Pawan Jury BhilwaraRj
Vipul Prakash Rrg:
कौन कहता है किसानो की समस्या का समाधान संभव नहीं?
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हमारे देश के कु बुद्धिजीवी जिनमे वकील ,अर्थशास्त्री, नेता, प्रोफ़ेसर तथा बिकाऊ मीडिया वाले पत्रकार तथा नौकरशाह दिन रात हमे यह बताते रहते हैं कि किसानों की समस्या का समाधान संभव नहीं क्योंकि कानून अंग्रेज़ों वाले हैं। सरकार इस बहाने से एक बेहद घटिया भूमि अधिग्रहण बिल लाने वाली थी कि देश के औद्योगिकरण के लिए भूमि अधिग्रहण अनिवार्य है। मगर विपक्ष के भारी विरोध के बाद उसने बोल दिया कि अब राज्यों को स्वतंत्रता होगी कि वो अपना नियम बना सकें। मगर सवाल यह उठता है कि क्या राज्य जो नियम बनाएंगे वो किसानों के प्रति न्यायपूर्ण होंगे?अन्ना, केजरीवाल शिवसेना इस बिल का चिल्ला चिल्ला के विरोध कर रहे थे मगर इस तरह का कोई कानून प्रस्तावित नहीं कर रहे थे जिससे कि बिना किसान की भूमि छीने अथवा कम से कम किसानों की भूमि अधिग्रहण करके तथा उसके बदले किसानो को सही हरजाना देकर भी देश का औद्योगीकरण किया जा सके। किसानो की आत्महत्या के विरुद्ध चिल्ला रहे हैं मगर ऐसा कोई कानून नहीं प्रस्तावित नहीं कर रहे जिससे यह सब बंद हो। स्पष्ट रूप से यह एक नूरा कुश्ती का खेल है जिसमे बिकाऊ मीडिया बराबर का भागीदार है.राईट टू रिकॉल ग्रूप ने ऐसे बहुत से कानूनों का ड्राफ़्ट तैय्यार किया है जो कि अगर राजपत्र में छपवा दिये गये तो किसानो की समस्या बहुत हद तक हल हो सकती है। हम आज उन कानूनो से आपको अवगत कराते हैं।
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पहला ऐसा कानून है राईट टू रिकॉल ऐग्रीकल्चर मिनिस्टर- जिसके तहत कृषि मंत्री का चुनाव जनता करेगी और किसी भी दिन असंतोष हो तो बिना ५ साल प्रतीक्षा किये किसी दूसरे उम्मीदवार के पक्ष मे अपना वोट डालकर उसे कृषि मंत्री बना देगी.
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दूसरा कानून है राईट टू रिकॉल हेल्थ मिनिस्टर तथा एजूकेशन मिनिस्टर:- अगर गरीब किसानो के घर कोई बीमार पडे या उनके बच्चे उच्च शिक्षा के लिए जाएं तो उन्हे महंगे दामो के निजी हस्पतालों और शिक्षण संस्थानो मे जाना पडेगा। जिससे उन्हे कर्ज लेना पडेगा और न चुका पाना आत्महत्या अथवा धर्म परिवर्तन का कारण बनेगा। इन कानूनो के बनने से सरकारी हस्पताल तथा शिक्षण संस्थान उच्च कोटि की शिक्षा एवं चिकित्सा सस्ते दामो पे देंगे जिनके कारण आत्महत्या और धर्म परिवर्तन की समस्या हल होगी।
इन सारे मंत्रियों तथा अन्य बहुत से मंत्री जैसे मानव संसाधन एवं विकास, उद्योग मंत्री इत्यादि पे राईट टू रिकॉल के कानून का ड्राफ़्ट इस लिंक पर हिंदी में उपलब्ध है>>>>>tinyurl.com/rtrmantri
