Pawan Jury BhilwaraRj

कितने शरीफ लोग थे.. सब खुल कर आ गए ।
.
व्यापम की व्यापकता की सीबीआई जांच !!!
.
घोटाले के दौरान (2008-2012) व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) को नियंत्रित करने वाला स्वास्थ्य शिक्षा विभाग शिवराज सिंह के पास ही था।
.
2008 में 42, 2009 में 85, 2010 में 90, 2011 में 98, 2012 में 286 और 2013 में 439 मेडिकल दाखिले रद्द करने पड़े।
.
2008 में शिवराज की भांजी रितु चौहान एमपीपीएससी की परीक्षा पास कर डिप्टी कलेक्टर बनी, कोंग्रेस के मुद्दा उठाने पर शिवराज ने कोंग्रेस से कहा कि राजनीति में परिवार को घसीटना अच्छी बात नही।
.
कोपियों को 10 साल तक सुरक्षित रखने के नियम में शिवराज ने बदलाव करके 3 महीने किया और रितु की कोपियाँ कानूनी रूप से नष्ट कर दी गयी।
.
साधना सिंह : शिवराज की पत्नी के पैतृक जिले गोंदिया से 17 लोगो की भर्तियाँ मध्यप्रदेश के फर्जी पते बताकर की गयी। मामला दर्ज, ये भर्तियाँ रद्द। साधना पर आरोप, परन्तु पूछताछ नही।
.
रामनरेश यादव : वनकर्मियो की भर्तियो में घूस लेने के आरोपी। मामला दर्ज। हाईकोर्ट ने राज्यपाल के संवेधानिक पद को ध्यान में रखते हुए एफआईआर खारिज की।
ज्ञातव्य है कि मोदी साहेब ने कुर्सी संभालते ही यूपीए के अधिकतर राज्यपालों को बदल दिया था, किन्तु दागी यादव को पद पर बनाए रखा गया।
.
प्रेम चन्द्र प्रसाद : शिवराज के निजी सचिव अपनी बेटी को फर्जी तरीके से प्रवेश दिलाने के आरोपी। अभी जमानत पर है।
.
लक्ष्मीकांत शर्मा : शिवराज के तकनिकी शिक्षा मंत्री आरोपी है। अभी जेल में।
.
गुलाब एस किरार : अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सदस्य एवं शिवराज के करीबी। बेटे को फर्जी तरीके से पीएमटी पास कराने का आरोप।
.
धनराज यादव : राज्यपाल के ओएसडी पर बड़े पैमाने पर अयोग्य उम्मीदवारों से घूस लेकर नौकरियां दिलवाने का आरोप। अभी जेल में है।
.
नितिन मोहिन्द्रा : व्यापम के सिस्टम एनालिस्ट ने कम्पूटर सिस्टम में गड़बड़ी कर अंक तालिकाओ में हेर फेर किया। फिलहाल जेल में।
.
विनोद भंडारी : अरबिंदो इन्सट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस के चेयरमेन पर भारी गड़बड़झाले के आरोप। अभी जेल में।
.
आर के शिवहरे : डीआईजी शिवहरे ने अपनी बेटी और दामाद को फर्जी तरीके से मेडिकल परीक्षा में पास कराया और पुलिस भर्तियो में भी पैसे खाए। जेल में है।
.
ओम प्रकाश शुक्ला : शिक्षा मंत्री के ओएसडी आरोपी है। अभी जेल में है।
.
सुधीर शर्मा : शिक्षा मंत्री के निजी सचिव आरोपी है। अभी जेल में।
.
पंकज त्रिवेदी : परीक्षा नियंत्रक,तकनिकी रूप से घोटाले का मास्टर माइंड। अभी जेल में।
.
2009 से ही इस घोटाले की जांच भी चल रही है, और घोटाला भी चल रहा है। पहले जांच पुलिस के हाथ थी, जो रेंगते हुए क्राइम ब्रांच और एसटीऍफ़ के पास पहुंची। जांच की रफ़्तार सुस्त है जबकि घोटाले की चुस्त। 1800 लोग अब तक कुल गिरफ्तार किये जा चुके है जबकि मामलो से जुड़े हुए 26 लोगो की हत्या हो चुकी है।
.
