मुद्दा आरक्षण की तरह संक्रामक हो सकता है !!!
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आप इसे माने या न माने, पर 'वन रेंक वन पेंशन' (OROP) लागू होने का सबसे अधिक श्रेय पेड मिडिया को दिया जाना चाहिए।
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मौजूदा हालात में मैं 'वन रेंक वन पेंशन' का समर्थन करता हूँ। बीजेपी ने 'वन रेंक वन पेंशन' देने का वादा किया था और पूरे देश ने उन्हें वोट किया, अत: बीजेपी के पास निकलने का कोई उपाय नहीं। इसलिए हमें भी नैतिक आधार पर 'वन रेंक वन पेंशन' का विरोध नहीं करना चाहिए। विरोध तब ही जायज है जब सरकार पलट जाए।
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पेड मिडिया ने 'वन रेंक वन पेंशन' को अच्छा खासा कवरेज दिया जिससे बिहार चुनावो के दौरान बीजेपी के नेताओ के सामने वोट गंवाने का खतरा पैदा हो गया था। यह सबसे बड़ा कारण था कि मोदी साहेब जल्दी 'वन रेंक वन पेंशन' लागू करने को मजबूर हुए। मैं 'वन रेंक वन पेंशन' के मुद्दे को फॉलो नहीं कर रहा था, न हीं ऐसा किसी के लिए किया जाना सम्भव है कि वह सभी मुद्दो का अनुसरण करे।
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लेकिन इस फैसले ने सभी सरकारी कर्मचारियों के 'वन रेंक वन पेंशन' की मांग करने का खतरा बढ़ा दिया है। केंद्रीय कर्मचारी जैसे रेल्वे, पोस्ट ऑफिस आदि और राज्य सरकारों के कर्मचारी संगठनो जैसे पुलिस बलों आदि द्वारा भी अब 'वन रेंक वन पेंशन' की मांग की जा सकती है। यहां तक कि पंचायत और नगर परिषद के कर्मचारी भी 'वन रेंक वन पेंशन' की मांग कर सकते है।
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इसलिए यह जरुरी है कि हम इस मुद्दे पर एक निश्चित सीमा रेखा खींच ले।
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मेरा मत है कि 'वन रेंक वन पेंशन' सिर्फ सेना, बीएसएफ तथा अन्य सैनिक संगठनो (जैसे असम राइफल्स) तक ही सिमित रखी जानी चाहिए, तथा अन्य सरकारी कर्मचारियों को इस से अलग रखा जाना चाहिये। पुलिस बलों को भी। इसके अलावा मेरा प्रस्ताव है कि सेना में की जा रही नयी भर्तियों में भी 'वन रेंक वन पेंशन' लागू नही की जानी चाहिए।
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उदाहरण के लिए, जैसा कि वादा किया गया है, सभी सेवारत तथा सेवानिवृत सैनिको को 'वन रेंक वन पेंशन' योजना में शामिल किया जाना चाहिए, किन्तु उन सैनिको को 'वन रेंक वन पेंशन' योजना से बाहर रखा जाना चाहिए जो आने वाले दिनों में सेना में भर्ती होने वाले है। और ऐसा करने में कोई अनैतिकता नहीं है।
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स्पष्टीकरण ---- क्या मौजूदा पीढ़ी को आने वाली अजन्मी पीढ़ी के लिए कोई वादा करना चाहिए ?
मेरा जवाब है -- नहीं
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मौजूदा पीढ़ी को कोई अधिकार नहीं है कि वे आने वाली पीढ़ी की तरफ से कोई वादा करे या उन पर कोई जाया भार डाल दे। यही कारण है कि मैं निजी ऋण का विरोध नहीं करता किन्तु सरकार द्वारा लिए जा रहे कर्जो का विरोध करता हूँ। क्योंकि जब किसी निजी व्यक्ति द्वारा ऋण लिया जाता है तो उसकी मृत्यु के साथ ही उसके ऋण का लेख जोखा समाप्त जो जाता है, किन्तु सरकार द्वारा लिया गये ऋण के लिए आने वाली पीढ़िया भी उत्तरदायी होती है।
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समाधान
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हमें ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें मुद्रा स्फीति की दर कम से कम रहे। ऐसी स्थिति में 30% अनिवार्य बचत क़ानून द्वारा अच्छी खासी सेवानिवृत सुरक्षा हासिल की जा सकती है। इसके अलावा रिटायरमेंट के बाद व्यक्तियों को कम जिम्मेदारी का कार्य कम वेतन पर दिया जा सकता है। ऐसी कई नौकरियां है जिनमे बहुत काम शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, तथा वरिष्ठ नागरिक उन्हें आसानी से कर सकते है।
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कुल मिलाकर इस समस्या का समाधान अन्य युक्तियुक्त कानूनो और व्यवस्थाओ में देखना चाहिए, सिर्फ एक 'वन रेंक वन पेंशन' के माध्यम से इस समस्या को हम हल करने की जगह और बढ़ा देंगे। इसलिए मेरे विचार में--- जो हो चुका वह हो चुका, किन्तु अब हमें आगे और 'वन रेंक वन पेंशन' का दायरा नहीं बढ़ाना चाहिए।
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