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तीसरा कानून है राईट टू रिकॉल प्रधानमंत्री:- जनता पी एम खुद चुनेगी और असंतुष्ट होने पर बिना ५ साल प्रतीक्षा किये किसी अन्य को पी एम बना देगी. इस कानून का ड्राफ़्ट हिंदी में इस लिंक पर है>>> tinyurl.com/rtrPradhanMantri
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चौथा कानून है -डी डी एम आर सी ए एम( डायरेक्ट डिपोसिट आफ़ मिनरल रॉयल्टी इन टू सिटीजन्स अकाऊंट ऐंड मिलीट्री) -
इस कानून के तहत भारत के खनिज संसाधनों से प्राप्त रॉयल्टी, सरकारी जमीनो को किराये पर लगाने से प्राप्त राशी इत्यादि का ३५% भारतीय सेना के लिये दे दिया जाएगा तथा बाकी का ६५% नागरिकों के खाते में जाएगा.चौथी दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस के राज में जो कोयला आबंटन का घोटाला हुआ था वो लगभग २६ लाख करोड रुपये का था। अब अगर सही ढंग से आबंटन होता और उससे २६ लाख करोड की रॉयल्टी मिल जाती, और उसका ६५% यानि कि १७ लाख करोड नागरिकों के खाते में आता तो १२५ करोड नागरिकों को प्रति नागरिक १३५०० रुपये होते। इसे १० सालों तक अगर हर नागरिक के खाते मे जमा करवाने से हर साल १३५० रुपये और हर महीने ११० रुपये की सहायता हर नागरिक को की जा सकती थी। उसी तरह २ जी, ३ जी, ४ जी स्पेक्ट्रम तथा इस वर्ष की कोयला खान आबंटन से प्राप्त रॉयल्टी और बहुत सी सरकारी जमीने घूस खाकर उद्योगपतियों को १ रुपये प्रति माह किराये पर दे दी जाती हैं उनसे सही किराया वसूला जाता और उसका ६५% भी नागरिकों के खाते मे गया होता तो कम से कम प्रति नागरिक ५०० रुपये प्रति मास मिलता और इससे किसानो को आर्थिक सहायता होती। अगर उनके घर ६ सदस्य हैं तो उन्हे ५००*६=३००० रुपये प्रति माह आ सकते थे. और उन्हे बहुत अधिक सहायता हो जाती। इस कानून का पूरा ड्राफ़्ट अत्यंत सरल इंग्लिश में इस लिंक पे उपलब्ध है. >>>>>>> tinyurl.com/DDMRCAM
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पांचवां ऐसा कानून है अदालतों में ज्यूरी सिस्टम :- हमारे देश के बहुत से किसान सूदखोरों से त्रस्त होकर आत्महत्या, धर्मपरिवर्तन अथवा नक्सलवाद का रास्ता अपना लेते हैं। इस समस्या से तभी छुटकारा मिलेगा जब सूदखोरों को कडी से कडी सजा मिले। इसके लिये आवश्यक है कि अदालतों मे ज्यूरी सिस्टम आए। ज्यूरी सिस्टम मे केस का फ़ैसला जज न करके वोटर लिस्ट मे से लॉटरी के द्वारा चुने गये १२-१५ लोग करते हैं। और हर केस मे अलग अलग लोग चुने जाते हैं। इसके कारण इस सिस्टम मे घूसखोरी नहीं चलती यह विश्व स्तर पर सिद्ध हो चुका है। और वो ज्यूरी सूदखोरी के आरोपी का सार्वजनिक रूप से नारको टेस्ट ले जिससे मामले की छानबीन मे अधिक से अधिक सबूत मिल सके जैसे कि सूदखोर ने जिन लोगों को अपना शिकार बनाया है उसका हिसाब किताब किस डायरी मे कहां छुपा रखा है इत्यादि। इससे सूदखोरों को सजा मिलेगी और सूदखोरी पे लगाम लगेगी.