अब ये जांच सीबीआई के देवताओं को सौपीं जा रही है और जनता को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि सीबीआई एक ईमानदार एवं स्वतंत्र एजेंसी है अत: निष्पक्ष जांच होगी। जबकि हकीकत यह है कि व्यापम का सबसे बड़ा घोटाला मोदी साहेब के निर्देशन में अब शुरू होगा।
.
कितना भी बड़ा घोटालो हो वह अंततोगत्वा कोर्ट और सीबीआई के बीहड़ में जाकर गुम हो जाता है। पेड मिडिया और नेता लगातार इस आशय का हल्ला मचाये रखते है कि सीबीआई से 'निष्पक्ष' जांच होनी चाहिए, ताकि लोगो में सीबीआई की इमानदारी का भभका बना रहे। जबकि सीबीआई की व्यवस्था में ऐसा कोई कारण मौजूद नही है जिससे सीबीआई में नियुक्ति के साथ ही अधिकारी ईमानदारी से काम करने की कसम खा लेते हो। और बिलकुल यही नियम भारत की अदालतों पर भी लागू होता है।
.
1. सीबीआई : कोर्ट ने जब कहा था कि सीबीआई सरकारी तोता है तो पूरे देश ने मिनिट से पहले मान लिया था। लेकिन सच्चाई यह है कि तब से अब तक सीबीआई की नियुक्ति और संगठन में किसी प्रकार का बदलाव नही हुआ है। तब तोता मनमोहन के लिए काम करता था अब मोदी के लिए करता है। शिवराज ने जैसी जांच क्राइम ब्रांच और एसटीऍफ़ तोतो से करवाई वेसी ही जांच अब मोदी साहेब अपने सीबीआई के तोते से करवाने वाले है। मोदी और शिवराज में समझौता हो जाता है तो शिवराज की खाल उधड़ने से बच जायेगी वरना मोदी साहेब सीबीआई का सहारा लेकर मध्यप्रदेश का निजाम बदल देंगे।
.
ज्ञातव्य है कि शिवराज और वसुंधरा ताकतवर क्षत्रप है और अपने चेहरे पर चुनाव जीत कर आये है और आते है। लेकिन आगे से ऐसा न हो मोदी साहेब यह सुनिश्चित करना चाहते है। उन्हें सभी राज्यों में खट्टर और फड़नवीस जैसे लिजलिजे नेता चाहिए, जिनकी डोरियाँ उनके हाथ में हो।
.
इस बात पर विचार कीजिये कि यदि आप किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखते है, तो क्या यह सम्भव है कि वह आपके पडौसी के इशारे पर कार्य करे। समस्या यह है कि सीबीआई प्रमुख को नौकरी पर रखने और निकालने का अधिकार प्रधानमन्त्री के पास है अत: वह प्रधानमन्त्री के हितो के लिए ही काम करेगा इस बात को मोदी-सोनिया-केजरीवाल के अंध-भगतो के अलावा कोई भी सामान्य बुद्धि का व्यक्ति समझ सकता है। अंध-भगतो की नाड़ियो में भक्ति की कोकीन बहने के कारण वे गहरी मूर्छा में जीवन जीते है, अत: उनसे इस बात को समझने की उम्मीद करके हम खुद उनसे के साथ ही ज्यादती कर रहे है।
.
समाधान : यदि हम चाहते है कि सीबीआई जनता के हितो के लिये कार्य करे तो, सीबीआई प्रमुख को नौकरी पर रखने और निकालने का अधिकार करोड़ो मतदाताओं के पास होना चाहिए। अन्य कोई उपाय नही। राईट टू रिकाल सीबीआई प्रमुख के कानूनी ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित करवाकर ये व्यवस्था भारत में लागू की जा सकती है। राईट टू रिकाल ग्रुप ने इसके लिए कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। जिसके गेजेट में छपने से देश के करोड़ो नागरिक मतदान का प्रयोग करते हुए सीबीआई प्रमुख को चुनेंगे और उसके भ्रष्ट आचरण करने पर किसी भी समय वोटिंग का प्रयोग करते हुए बहुमत से उसे पद से हटा देंगे।
.
ये व्यवस्था आने से सीबीआई नेताओं के चंगुल से आजाद हो जायेगी और निष्पक्ष रूप से कार्य करेगी।
.