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वर्तमान में हमारे देश में ऐसा नियम है कि नार्को टेस्ट लेने से पहले मुल्जिम की अनुमति जरूरी है जो कि अत्यंत हास्यास्पद है। और दूसरा हास्यास्पद् नियम है कि अनुमति देने के बाद उसने नारको टेस्ट मे जो कुछ बोला उसे सबूत माना जाये जो कि अमेरिका में भी नहीं माना जाता क्योंकि नारको टेस्ट वैज्ञानिक नहीं है । हां नारको टेस्ट से प्राप्त जानकारी को मामले की छानबीन मे इस्तेमाल करते हैं। जैसे कई बार अपराधी नारको टेस्ट के दौरान यह बता देता है कि उसने हथियार किस जगह छिपाया है। जिससे कि पुलिस हथियार बरामद कर लेती है और केस हल करने मे मदद मिल सकती है। उसी तरह एक सूदखोर यह बता सकता है कि बही खाता कहां है? एक स्विस बैंक अकाउंट धारी अपना अकाउंट नंबर बता सकता है इत्यादि। और यह नारको टेस्ट पब्लिक मे होना चाहिए ताकि किसी प्रकार की हेर फेर न हो।
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निचली अदालतों में ज्यूरी सिस्टम के कानून का ड्राफ़्ट हिंदी में इस लिंक पर उपलब्ध हैwww.tinyurl.com/JuryNichliCourt
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नारको टेस्ट के कानून का ड्राफ़्ट इस लिंक पर है>>>>http://tinyurl.com/NarcoTest
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सातवां कानून गन्ने की खेती करने वाले किसानो के लिये है। गन्ने की खेती करने वाले किसानो की समस्या इस बात से है कि चीनी मिल मालिक उन्हे पर्याप्त कीमत अदा नहीं करते। इसका कारण यह है कि चीनी मिलों की संख्या बहुत कम है। इस कारण मिल मालिकों की मनमानी चलती है। इसके लिये चीनी मिल लगाने की प्रक्रिया को लाईसेंस मुक्त किया जाए। ताकि बहुत से लोग मिल खोलें और किसानो के पास अधिक विकल्प उपलब्ध हों। अगर किसी की मिल से अधिक प्रदूषण फ़ैले उसी हालत मे उसके खिलाफ़ कार्र्वाई हो।
यह कानून इस लिंक पर है>>>https://tinyurl.com/DelicenseSugarGurMills
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अब बात करते हैं सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल के बारे में :
भाजपा/संघ/नमो के अंधभक्त पूरे सोशल मीडिया पे एक भ्रामक प्रचार कर रहे थे कि सरकार अधिग्रहित भूमि पर बाजार भाव का चौगुना मुआवज़ा देने वाली है. सच्चाई ये है कि २०१५ का अध्यादेश २०१३ के कानून का संशोधन मात्र है जिसमे पहले से ही चौगुना मुआवजा देने की बात थी। हां मेट्रो रेल, परमाणु ऊर्जा, विद्युत उत्पादन ,हाईवे इत्यादि 13 क्षेत्रों को इस मुआवजे के दायरे से बाहर रखा था।उन १३ क्षेत्रों को इस अध्यादेश नें इस ऐक्ट के द्वारा प्रस्तावित मुआव्ज़े के दायरे में लाया । मगर सबसे मजेदार बात यह है कि किसी भी जमीन का बाजार भाव किस तरीके से तय होगा?इसपर विस्तार से अगले लेख में लिखा जाएगा मगर २०१३ वाले ऐक्ट तथा इस सरकार के अध्यादेश का अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि कुल मिलाकर सरकारी मूल्य को ही बाजार भाव माना जाएगा और उसी का चौगुना मुआवजा दिया जाएगा जबकि जमीन की वास्तविक कीमत इस मुआवजे से भी कहीं अधिक रहेगी और जमीन के मालिक किसानो को घाटा लगेगा.और यह किसानो की परेशानी की मुख्य वजह है। इसका कारण और समाधान निम्नलिखित है>>>
1. हर कोई जानता है कि देश में काला धन जमीन के रूप मे जमा होता है चेक पेमेंट १ लाख और कैश पेमेंट ४ लाख।