इसको इस तरह समझिये कि राजकीय घोटालो को नेता और अधिकारी ही अंजाम दे सकते है, कोई साधारण नागरिक तो उस व्यवस्था का हिस्सा ही नही है, तो घोटाला कैसे करेगा। मतलब नेता और अधिकारी जो घोटाला करते है, उसकी जांच भी वही नेता उन्ही अधिकारियों से करवा देते है। जिसे फंसाना होता है उसे फंसा देते है और जो रूपये दे देता है उसे छोड़कर लिपा-पोती कर देते है। कनिष्ठ लोग उलझ जाते है और सरगना बच निकलते है। इस तरह से सबसे बड़ा घोटाला तो तब शुरू होता है जब किसी घोटाले की जांच शुरू होती है। जितना बड़ा घोटाला उतनी बड़ी जांच एजेंसी। जितनी बड़ी जांच एजेंसी उतना ही बड़ा जांच घोटाला। पूरा सर्कस है।
.
अब व्यापम में मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्री आदि बीजेपी के है, जबकि आरोपी अधिकारी आदि उनके अपने आदमी है, जांच करने वाली सीबीआई मोदी और राजनाथ को रिपोर्ट करेगी, ये भी बीजेपी के है। सीधा हिसाब यह बना कि बीजेपी के नेताओं ने अपने ख़ास आदमियों के साथ घोटाला किया और 7 साल तक खुद की 'जांच' खुद ही करवाते रहे। अब बवाल थम नही रहा तो बीजेपी के ही वरिष्ठ नेता अपने नेताओं और अधिकारियों की 'निष्पक्ष जांच' करवाएंगे। जब कोंग्रेस अपने घोटालो की जांच खुद करती थी तो बीजेपी के दिल में हूक उठती थी, अब जब बीजेपी खुद बीजेपी के घोटालो की जांच कर रही है तो कोंग्रेस के दिल में हूक उठ रही है। और केजरीवाल की माने तो ज्योही कोई व्यक्ति जनलोकपाल पद की शपथ लेगा उस दिन शपथ लेते लेते ही पूरा भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा जैसे दिल्ली का भ्रष्टाचार टीवी विज्ञापनों को देखने से लगता है कि ख़त्म हो चुका है।
.
मोदी-भगतो का मानना है कि सीबीआई सोनिया के कंट्रोल में नही होनी चाहिए, सोनिया-भगतो का मानना है कि सीबीआई मोदी के कंट्रोल में नही होनी चाहिए, जबकि केजरीवाल-भगतो का मानना है कि सीबीआई जनलोकपाल के कंट्रोल में और जनलोकपाल केजरीवाल के कंट्रोल में होना चाहिए। इन सभी नेताओं ने बहुत समझकर इस बात पर सहमती बनायी है कि सीबीआई को कम से कम जनता के कंट्रोल में तो नही ही होना चाहिए। और इन नेताओं के भगत भी इस बात पर सहमत हो गए है।
.
अब यह जनता* को तय करना है कि वे सीबीआई किसके कंट्रोल में चाहते है।

*जनता शब्द में नेताओं के भगत शामिल नही है। क्योंकि उन ने अपने नेताओं की अंधभक्ति के वश में होकर पाला बदल लिया है। अत: वे जनता को अधिकार दिए जाने का विरोध करते है। उनका मानना है कि जो जनता उनके नेता को चुनती है वह जनता चुनाव ख़त्म होते ही लकवे की चपेट में आ जानी चाहिए, ताकि फिजूल के अधिकार मांग कर उनके नेता को डिस्टर्ब नही करे।
.
इनका बस चले तो ये ऐसे प्रस्ताव का भी समर्थन करेंगे जिसके तहत वोट डालकर मतदान कक्ष के बाहर आते ही प्रत्येक मतदाता को ऐसी दवाई सुंघा देनी चाहिए जिससे व्यक्ति 5 साल तक कोमा में चला जाए। 5 साल बाद स्ट्रेचर पर डाल कर उन्हें मतदान कक्ष तक लाना चाहिए और होश में आते ही वोट डलवाकर फिर से दवाई सुंघा देनी चाहिए ताकि इनके नेता 5 साल तक निर्विघ्न रूप से 'विकास' या विकास के नाम पर जो भी करना चाहे कर सके। व्यापम और राईट टू रिकाल सीबीआई प्रमुख किस खेत की मूली है यह किसी को भनक ही नही लगेगी।
.
सीबीआई जांच का हश्र
.
सीबीआई की टीम शिवराज के खिलाफ सबूत जुटा कर वर्षो तक शिवराज के दरवाजे पर खड़ी रहेगी। यदि शिवराज मोदी के अंगूठे के नीचे आना स्वीकार कर लेते है तो शिवराज बचे रहेंगे वरना मौका देखकर मोदी उन्हें फंसा लेंगे और मुख्यमंत्री की कुर्सी से उन्हें रूखसत करके खुद का चमचा बिठा देंगे। यदि शिवराज उनका चमचा बन जाते है तो मोदी कुछ दया दिखा सकते है, जिसके लिए वो कम ही जाने जाते है। उल्लेखनीय है कि मोदी के प्रधानमन्त्री के उम्मीदवार की घोषणा तक शिवराज ही उनके प्रतिद्वंदी के तौर पर नंबर दो की हैसियत से उभर रहे थे, और आगे भी उन्हें शिवराज से खतरा रहने वाला है। क्योंकि गोधरा और टोपी न पहनने के स्वांग को निकाल दें तो शिवराज के खाते में हर लिहाज से मोदी से ज्यादा उपलब्धियां दर्ज है।
.
यदि आप मानते है कि शिवराज भ्रष्ट है तो उन्हें कुर्सी से हटा देना चाहिए तो आपकी यह मांग गैर वाजिब है। क्योंकि सभी राज्यों में कुंडली जमाएं बैठे ऐसे शिवराजो की छत्र छाया में ऐसे कितने ही व्यापम पनप रहे है किन्तु राष्ट्रीय मिडिया मामला वही उठाता है जिसे उठाने के लिए उसे भुगतान किया जाता है।
.
2008 से चल रहे व्यापम तथा इन जैसे घोटालो की खबर परम पूज्य मोहन भागवत को भी है और मोदी साहेब को भी। पर चूंकि शिवराज के पंखो का फैलाव बढ़ता जा रहा है अत: सीबीआई की कैंची से उनके पर कतरे जा रहे है।
.
बात सिर्फ सीबीआई की ही नही है, भारत की कोई भी जांच एजेंसी स्वतंत्र नही है। यहाँ तक कि पुलिस भी खुले तौर पर गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है। पुलिस, सीआईडी, क्राइम ब्रांच, एसटीऍफ़, ईडी आदि सभी के अधिकारियों की नियुक्ति और निलम्बन का अधिकार सरकार के पास है, जनता का इन पर कोई नियंत्रण नही। इसलिए सभी प्रकार के घोटालो और भ्रष्टाचार की जांच में से कोई ठोस नतीजा नही निकलता अगर इनमे आला दर्जे के नेता और अधिकारी शामिल है।
.
भारत की जनता के पास अपने नेताओं को भी 5 साल से पहले नौकरी से निकालने का अधिकार नही है। इसलिए एक बार चुन लिए जाने के बाद नेता अपनी मनमर्जी से शासन चलाते हैं क्योंकि वे जानते है कि वे खुद कुछ भी कर ले पर जनता के पास धरने अनशन प्रदर्शन ज्ञापन नारे आदि लगाने के सिवा कोई चारा नही है, इसलिए वे जजों को गाँठ लेते है और अधिकारियों से गठजोड़ बना कर खूब घोटाले करते है।
.
इसका समाधान प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को प्रजा अधीन करके किया जा सकता है। अमेरिका की पुलिस भारत की पुलिस से ज्यादा ईमानदार और कार्यकुशल इसलिए नही है कि वहां नियुक्ति के साथ ही पुलिस प्रमुख को ईमानदारी की दवाई पिला दी जाती है, बल्कि इसलिए है क्योंकि वहां के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार है। ऐसा होने से पुलिस प्रमुख भ्रष्ट आचरण नही करता और प्रजा के हितो के लिए कार्य करता है। जबकि भारत में यह अधिकार नेताओं के पास होने के कारण भारतीय पुलिस नेताओं के लिए काम करती है।
.