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१ लाख रुपये पंजीकरण के समय दिखाया जाता है जो कि जमीन की सरकारी कीमत होती है और बाकी के चार लाख रुपये कैश मे दिये जाते हैं। जो कि काला धन होता है। और जमीन का बाजार भाव १ लाख + ४ लाख=५लाख
अगर वास्तव मे इसे काबू करना होता तो फ़्रांस की तरह जमीन की खरीद के समय बोली लगाने का कानून बनाते। यानि कि जमीन की रजिस्ट्री के तीन महीने तक जमीन खरीदन्रे वाले के पास न जाकर सरकार के पास रहती है। और सरकार पंजीकरण के समय दिखायी गयी कीमत के आधार पर बोली लगाती है और अगर कोई अधिक दाम मे खरीदने को तैय्यार हो जाए तो वास्तविक ग्राहक को पंजीकृत मूल्य+ २०% लाभ देकर जमीन बोली लगाने वाले को दे दी जाती है।यानि कि ५ लाख मे से १ लाख २० हजार वापस मिल जाएंगे और ३ लाख ८० हजार पानी मे गये। इससे यह फ़ायदा होता है कि कोई व्यक्ति टेबल के नीचे से कैश और टेबल के ऊपर चेक पेमेंट करके जमीन नहीं खरीदेगा। और हर कोई जितने मूल्य पे खरीदेगा उसका भुगतन चेक के जरिये क्रेगा और उसका पंजीकरण करेगा.और जब ऐसा होने लगेगा उसके बाद सरकारी भाव और बाजार भाव के बीच का अंतर खत्म होगा। और उस दिन चौगुना तो क्या दुगुना मुआवजा भी दिया जाए तब भी किसान फ़ायदा महसूस करेगा क्योंकि वह वास्तविक बाजार भाव का दुगुना होगा।
इस कानून का ड्राफ़्ट अत्यंत सरल अंग्रेजी में.>>>>>>>>http://tinyurl.com/ReduceCashInLandDeals3
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दूसरी बात यह कि भारत सरकार के बाद सबसे अधिक जमीन चर्च के पास है। जिसपे कोई टैक्स नहीं लगता है. जबकि यू एस ए में जमीन पर सम्पत्ति कर लगाया जाता है। जिसके कारण कोई जमीन खरीद कर उसे डम्प नहीं करता है। या तो उसपर उत्पादन का कार्य शुरु करता है अथवा उसे बेच देता है। जिसके कारण जमीने दिन पे दिन महंगी नहीं होती जाती जैसे भारत में होती जा रही हैं। किस नागरिक के पास कितनी जमीन है इसका आंकडा सरकार की वेबसाईट पर सार्वजनिक करो। और जमीन पर मार्केट वैल्यू का १% प्रतिवर्ष संपत्ति कर लगाओ ताकि भ्रष्ट लोग खुद बडी बडी जमीने खरीदकर अपने नौकरों के नाम पर न दिखा सकें और जमीनो को डम्प भी न कर सकें और जिन्होने बडि बडी जमीने काले धन से खरीदकर खाली छोड रखी है वो या तो उसे रोजगर के लिए उपयोग करें अथ्वा सस्ते दामो मे बेचना शुरु कर दें ताकि फ़ैक्ट्री लगाने के लिए किसानों की जमीन हथियाने की जरूरत न पडे.इस कानून का विस्तृत ड्राफ़्ट अत्यंत सरल इंग्लिश में इस लिंक पर दिया है>>>http://tinyurl.com/WealthTaxIndia
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इस कानून के आने से जमीनो का दाम १० गुना कम हो जाएगा। और जनता पे वैट जैसे फ़ालतू टैक्स लगाने की जरूरत नही रहेगीतथा किसानो की भूमि हडपने की आवश्यकता बहुत कम हो जाएगी क्योकि जिन भ्रष्ट लोगो ने बडे बडे भूभाग खरीदकर डम्प कर रखे हैं वो टैक्स के डर से उसे सस्ते दामो पे बेचने लगेंगे.
इस कानून के निम्नलिखित फ़ायदे होंगे
१। संपत्ति के अनुपात में कर लगेगा। और वैट, जी एस टी, एक्साईज़ जैसे फ़ालतू टैक्स की जरूरत नहीं पडेगी.
२। रोजगार के अवसर बढेंगे औद्योगिक विकास होगा.
३। जमीनो की कीमत में १० गुनी कमी आ जाएगी.
४। भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नगण्य होगी.