यदि हमें छोटे से बड़े स्तर का भ्रष्टाचार दूर करना है तो घोटालेबाजो द्वारा ही खुद के घोटालो की जांच करने के सिस्टम को बदलना पड़ेगा। इसके लिए हमें सभी मुख्य पदों पर राईट टू रिकाल कानूनों की जरुरत है। राईट टू रिकाल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित इन कानूनों के ड्राफ्ट कमेन्ट बॉक्स में देखें।
.
सोनिया-मोदी-केजरीवाल तीनो का संयुक्त रूप से यह मानना है कि जनता के पास सिर्फ नेताओं को चुनने का अधिकार होना चाहिए हटाने का नही। यह उल्लेखनीय नही है कि इनके अंध-भगत भी इस मामले में इनके साथ है, क्योंकि यह अंध-भगतो की बर्दाश्त से बाहर है कि अधिकार इनके नेताओं के हाथ से निकल कर जनता के हाथ में जाएँ।
.
2. कोर्ट : भारत में एक अलिखित क़ानून यह है कि अपने अपने क्षेत्र की सभी शीर्ष संस्थाएं स्वत: ही ईमानदार होती है, और कोर्ट तो कानूनी तौर पर ईमानदार है। सीबीआई आरोपी को जेल में पहुंचाने के लिए सबूत भर जुटा सकती है, लेकिन अन्य मुकदमो की तरह व्यापम का अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में बैठे भगवान् ही करेंगे। सुप्रीम कोर्ट में बैठे बौद्धिक जीवो की नश्वर देह को दरकिनार करें तो वे किसी भी नजरिये से भगवान् से कम नही है। भगवान् की तरह इनके फैसले की भी कहीं अपील नही है। ये इस वन के अगाध सिंह है। इनके द्वारा दिए गए फैसले की अपील तो छोड़ो आलोचना और निंदा भी नही की जा सकती। जिस तरह भगवान् की निंदा करने वाले को पाप लगता है उसी तरह इनकी अधिकृत निंदा करने वाले को भी अवमानना के जुर्म में जेल लग सकती है।
.
व्यापम के व्हिसिल्ब्लोअर प्रशांत पांडेय का दावा है कि 'व्यापम के मास्टरमाइंड नितिन मोहेंद्रा से जब्त असली एक्सेल शीट में 48 जगह मुख्यमंत्री का नाम लिखा हुआ था, लेकिन एसटीऍफ़ तक पहुँचने से पहले ही इंदोर क्राइम ब्रांच ने एक्सेल शीट से छेड़छाड़ कर मुख्यमंत्री की जगह उमा भारती, राज्यपाल और अन्य मंत्रियो के नाम लिख दिए'।
पांडेय ने असली एक्सेल शीट को बेंगलुरू की प्रतिष्ठित 'ट्रुथ लेब' से सत्यापित करवाकर अदालत को सौप दी है।
.
पांडेय ने पूर्व में भी आरोपी सुधीर सिंह और शिवराज की पत्नी साधना सिंह के बीच हुयी SMS वार्ता का ब्यौरा जारी किया था, जिसमें साधना प्रतियोगियों के नाम फारवर्ड कर रही है। किन्तु एसटीऍफ़ के तोते ने उन्हें यह कह कर सबूत मानने से इनकार कर दिया कि 'SMS गलत तरीके से हासिल किये गए है'।
.
अब यह जजों के हाथ में है कि किसे सबूत माने और किसे खारिज कर दें या किस रफ़्तार से मुकदमें की सुनवाई करे।
.
लेकिन यहाँ भी वही समस्या है जो सीबीआई और हमारे अन्य नेताओं के साथ है। भारत के नागरिको के पास जजों को न तो चुनने का अधिकार है न ही नौकरी से निकालने का। असल में हमारे जज निरंकुश है जिन्हें शालीन भाषा में स्वतंत्र कहा जाता है। यदि कोई स्वतंत्र है तो निरंकुश होने उसकी इच्छा पर निर्भर है। जंगल के शेर को आप क्या कहेंगे ? शेर खुद को स्वतंत्र कहता है किन्तु अन्य जानवर उसे निरंकुश मानते है। लेकिन हम जंगल में नही रह रहे है, अत: किसी को भी शेर की तरह स्वतंत्र नही किया जा सकता, चाहे वह जज ही क्यों न हो।
.