५। ब्लैक मनी को जमीन के रूप में डम्प न कर सकने के कारण काले धन पे रोक लगेगी.
इस कानून का ड्राफ़्ट अत्यंत सरल अंग्रेजी में इस लिंक पर है>>>>>>>>> http://tinyurl.com/WealthTaxIndia
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राईट टू रिकॉल ग्रूप ने सरकारी भूमि अधिग्रहण बिल के विकल्प मे अपना भूमि अधिग्रहण बिल भी प्रस्तावित किया है जिसका ड्राफ़्ट मात्र ६ पेज का है और अत्यंत सरल भाषा में है। यह सरकारी कानून से बहुत उत्तम है। हरेक बिंदु पर सरकारी ड्राफ़्ट से तुलना के लिये एक दूसरा लेख लिखना पडेगा। मगर जिज्ञासु पाठक इस लिंक पे जाकर इस प्रस्तावित कानून का ड्राफ़्ट पढ सकते हैं तथा उसकी तुलना सरकार के कानून के ड्राफ़्ट से कर के गुण दोषों का निर्णय कर सकते हैं। >>>>>>tinyurl.com/FairLandAcquisition
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राईट टू रिकॉल ग्रूप नें तीन लाईन का एक कानून प्रस्तावित किया है जिसका नाम है ट्रांस्पेरेंट कम्प्लेंट फ़ाईलिंग प्रोसीज़र अथवा टी सी पी। जिसके तहत कोई भी नागरिक अपनी कोई भी बात कलक्टर के दफ़्तर में जाकर, २० रुपये प्रति पेज देकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखवा सकता है। जिसे पूरा देश बिना लाग इन किये हुए पारदर्शी रूप से देख सकता है। और देश का कोई भी नागरिक पटवारी के दफ़्तर जाकर ३ रुपये देकर उसके समर्थन में हां अथवा नहीं दर्ज करवा सकता है.
इस कानून के निम्न फ़ायदे हैं:-
१। देश का कोई भी नागरिक/ पढा लिखा किसान इत्यादि भी कोई अच्छा और फ़ायदेमंद कानून प्रस्तावित करके पी एम की वेबसाईट पे डलवा देगा और अन्य नागरिक अथवा किसान भी उसका समर्थन कर सकेंगे जिससे कि सरकार पे उस कानून को राजपत्र में छापने का दबाव बनेगा
२। बहुत से साहसी लोग/ विसिल ब्लोवर/आर टी आई ऐक्टिविस्ट किसी भी चीज की शिकायत दर्ज कराते हैं उनकी जान को खतरा रहता है क़्योंकि उन्होने जो शिकायत दर्ज कराई उसे पूरा देश नहीं जानता है और इस बात का फ़ायदा उठाकर उन्हे मरवा भी दिया जाता है। इस कानून के आने के बाद ऐसा संभव न होगा क्योंकि हर शिकायत को शिकायत दर्ज करने वाले की नाम एवं वोटर आई डी नअम्बर के साथ पूरा देश देखेगा। और जरूरी मुद्दों पर लोगों की एकता बनाने मे भी इससे मदद मिलेगी क्योंकि वर्तमान में हम कोई भी मांग उठाते हैं तो हमें पता ही नहीं होता कि कौन कौन हमारे साथ है.
यह कानून इस लिंक पर है>>>>tinyurl.com/teenlinekanoon
सभी पाठकगण से निवेदन है कि कि ऊपर दिये गये लिंक्स पे जाकर उपर्युक्त कानूनों के ड्राफ़्ट का अध्ययन करें.अगर इनमे से कोई भी कानून आपको पसंद है तो उसका ड्राफ़्ट सहित प्रचार जनता के बीच करें और अपने सांसद और विधायक पर इन कानूनों को राजपत्र में छपवाने का दबाव बनवाएं क़्योंकि कोई भी पार्टी अथवा नेता इन कानूनों का समर्थन नही करता है। जबतक जनता इन कानूनो को पास कराने का दबाव नहीं बनाएगी तबतक कोई पार्टी अथ्वा कोई नेता उसका उद्धार नहीं करने वाला है.