न्यायपालिका भारत की सर्वोच्च शक्ति है, क्योंकि उनके पास प्रधानमंत्री को भी दंड देने का अधिकार है इसलिए न्यायपालिका को अनिवार्य रूप से प्रजा के अधीन होना चाहिए। अमेरिका में जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार वहां के आम नागरिको के पास है और वे वोटिंग से बहुमत द्वारा किसी भी समय भ्रष्ट जज को पद से हटा सकते है, इसलिए वहां के जज नौकरी जाने के भय से प्रजा के हित में ईमानदारी से कार्य करते है या नौकरी से हाथ धोते है।
.
लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नही होने से जज उसी के हक में फैसला देंगे जो उन्हें रुपया देगा या अन्य किसी तरह से लाभ पहुंचाएगा। अब आप इसे न्याय माने या अन्याय लेकिन कहना आपको न्याय ही पड़ेगा, वरना आप अदालत की अवमानना की लपेट में आ सकते है।
.
समाधान : इस समस्या के निपटान के लिए हमें राईट टू रिकाल जज के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाने की जरुरत है, ताकि जजों पर जनता का अंकुश रहे। हमने इसके लिए कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है जिसे आप कमेन्ट बॉक्स में देख सकते है।
.
सोनिया-मोदी-केजरीवाल और सभी न्यायधीश इस बात पर सहमत हो गए है कि जनता के पास जजों को चुनने और नौकरी से निकालने का अधिकार नही होना चाहिए वरना भूचाल आ सकता है। इनके अंध-भगतो ने भी इस भूचाल को टालने के लिए अपने नेताओं का समर्थन और जजों को चुनने और नौकरी से निकालने के अधिकार जनता को दिए जाने का विरोध करना तय किया है ।
.
3. ज्यूरी ट्रायल : न्याय करने की दो प्रणालियां है। एक जज सिस्टम है जिसमे दंड देने की शक्ति मुट्ठी भर न्यायधिशो के पास होती है, तथा दूसरी ज्यूरी प्रथा है जिसमे मुकदमे की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जाती है तथा यही नागरिक फैसला सुनाते है।
.
अमेरिका और ब्रिटेन में मुकदमो का फैसला देने की शक्ति वहां के आम नागरिको के पास है। ज्यूरी प्रथा में हर मुकदमे के लिए अलग से 12-15 नागरिको का चयन मतदाता सूची में से किया जाता है, और यही ज्यूरी मुकदमे का फैसला करती है। ज्यूरी प्रथा में जज-नेता-वकील गठजोड़ टूट जाता है और त्वरित गति से निष्पक्ष न्याय मिलता है। जज सिस्टम सिर्फ भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद को बढ़ावा देता है, अत: हम भारत में ज्यूरी सिस्टम को लागू करने की मांग कर रहे है। प्रस्तावित ज्यूरी सिस्टम का ड्राफ्ट कमेन्ट बॉक्स में देखें।
.
व्यापम घोटाले के लिए हमारा प्रस्ताव है कि मध्य प्रदेश की मतदाता सूचियों में से रेंडमली 1500 नागरिको का चयन करके ज्यूरी बुलाई जानी चाहिए। नागरिको की यह ज्यूरी इस मुकदमे की सुनवाई करे ताकि व्यापम के दोषियों को निष्पक्ष रूप से जल्दी से जल्दी सजा दी जा सके।
.
4. नार्को टेस्ट : यदि नागरिको की ज्यूरी द्वारा इस मुक़दमे की सुनवाई की जाती है, तो सबसे बड़ा टर्निग पॉइंट नार्को टेस्ट होगा। नार्को टेस्ट मे व्यक्ति को सोडियम पेन्थेनोल नामक रसायन का इंजेक्शन दिया जाता है। इस रसायन के प्रभाव से व्यक्ति अर्द्ध-मूर्च्छा की स्थिति में चला जाता है, जिससे झूठ बोलने या सोच समझकर भ्रमित करने वाले उत्तर देने की उसके दिमाग की क्षमता ख़त्म हो जाती है, और वह तोते की तरह पूछे गए सभी सवालों के सीधे और सच्चे जवाब देने लगता है।
.
ऐसे विशाल घोटाले में जिसमें पूरा सियासी और प्रशासनिक कुनबा आपस में मिल बैठ कर घोटाला कर रहा हो, की जड़ तक पहुंचना आसान नही है। सिर्फ नार्को टेस्ट ही ऐसे गठजोड़ को खोद कर निकाल सकता है। हालांकि नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए बयान को अदालत में सबूत नही माना जाता किन्तु नार्को टेस्ट से व्यक्ति न चाहते हुए भी इतनी सूचनाएं उगल देता है कि उन सूचनाओं का पीछा कर के सबूत जुटाए जा सकते है।
.
उदाहरण के लिए किसी हत्या के आरोपी से नार्को टेस्ट के दौरान यह पूछा जा सकता है कि, 'तुमने हत्या में प्रयुक्त हथियार को कहाँ छिपाया है'? इसके जवाब में आरोपी न चाहते हुए भी वह स्थान बता देगा जहां उसने हथियार छुपाया है। तब जांच दल उसकी निशानदेही के आधार पर अमुक हथियार जब्त करके अदालत में बतौर सबूत पेश कर सकता है।
.
कई लोग 'लाई डिक्टेटर' और नार्को टेस्ट को एक ही तरह के टेस्ट मानने की भूल कर बैठते है, जो कि गलत बात है। लाई डिक्टेटर टेस्ट के दौरान पूरी तरह होश में रहता है और उसे कोई दवा नही दी जाती। सिर्फ पूछताछ के दौरान उसके रक्तचाप और ह्रदय के धडकने आदि की गति को मापा जाता है। मशीन सिर्फ यह बता 'सकती' है कि आरोपी झूठ बोल रहा है। लेकिन इस सूचना का कोई लाभ नही है, क्योंकि आरोपी कह देता है कि मशीन झूठ बोल रही है, मैं सच। मतलब लाई डिक्टेटर टेस्ट सिर्फ झूठ पकड़ सकता है किन्तु सच नही उगलवा सकता, जबकि नार्को टेस्ट आरोपी के दिमाग में उसकी अनुमति के बिना घुसने जैसा है। अत: नार्को टेस्ट में व्यक्ति वह सूचनाएं न चाहते हुए भी उगल देता है जो वह छिपाना चाहता है।
.
सुप्रीम कोर्ट में बैठे भगवानो ने यह आदेश दे कर रखा है कि किसी भी आरोपी का नार्को टेस्ट लेने से पहले उस व्यक्ति की अनुमति लेनी आवश्यक है जिसका नार्को टेस्ट किया जाना है। सोनिया -मोदी -केजरीवाल इस बात के कट्टर विरोधी है कि किसी व्यक्ति का नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए। क्योंकि किसी एक भी आरोपी नेता का नार्को टेस्ट पूरे सिस्टम की सड़ांध को उधेड़ कर रख देगा।
इनके अंधभगत भी नार्को टेस्ट के सख्त खिलाफ है, क्योंकि इसकी शुरुआत होने से पूरी संभावना है कि कल को इनके नेताओ को भी नार्को टेस्ट की दवाई पीनी पड़ सकती है। अब कोई भी भगत यह तो निश्चित रूप से देखना नही चाहेगा कि उनके भगवन नीम बेहोशी में खुद के ही काले कारनामो का भांडा खुद ही फोड़ दे रहे है। लिहाजा ये सभी नार्को टेस्ट का विरोध कर रहे है।
.
यदि इस मुक़दमे की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जाती है तो जूरी बहुमत से यह निर्धारित कर सकती है कि किस किस का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए। इतने विशाल घोटाले को सिर्फ सार्वजनिक नार्को टेस्ट और नागरिको की ज्यूरी द्वारा ही खोला जा सकता है, अन्य सभी प्रकार की 'स्वतंत्र जाँचे' और अदालती टोटके सिर्फ इस घोटाले को और भी छिपाने का ही कार्य करेंगे।
.
यदि आप भारत में राईट टू रिकाल एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों को लागू कराना चाहते है तो अपने क्षेत्र के सांसद को SMS द्वारा आदेश भेजे कि इन्हें गेजेट में प्रकाशित किया जाए। SMS का नमूना तथा प्रस्तावित ड्राफ्ट के लिंक कमेन्ट बॉक्स में दिए गए है।
.
_____________________